ब्रिक्स में भारत का संदेश

Summary :

पश्चिम एशिया संकट के बीच जटिल और अस्थिर हो चुकी दुनिया के बीच भारत ने एक तरफ​ ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक का आयोजन किया तो दूसरी तरफ बीजिंग में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग में मुलाकात हुई। पश्चिम एशिया में अमेरिका-इजराइल और ईरान में टकराव के चलते भारत को कूटनीतिक दुविधा में डाला हुआ है और ब्रिक्स में भारत की नेतृत्वकारी भूमिका के कारण भारत पर दबाव और बढ़ गया है। भारत के अमेरिका और इजराइल दोनों के साथ करीबी संबंध हैं तो दूसरी ओर भारत के ईरान के साथ भी ऐतिहासिक संबंध…

पश्चिम एशिया संकट के बीच जटिल और अस्थिर हो चुकी दुनिया के बीच भारत ने एक तरफ​ ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक का आयोजन किया तो दूसरी तरफ बीजिंग में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग में मुलाकात हुई। पश्चिम एशिया में अमेरिका-इजराइल और ईरान में टकराव के चलते भारत को कूटनीतिक दुविधा में डाला हुआ है और ब्रिक्स में भारत की नेतृत्वकारी भूमिका के कारण भारत पर दबाव और बढ़ गया है। भारत के अमेरिका और इजराइल दोनों के साथ करीबी संबंध हैं तो दूसरी ओर भारत के ईरान के साथ भी ऐतिहासिक संबंध हैं। इसके अलावा भारत के संयुक्त अरब अमीरात और अन्य खाड़ी देशों के साथ भी मजबूत आर्थिक संबंध हैं। खाड़ी देशों में लगभग एक करोड़ भारतीय काम करते हैं। दिल्ली में सम्पन्न हुई दाे दिवसीय बैठक भारत की अध्यक्षता में हुई पहली बैठक है। इस बैठक में ईरान के विदेशमंत्री अब्बास अराघची का भाग लेना महत्वपूर्ण रहा। ब्रिक्स लंबे समय से खुद को ग्लोबल साउथ की आवाज के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रहा है। भारत की अध्यक्षता में ब्रिक्स बहुपक्षवाद को मजबूत करने पर जोर देगा।
ब्रिक्स ब्राजील, रूस, भारत, चीन, साउथ अफ्रीका से मिलकर बना एक बड़ा संगठन है। इसका उद्देश्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण और विकासशील देशों को एक साथ लाने का था। यह समूह दुनिया की लगभग 49.5 फीसदी आबादी और ग्लोबल जीडीपी के लगभग 40 फीसदी हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। इस समूह का पहला सम्मेलन साल 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग में हुआ था।
देश के पूर्व वित्त मंत्री जो बाद में भारत के राष्ट्रपति बने प्रणव मुखर्जी ने अपने कार्यकाल के दौरान ब्रिक्स देशों के साथ भारत के आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ब्रिक्स प्रतिनिधियों की बैठक में दुनिया को महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने पश्चिम एशिया से लेकर आतंकवाद, समुद्री सुरक्षा, प्रतिबद्धों की राजनीति और संयुक्त राष्ट्र सुधार तक भारत का रुख स्पष्ट किया। एस. जयशंकर ने कहा कि पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष विशेष ध्यान देने योग्य है। जयशंकर ने कहा आज के दौर का संदेश स्पष्ट है कि सहयोग आवश्यक है और सुधारों को अब टाला नहीं जा सकता।
