भारत की संतुलित नीति

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते 45 हजार मीट्रिक टन एलपीजी लेकर शिवालिक टैंकर के गुजरात के मुंद्रा तट पर पहुंचने से भारत को बड़ी राहत मिली है। शिवालिक के पीछे-पीछे नंदा देवी जहाज भी मंगलवार की शाम को पहुंच गया है। होर्मुज स्ट्रेट पर अब भी भारत के 22 जहाज फंसे हुए हैं और इन जहाजों में 611 भारतीय न​ाविक सवार हैं। इन जहाजों में 6 एलपीजी जहाज, एक में एलएनजी, चार कच्चे तेल के टैंकर और एक जहाज कैमिकल उत्पाद वाला शामिल है। भारत में खाना पकाने वाली रसोई गैस को लेकर पैदा हुआ पैनिक अब धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। कमर्शियल गैस की सप्लाई भी शुरू की जा रही है और हालात सामान्य होने की ओर अग्रसर हैं।
28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान पर हमला कर दिया था। इसके बाद ईरान ने बदला लेते हुए होर्मुज स्ट्रेट को बंद कर दिया था। होर्मुज स्ट्रेट बंद होने के कारण भारत के कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति पर असर पड़ा। क्योंकि भारत अपनी जरूरत का 80-90 फीसदी कच्चा तेल और 60 फीसदी एलपीजी आयात करता है। इसमें से 85-90 फीसदी एलपीजी सऊदी अरब और यूएई जैसे खाड़ी देशों से आती है। होर्मुज स्ट्रेट में ईरान जहां जहाजों को गुजरने नहीं दे रहा है और उन पर हमला कर रहा है। ऐसी स्थिति में भारत के दो जहाजों को सुरक्षित रास्ता मिलना न सिर्फ बड़ी कूटनीतिक जीत है, बल्कि जहाजों में लदा माल भी अहम है, क्योंकि शिपिंग से जुड़ी दिक्कतों की वजह से एलपीजी की सप्लाई पर असर पड़ा था।
ईरान और अमेरिका-इजराइल युद्ध के चलते एक हफ्ते तक भारत की खामोशी पर देश के भीतर विपक्ष द्वारा विदेश नीति पर बहुत से सवाल खड़े किए जा रहे थे लेकिन भारत ने बेहद संतुलित तटस्थ आैर कूूटनीतिक रुख अपनाया। भारत ने युद्ध पर बहुत ही सतर्क प्रतिक्रिया दी। भारत ने सीधे तौर पर किसी का पक्ष लेने की बजाय शांति और कूटनीतिक संवाद की अपील की। एक ओर भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए ईरान के साथ संबंधों को बनाए रखने के लिए प्रयासरत रहा तो दूसरी ओर अमेरिका के साथ व्यापा​िरक सौदों पर भी बातचीत कर रहा है। भारत की ​चिंता ईरान समेत सभी खाड़ी देशों में रोजी-रोटी कमा रहे लगभग एक करोड़ भारतीयों की सुरक्षा की भी रही।
भारत का मुख्य उद्देश्य अपने भूराजनीतिक और आर्थिक हितों की रक्षा करना है। भारत ने यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाया और तेहरान के साथ सीधे संवाद को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा सम​र्थित सैन्य दृष्टिकोण के विकल्प के रूप में पेश किया। अब जबकि ट्रम्प को अपने ही मित्र देशों ने होर्मुज जलडमरूमध्य में अपने युद्धपोत भेजने से साफ इंकार कर दिया है और खाड़ी देश भी अब ईरान के विरुद्ध अपनी भूमि का इस्तेमाल होने देने से साफ इंकार कर रहे हैं तो भारत ने अपना कूटनीतिक दांव चल दिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान और विदेश मंत्री अराघची से फोन पर बातचीत की। वहीं विदेश मंत्री एस. जयशंकर ईरान के विदेश