ईरान -इजराइल व अमेरिका युद्ध अब एेसे खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है जिससे पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के दहल उठने की संभावना बलवती हो गई है। बेशक यह युद्ध अमेरिकी राष्ट्रपति श्री डोनाल्ड ट्रम्प की एकतरफा मनमानी की वजह से ईरान पर थोपा हुआ माना जा रहा है जिसकी वजह से दुनिया के वे सभी देश भारी संकट में फंसते नजर आ रहे हैं जो विश्व व्यवस्था के तरतीबवार विकास क्रम में विश्वास रखते हैं और मानते हैं कि युद्ध से किसी समस्या का अन्तिम हल नहीं निकल सकता है। अन्तिम हल अन्ततः बातचीत की मेज पर बैठ कर ही निकल सकता है। पश्चिम एशिया में चल रहे इस भंयकर युद्ध से अब दुनिया पर ऊर्जा संकट के बादल मंडराने लगे हैं और भारत जैसे देश पर भी इसका असर साफ पड़ता नजर आ रहा है।
इस बारे में भारत में अभी तक एकमत नहीं बन सका है कि ईरान-इजराइल युद्ध में भारत का पक्ष क्या होना चाहिए था क्योंकि देश की अधिकतम विपक्षी पार्टियां कह रही हैं कि सत्तारूढ़ भाजपा की सरकार ने पारंपरिक रूप से ईरान के पक्ष में न दिखने का रुख अख्तियार करके कूटनीतिक रूप से गलती कर दी है परन्तु दूसरी ओर सरकार का स्पष्ट कहना है कि भारत इस युद्ध में किसी भी पक्ष का समर्थन नहीं कर रहा है बल्कि वह अपने राष्ट्रीय हितों के पक्ष में खड़ा हुआ है।
युद्ध विगत 28 फरवरी को शुरू हुआ जिसके प्रारम्भिक चरण में अमेरिका व इजराइल ने भारी तबाही मचाते हुए ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई की हवाई हमलों से हत्या तक कर दी और उनके साथ ईरानी सेना के 48 उच्च कमांडरों को भी मार डाला। अमेरिका ने यह कार्रवाई इसलिए की क्योंकि राष्ट्रपति ट्रम्प ने कहा था कि युद्ध के मुख्य उद्देश्यों मंे से एक ईरान में सत्ता परिवर्तन भी है। युद्ध का दूसरा अमेरिकी लक्ष्य ईरान को परमाणु हथियारों से रोकना था। इजराइल मानता था कि ईरान अपनी परमाणु प्रयोगशालाओं में यूरेनियम संवर्धन उस हद तक कर रहा है जिससे यह परमाणु बम बनाने में सक्षम हो सकता है। परन्तु इजराइल व अमेरिका का यह शक उसी प्रकार का निकला जिस तरह 2003 मंे इराक के बारे मंे यह कहा गया था कि उस देश के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने व्यापक जनसंहार के हथियारों का जखीरा खड़ा कर लिया है। पूरी दुनिया आज इराक का हाल देख रही है और सोच रही है कि आखिर क्या सोच कर अमेरिका ने इराक में अपनी फौजें भेजी थीं? इसी प्रकार अमेरिका ने भारतीय उपमहाद्वीप के राष्ट्र अफगानिस्तान में अपनी फौजें भेजी थी मगर वहां 20 वर्ष रहने के बाद इसने उन्हीं कथित ‘असभ्य’ कहे जाने वाले तालिबानों के हाथ में सत्ता सौप दी जिन्हें उखाड़ने का इसने प्रण लिया था।
इससे अन्दाजा लगाया जा सकता है कि अमेरिका का लक्ष्य कहीं न कहीं पूरी दुनिया में अपनी चौधराहट स्थापित करने का ही होता है। लेकिन आजादी के बाद भारत ने अमेरिका के साथ अपने सम्बन्धों को इस प्रकार साधा कि वह भारतीय उपमहाद्वीप में भारत की उदार लोकतान्त्रिक ताकत को पहचाने व इसके विकास में अपना पूर्ण योगदान दे मगर फर्क सिर्फ इतना था कि उस समय द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जिस संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्थापना करके जो विश्व व्यवस्था सोवियत संघ को दूसरी विश्व शक्ति मानते हुए गठित हुई थी उसमें भारत जैसे विकासशील देशों ने गुट निरपेक्ष आन्दोलन की वजह से अपनी विशिष्ट जगह बना ली थी। परन्तु 1990 में सोवियत संघ के 14 संप्रभु देशों मंे बिखर जाने व आर्थिक वैश्वीकरण के शुरू होने पर इस तरह के राष्ट्र समूहों के लिए कोई स्थान नहीं रहा और इसके समानान्तर भारत के पड़ोसी देश चीन के विश्व आर्थिक शक्ति के रूप में उभरने से विकासशील देशों के सामने अपने आर्थिक विकास के लिए पूंजी मूलक व्यवस्था की शरण में जाना जरूरी बनता चला गया जिसका लाभ एक जमाने में कम्युनिस्ट रहे चीन जैसे देश ने भी जमकर उठाया।
