होर्मुज संकट के चलते दुनिया भर में उथल-पुथल मची हुई है। तेल और ऊर्जा का संकट गहराता जा रहा है। ऐसे में सभी देश सप्लाई पर बढ़ते दबाव के बीच तेल आयात के स्रोतों में विविधता लाने का प्रयास कर रहे हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं है। भारत अपनी जरूरतों के मुताबिक तेल आयात के लगातार विकल्प ढूंढ रहा है। भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत तेल आयात करता है। ऐसे में तेल उत्पादक देशों के साथ भारत के रणनीतिक संबंध मजबूत होना स्वाभाविक है। पश्चिम एशिया तनाव के बीच वेनेजुएला की कार्यवाहक राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज भारत के दौरे पर आईं। डेल्सी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर से बातचीत की। भारत वेनेजुएला के साथ अपनी ऊर्जा साझेदारी को मजबूत करना चाहता है। दोनों देशों ने वैश्विक सप्लाई में व्यवधान के बीच कच्चे तेल के प्रवाह बढ़ाने पर जोर दिया। भारत हाल ही में वेनेजुएला के कच्चे तेल के सबसे बड़े खरीदारों में से एक बनकर उभरा है।
वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को अमेरिकी सेना उठाकर ले जाने के बाद वेनेजुएला की कमान डेल्सी को सौंपी गई थी। 58 साल पहले भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने वेनेजुएला की राजधानी कराकस की ऐतिहासिक यात्रा की थी, तब शायद किसी ने भी नहीं सोचा होगा कि यही देश भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण साझेदार बन सकता है। दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाले इस देश की नजरें भारत पर टिकी हुुई हैं। वह भारत को तेल बेचना चाहता है। उसके पास सऊदी अरब और ईरान से अधिक तेल भंडार मौजूद हैं। हालांकि राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक संकट आैर अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण वह अपनी पूरी क्षमता से उत्पादन नहीं कर पाया। भारत पहले से ही रूस, सऊदी अरब और ईरान जैसे देशों से तेल खरीद रहा है। पश्चिम एशिया में जारी संकट के कारण भारत अपनी तेल जरूरतों के लिए नए सप्लायर देशों पर मंथन कर रहा है। ऐसे समय में वेनेजुएला एक विकल्प बनकर उभर सकता है। वेनेजुएला के तेल खरीद का रास्ता इतना सहज भी नहीं है।
आप जानकर हैरान होंगे कि दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाला देश अपने तेल को बेचने के लिए संघर्ष कर रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह वेनेजुएला के कच्चे तेल की प्रकृति है, सऊदी अरब या खाड़ी देशों का अधिकांश तेल अपेक्षाकृत हल्का होता है। उसे निकालना, पाइपलाइन में भेजना और जहाजों में भरना आसान होता है लेकिन वेनेजुएला का तेल बेहद भारी और गाढ़ा है। विशेषज्ञों का कहना है कि उसका तेल कई मामलों में बिटुमेन जैसा व्यवहार करता है। यही कारण है कि उसे जमीन से निकालने, पाइपलाइन में बहाने और बंदरगाह तक पहुंचाने में बड़ी दिक्कत आती है। यानी वेनेजुएला के पास तेल तो बहुत है, लेकिन वह आसानी से बहने वाला तेल नहीं है। यही उसकी सबसे बड़ी चुनौती है। यहीं पर भारत के जादुई तेल यानी नेफ्था की जरूरत पड़ती है।
आमतौर पर तेल उत्पादक देश दूसरे देशों को तेल बेचते हैं लेकिन वेनेजुएला की स्थिति अलग है। उसे अपना तेल निकालने और बेचने के लिए पहले दूसरे देशों से नेफ्था जैसे हल्के हाइड्रोकार्बन खरीदने पड़ते हैं। यानी जिस देश के पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है, वह अपने तेल को बाजार तक पहुंचाने के लिए हाइड्रोकार्बन आयात करने पर मजबूर है। यही वजह है कि नेफ्था की आपूर्ति वेनेजुएला के लिए सिर्फ एक व्यापारिक मुद्दा नहीं, बल्कि उसकी पूरी ऑयल इकोनॉमी की लाइफलाइन है।
भारत दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनिंग शक्तियों में शामिल है। देश में हर साल करोड़ों टन नेफ्था का उत्पादन होता है। गुजरात, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में स्थित बड़ी रिफाइनरियां घरेलू जरूरतों के साथ-साथ निर्यात के लिए भी पर्याप्त मात्रा में नेफ्था तैयार करती हैं। रिलायंस इंडस्ट्रीज, इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी कंपनियां इस क्षेत्र में बड़ी भूमिका निभाती हैं। यही कारण है कि भारत वेनेजुएला के लिए सिर्फ तेल खरीदने वाला ग्राहक नहीं, बल्कि ऐसा साझेदार बन सकता है जो उसके तेल उद्योग की सबसे बड़ी समस्या का समाधान भी दे सकता है। अगर भारत से नेफ्था की नियमित आपूर्ति बढ़ती है, तो वेनेजुएला का भारी तेल अधिक मात्रा में वैश्विक बाजार तक पहुंच सकता है।
यदि भारत नेफ्था निर्यात करता है और बदले में उसे तेल की डील मिलती है तो यह भारत के लिए फायदे का सौदा हो सकता है। दोनों देशों में ऊर्जा, व्यापार, निवेश, दवा, स्वास्थ्य तथा परिवहन जैसे क्षेत्रों में सहयोग पर भी चर्चा हुई है। यद्यपि भारत और वेनेजुएला के बीच हजारों किलोमीटर की समुद्री दूरी है, इसलिए तेल लाने वाले जहाजों को लम्बी दूरी तय करनी पड़ेगी। भारत को परिवहन लागत ज्यादा होने के बावजूद अगर कम दरों पर तेल मिलता है तो उसके िलए डील आकर्षक रहेगी। दुनिया भर में जिस तरह से भूराजनीतिक दृश्य बदल रहे हैं, ऐसे में भारत को अपने तेल भंडारों में पर्याप्त तेल रखना होगा। भारत का दृष्टिकोण पूरी तरह से स्पष्ट है। भारत न तो किसी एक देश पर बहुत ज्यादा निर्भर होना चाहता है और न ही किसी के दबाव में तेल खरीदना चाहता है। भारत अपने हितों को सर्वोपरि रखते हुए आर्थिक रूप से फायदेमंद डील ही करेगा।
भारत-वेनेजुएला : फायदे का सौदा
Summary :
होर्मुज संकट के चलते दुनिया भर में उथल-पुथल मची हुई है। तेल और ऊर्जा का संकट गहराता जा रहा है। ऐसे में सभी देश सप्लाई पर बढ़ते दबाव के बीच तेल आयात के स्रोतों में विविधता लाने का प्रयास कर रहे हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं है। भारत अपनी जरूरतों के मुताबिक तेल आयात के लगातार विकल्प ढूंढ रहा है। भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत तेल आयात करता है। ऐसे में तेल उत्पादक देशों के साथ भारत के रणनीतिक संबंध मजबूत होना स्वाभाविक है। पश्चिम एशिया तनाव के बीच वेनेजुएला की कार्यवाहक राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज भारत के दौरे…


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