उन्होंने “होर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर सहित अंतर्राष्ट्रीय जलमार्गों के माध्यम से सुरक्षित और निर्बाध समुद्री प्रवाह” का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि “अंतर्राष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के विपरीत एकतरफा दंडात्मक उपायों और प्रतिबंधों का बढ़ता सहारा” विकासशील देशों को असमान रूप से प्रभावित कर रहा है। उन्होंने कहा, “ये अनुचित उपाय संवाद का विकल्प नहीं बन सकते, न ही दबाव कूटनीति का स्थान ले सकता है।” बयान में अमेरिका या इज़राइल का नाम नहीं लिया गया। भारत परंपरागत रूप से संयुक्त राष्ट्र समर्थित न होने वाले एकतरफा प्रतिबंधों का विरोध करता रहा है, लेकिन अतीत में इसने ईरानी तेल की खरीद पर अमेरिकी प्रतिबंधों का पालन किया है। रूसी कच्चे तेल के मामले में नई दिल्ली का रुख कम सख्त रहा था, जिस पर अमेरिका और यूरोपीय संघ के प्रतिबंध लगे हुए हैं, लेकिन ट्रंप प्रशासन द्वारा दंडात्मक टैरिफ लगाए जाने के बाद उसे खरीद में कटौती करनी पड़ी।
आतंकवाद पर भारत ने अपना पारम्परिक लेकिन सख्त रुख अपनाया और कहा कि सीमापार आतंकवाद अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन है और आतंकवाद के प्रति जीरो टालरेंस सार्वभौमिक मानक होना चाहिए। कुल मिलाकर भारत ने यही संदेश दिया है कि शांति टुकड़ों-टुकड़ों में नहीं मिल सकती और स्थिरता चुनिंदा नहीं हो सकती। आज की भूराजनीतिक स्थितियों में संघर्ष, ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक दबाव, तकनीकी, असमानता और पर्यावरण संकट एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। भारत ने टकराव की बजाय संवाद और कूटनीति का मार्ग अपनाने की जमकर वकालत की। पश्चिम-एशिया तनाव के चलते होर्मुज से तेल सप्लाई बाधित हाेने से पूरी दुनिया प्रभावित हुई है। कच्चे तेल की कीमतें और गैस की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। भारत में भी पैट्रोल, डीजल, सीएनजी की कीमतें बढ़ा दी गई हैं। ऐसा अन्य देशाें में भी किया जा रहा है। कुछ देशों ने तो तेल और गैस की राशनिंग भी शुरू कर दी है। पैट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि के चलते महंगाई डायन एक बार फिर रौद्र रूप धारण कर चुकी है जिससे आम आदमी प्रभावित हो रहा है अब महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या पश्चिम एशिया तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में की गई नाकेबंदी का कोई कारगर हल निकलेगा। बैठक के दौरान ही ईरान के विदेशमंत्री ​अब्बास अराघची और यूएई के विदेश राज्य मंत्री के बीच काफी तल्खी दिखाई दी और दोनों ने एक-दूसरे पर सीधे आरोप लगाए। यद्यपि ईरान ने ब्रिक्स की एकता बनाए रखने के लिए यूएई का नाम नहीं लिया लेकिन उनका अभिप्राय यह था कि यूएई ईरान के खिलाफ हमले में सीधे शामिल था। यह भी वास्तविकता है कि ब्रिक्स के अधिकांश देश अमेरिका और इजराइल की निंदा कर रहे हैं और ब्रिक्स देशों में बहुमत का समर्थन ईरान के साथ है। इस्लामाबाद वार्ता की विफलता के बाद सबकी नजरें ब्रिक्स की ओर लगी हुई हैं। दुनिया की उम्मीद है कि ब्रिक्स एक रचनात्मक और स्थिरकारी भूमिका निभाएगा लेकिन ऐसा तब होगा जब ब्रिक्स खुद को मजबूत बनाए। ​​ब्रिक्स को शांति आैर स्थिरता की रक्षा करने में स्वतंत्र भूमिका निभानी होगी। भविष्य में अमेरिकी दादागीरी का मुकाबला करने के लिए ब्रिक्स को अपनी मुद्रा चलाने के लिए आगे बढ़ना होगा। ऊर्जा सुरक्षा के लिए नई साझेदारियां स्थापित करनी होंगी और समस्या के अनुसार अपने साझेदार चुनने होंगे और बहुपक्षीय ढांचे तैयार करने होंगे।

Aditya Chopra

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