इसके दो परिणाम हुए। एक तो चीन ने आर्थिक साम्राज्यवादी रुख अख्तियार करना शुरू किया और एशिया से लेकर अफ्रीका तक के गरीब देशों को अपनी आर्थिक ताकत के चंगुल में फंसाया और दूसरे अमेरिका ने अपनी सामरिक व आर्थिक ताकत के बूते पर पूरी दुनिया के आय स्रोतों पर अपना कब्जा जमाना शुरू किया। इस रास्ते में जो भी देश उसे अवरोध लगा उसे ही छोटा करने का उसने प्रयास किया। इसी सन्दर्भ में हमें पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध को देखना होगा और फिर विचार करना होगा कि इन विषम परिस्थितियों में भारत की क्या भूमिका हो? दुनिया जानती है कि अमेरिका के पास घऱेलू स्तर पर कच्चे तेल व गैस का अकूत भंडार है जिसका पूरा उपयोग वह फिलहाल नहीं कर रहा है और दुनिया के अन्य देशों में पाये जाने वाले तेल भंडारों का ही अधिकाधिक उपयोग करना चाहता है जिससे भविष्य में भी उसकी अर्थव्यवस्था दुनिया की नम्बर एक अर्थव्यवस्था बनी रहे। इस नजरिये से उसने आज पूरे अरब इलाके व पश्चिम एशियाई इलाके को समुद्र से लेकर आकाश व जमीन तक जंग का अखाड़ा बना दिया है। उसके ऊपर तुर्रा यह है कि राष्ट्रपति ट्रम्प 2024 से जब से अमेरिका के पुनः राष्ट्रपति बने हैं तब से उन पर अमेरिका को पुनः महान बनाने का बुखार चढ़ा हुआ है। अपनी इसी सनक मे वह कभी अमेरिकी व्यापार के लिए शुल्क प्रणाली को हथियार बनाते हैं तो कभी अपनी सामरिक ताकत का रुआब दिखाते हैं जिसकी वजह से भारत जैसे घोषित शान्ति प्रिय देश को भी भारी कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
ट्रम्प अपनी सनक में वेनेजुएला देश के चुने हुए राष्ट्रपति को पत्नी सहित आधी रात में अगुवा करके अमेरिका ले आते हैं और उन्हें जेल में बन्द कर देते हैं और कहते हैं कि वेनेजुएला के तेल भंडारों पर अब अमेरिका का कब्जा है। ट्रम्प ने भारतीय आयात पर भी 50 प्रतिशत शुल्क लगाने का एलान कर दिया था जबकि भारत के साथ उनके रणनीतिक सम्बन्ध थे। वह एक ही जुबान से पाकिस्तान के नेताओं को भी महान बता देते हैं और बेशर्मी के साथ भारत–पाक के बीच हुए सैनिक संघर्ष आपरेशन सिन्दूर रोकने की भी घोषणा कर देते हैं जबकि प्रधानमन्त्री मोदी ने संसद मंे स्पष्ट कर दिया था कि आपरेशन सिन्दूर रोकने या युद्ध विराम के सन्दर्भ में उनकी किसी भी दूसरे विश्व नेता से बात नहीं हुई। अतः इस मामले में भारत के विपक्षी नेताओं को संवेदनशीलता से काम लेना चाहिए था और अपने देश के प्रधानमन्त्री पर भरोसा करना चाहिए था। डोनाल्ड ट्रम्प की इस बेढ़ंगी चाल को देखते हुए भारत को अपने राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा बहुत सावधानी के साथ करनी थी जिसे प्रधानमन्त्री ने बखूबी किया और शुरू में पश्चिम एशिया युद्ध पर मौन रहते हुए सन्देश दिया कि भारत इस युद्ध के समर्थन में नहीं है और वह पश्चिम एशिया में आर्थिक सुरक्षा व स्थिरता चाहता है। कूटनीति में मौन भी एक अस्त्र के रूप में कभी– कभी इस्तेमाल होता है। यही वजह है कि इसका समर्थन विपक्षी कांग्रेस पार्टी के भी कुछ मुखर विद्वान नेता कर रहे हैं। निश्चित रूप से भारत चाहता है कि ईरान -इजराइल व अमेरिका युद्ध अब जिस मुकाम पर आ गया है उससे दुनिया का सर्वनाश हो सकता है क्योंकि दोनों प्रतिद्वंिद्वयों ने एक-दूसरे की नागरिक सुविधाओं पर भी आक्रमण करना शुरू कर दिया है।
ईरान समस्त खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी सैनिक अड्डों के साथ उनके तेल व गैस उत्पादन ठिकानों को भी निशाना बना रहा है और इजराइल व अमेरिका भी एेसा ही कर रहे हैं। इसी वजह से श्री मोदी ने पांच देशों के नेताओं से फोन पर वार्ता करके इस युद्ध के प्रति चिन्ता जताई और शान्ति व वार्ता की अपील की। यदि खाड़ी के तेल उत्पादक देशों की उत्पादन इकाइयों पर ही हमले होने लगेंगे तो पूरी दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा के खतरे में आने की संभावना प्रबल हो जायेगी । श्री मोदी की इस चिन्ता में समूचे भारत को शामिल होना चाहिए और विपक्षी नेताओं को भी इस संकट की घड़ी में एक आवाज में बोलना चाहिए। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का 90 प्रतिशत तक आयात करता है अतः खतरा इस पर भी कम नहीं है।
संसद का सत्र चालू है और इससे आवाज आनी चाहिए कि भारत के लोग संकट का सामना करने में उसी प्रकार एक हैं जिस प्रकार किसी बाहरी आक्रमण के समय होते हैं।






















