ब्राह्मण समुदाय की नाराजगी दूर करने में जुटे हैं योगी आदित्यनाथ ?

Summary :

राम मंदिर के लिए मिले दान में गड़बड़ी के विवाद के तुरंत बाद, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार ने जलालाबाद का नाम बदलकर परशुरामपुरी करने का फ़ैसला किया है। माना जा रहा है कि इस कदम का मकसद ब्राह्मण समुदाय को खुश करना है, जो हाई-प्रोफाइल राम मंदिर में दान की चोरी की खबरों से नाराज़ है। लगता है कि दान घोटाले की खबर सामने आने के बाद बीजेपी ब्राह्मण समुदाय में बढ़ रही नाराजगी को लेकर चिंतित है। उसे इस प्रभावशाली समूह के प्रति कोई कदम उठाने की ज़रूरत महसूस हो रही है, जो 1980 के दशक…

राम मंदिर के लिए मिले दान में गड़बड़ी के विवाद के तुरंत बाद, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार ने जलालाबाद का नाम बदलकर परशुरामपुरी करने का फ़ैसला किया है। माना जा रहा है कि इस कदम का मकसद ब्राह्मण समुदाय को खुश करना है, जो हाई-प्रोफाइल राम मंदिर में दान की चोरी की खबरों से नाराज़ है। लगता है कि दान घोटाले की खबर सामने आने के बाद बीजेपी ब्राह्मण समुदाय में बढ़ रही नाराजगी को लेकर चिंतित है। उसे इस प्रभावशाली समूह के प्रति कोई कदम उठाने की ज़रूरत महसूस हो रही है, जो 1980 के दशक में राम मंदिर आंदोलन के समय से ही पार्टी का वफादार समर्थक रहा है। यूपी में ब्राह्मणों के लिए परशुराम एक सम्मानित हस्ती हैं। हालांकि यूपी सरकार ने बहुत पहले ही जलालाबाद तहसील को परशुराम भूमि घोषित कर दिया था, लेकिन योगी ने अब तक इसका नाम बदलने के लिए कोई कदम नहीं उठाया था। आखिरकार उन्होंने ऐसा किया है, इस उम्मीद में कि समुदाय में पनप रहा गुस्सा शांत हो जाएगा।
दिलचस्प बात यह है कि अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी कुछ समय से ब्राह्मण सम्मेलनों को शुरू करने की अपनी मंशा जाहिर करके ब्राह्मणों को लुभाने की कोशिश कर रही है। मायावती की बीएसपी भी अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में टिकट देने के वादे के साथ समुदाय तक पहुंचने की कोशिश कर रही है। जाहिर है, बीजेपी को उम्मीद है कि जलालाबाद का नाम परशुराम के नाम पर रखकर वह इन कदमों का सफलतापूर्वक मुकाबला कर पाएगी। यह देखना बाकी है कि क्या यह ब्राह्मणों को संतुष्ट करने के लिए काफी है या नहीं। राम मंदिर में दान की चोरी की खबरों को लेकर समुदाय में साफ तौर पर गुस्सा है। हालांकि योगी सरकार ने तुरंत एसआईटी जांच बिठाई और आठ लोगों को गिरफ्तार किया, लेकिन ब्राह्मणों को लगता है कि दान का गलत इस्तेमाल उनकी आस्था और भरोसे के साथ धोखा है। उन्हें निश्चित रूप से ऐसी उम्मीद नहीं थी कि ऐसा उस मंदिर में होगा जिसे विहिप नेताओं और मोदी सरकार द्वारा नियुक्त लोगों द्वारा चलाया जाता है।
ई25 पर धीमी गति से आगे बढ़ रही सरकार
हो सकता है कि भारत सरकार ने ई-20 पेट्रोल (जिसमें 20% इथेनॉल मिला होता है) की बिक्री पर फिर से विचार करने से इनकार कर दिया हो और इस फैसले पर अडिग रही हो। हालांकि, पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा को 25% तक बढ़ाने को लेकर उसे अपने ही मध्यम वर्गीय वोटरों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। नतीजतन, वह ई-25 को लेकर धीमी गति से आगे बढ़ रही है। ऐसा लगता है कि ऑटोमोबाइल बनाने वाली कंपनियों के विरोध के अलावा, मिडिल क्लास समर्थकों से मिले फीडबैक से भी इस कदम का कड़ा विरोध सामने आया है। ग्राहकों को डर है कि ई-25 पेट्रोल से गाड़ी की माइलेज कम हो जाती है और कार का इंजन बहुत तेज़ी से खराब होता है। इससे कार चलाने वालों पर बोझ बढ़ेगा क्योंकि उन्हें पेट्रोल पर ज़्यादा खर्च करना होगा और अपनी कारें जल्दी बदलनी पड़ेंगी। उनके कई समर्थक असल में चाहते हैं कि सरकार पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने के अपने फैसले को पूरी तरह से वापस ले ले और बिना मिलावट वाले ईंधन का इस्तेमाल करे।
बढ़ते जन-दबाव के कारण गडकरी को हाल ही में यह मानना ​​पड़ा कि ई-20 पेट्रोल से भी माइलेज कम मिलती है। लेकिन उन्होंने 20% इथेनॉल मिलाने के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि भारत को मिडिल ईस्ट में युद्ध जैसी स्थितियों के लिए तैयार रहना होगा, जिससे तेल की सप्लाई में रुकावट आई है। हालांकि, यह साफ है कि सरकार बचाव की मुद्रा में है। हाल ही में सरकार ने ई-20 पेट्रोल की सप्लाई जारी रखने के फैसले का बचाव करने के लिए केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी और केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी जैसे बड़े मंत्रियों को आगे किया।

R R Jairath