मंत्री और अन्य अधिकारियों के साथ लगातार बातचीत करते रहे, जिसके साकारात्मक परिणाम निकले और ईरान ने तीन भारतीय ध्वज वाले गैस टैंकरों को जाने की अनुमति दे दी। भारत अपने कच्चे तेल का लगभग 90 प्रतिशत आयात करता है और तरलीकृत पैट्रोलियम गैस का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा आयातक है। भारत के लिए यह जरूरी था कि वह ईरान और अमेरिका के साथ अपने संबंधों को सावधानीपूर्वक प्रबंधित करे। दिल्ली स्थित ईरान के राजदूत ने भी साकारात्मक संकेत दिए और कहा कि भारत ईरान का दोस्त है और मसले जल्द सुलझ जाएंगे। ईरान के​ विदेश मंत्री अराघची ने भी स्पष्ट संकेत दिये कि ईरान उन देशों के साथ बातचीत के लिए तैयार है जो अपने जहाजों के लिए सुरक्षित मार्ग चाहते हैं। भारत ने इस मौके का लाभ उठाने के​ लिए तुरन्त कदम बढ़ा दिये। जयशंकर ने इस बात पर जोर दिया कि दोनों देशों के बीच यह व्यवस्था और संबंध रियायतों पर आधारित नहीं थे। उन्होंने कहा, “यह आदान-प्रदान का मुद्दा नहीं है। भारत और ईरान के बीच संबंध हैं, और यही इतिहास वह आधार है जिस पर मैंने यह बातचीत शुरू की।” हालांकि, सभी भारतीय जहाजों को कवर करने वाला कोई सर्वव्यापी समझौता नहीं है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक पारगमन पर अलग-अलग बातचीत की जा रही है। जयशंकर ने कहा, “जहाज की हर आवाजाही एक अलग घटना है” और बताया कि कई भारतीय जहाज अभी भी इस क्षेत्र में मौजूद हैं और बातचीत जारी है। तेल की बढ़ती कीमतों और बाधित शिपिंग मार्गों ने पहले ही बाजारों को ​िहलाकर रख ​िदया है और आपूर्ति शृंखलाओं को खतरे में डाल दिया है।
यद्यपि ऐसी मीडिया रिपोर्टें भी सामने आई हैं कि ईरान ने भारत द्वारा पकड़े गए तीन टैंकर वापिस मांगे हैं। जबकि भारत का कहना है कि पकड़े गए तेल टैंकरों का स्वामित्व ईरान के पास नहीं है। उम्मीद है कि यह मुद्दा भी बातचीत से हल हो जाएगा। महायुद्ध का संकट ब्रिक्स जैसे मंचों में भारत की कूटनीति की परीक्षा ले रहा है, जिसकी अध्यक्षता भारत इस वर्ष कर रहा है और ईरान भी इसके सदस्यों में से एक है। ईरान यह भी चाहता है कि ब्रिक्स अमेरिकी और इजराइली हमलों की निंदा करे। यह मसला इसलिए भी जटिल है क्योंकि ब्रिक्स के विस्तारित गुट में सऊदी अरब और यूएई भी शामिल हैं। भारत और ईरान के बीच ए​ेतिहासिक रूप से दोस्ताना और रणनीतिक संबंध रहे हैं। ईरान भारत के लिए महत्वपूर्ण ऊर्जा भागीदारी है और मध्यपूर्व से कनेक्टिविटी के लिए विशेषकर चाबहार बंदरगाह के माध्यम से दोनों देशों के ​िहत समान हैं। अब जबकि अमेरिका ने चाबहार बंंदरगाह पर भी हमले किए हैं और ट्रम्प के इरादे भारतीय हितों को आघात पहुंचाना है तो भारत काफी सतर्कता से काम कर रहा है। युद्ध के खतरों के बीच ईरान ने भारत के तेल टैंकरों को जाने की अनुमति देकर संंबंधों का मार्ग प्रशस्त किया है। भारत के सामने अब तेल और गैस का कोई संकट नहीं है। भारत की सक्रियता यही दर्शाती है कि युद्धों से कुछ हासिल नहीं होता बल्कि राजनयिक चैनल प्रभावी हो तो शांति के मार्ग तलाशे जा सकते हैं।

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