हम सभी जानते हैं कि जीवन केवल सांसों का चलना नहीं है। जीवन का असली अर्थ है चेतना, सम्मान और गरिमा। एक मां-बाप के लिए सबसे बड़ा दर्द अपने बच्चे को खोना और उससे भी बड़ा दर्द है उसे वर्षों से पीड़ा में अचेत बने देखना। उससे भी ज्यादा पीड़ा, दर्द हरीश राणा के केस में हम समझ सकते हैं। कभी-कभी सबसे बड़ा प्रेम किसी को पकड़कर रखने में नहीं, बल्कि उसकी पीड़ा को समझने में होता है और दूसरी तरफ न्याय की असली शक्ति तब दिखाई देती है जब कानून के साथ करुणा भी खड़ी हो। हरीश राणा के िलए अदालत में केवल एक फैसला नहीं हुआ, बल्कि मानवता और संवेदना की एक नई मिसाल बनी, क्योंकि समाज तभी महान बनता है जब हम दूसरों के दर्द को महसूस करना सीखते हैं। हरीश राणा का मामला हमें यही सिखाता है कि न्याय केवल कानून से नहीं, बल्कि मानवता और संवेदना से भी होता है।
हरीश राणा एक युवा थे, उनके भी सपने थे, उनका भी भविष्य था और उनके माता-पिता की बहुत सारी उम्मीदें थीं लेकिन एक दुर्घटना ने उनकी जिन्दगी को ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया जहां वे वर्षों तक कोमा की स्थिति में पड़े रहे। उनका शरीर जीवित था लेकिन जीवन की चेतना जैसे कहीं खो गई थी। सोचिये उस मां की स्थिति कैसी होगी जो हर दिन अपने बेटे के पास बैठती होगी और यह उम्मीद करती होगी कि शायद वो किसी समय आंखें खोल दे और उस पिता का क्या जिसने अपने बेटे के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया और उस भाई को नमन जो अपने भाई की सेवा कर रहा था, काम पर भी जा रहा था। माता-पिता, भाई ने इलाज, सेवा में कोई कमी नहीं रखी। हरीश की पहले की फोटो आैर अब की फोटो देखकर दिल रो पड़ता है। सोचो कि एक मां-बाप के िलए इससे बड़ा दर्द क्या हो सकता है कि उन्हें अपने ही बेटे के बारे में अदालत से कहना पड़ा कि उसे इस पीड़ा से मुक्ति दी जाए। यह एक कानूनी याचिका नहीं थी, वह एक मां-बाप के टूटे हुए दिल की पुकार थी। जज के सामने भी एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी थी। उनके सामने केवल कानून की किताब नहीं थी, उनके सामने एक परिवार का दर्द भी था। जज को भी जजमेंट देने के लिए बड़ा दिल करना पड़ा। उनके िलए यानि जज के लिए जीवन की रक्षा करना भी जरूरी है और साथ ही मानव गरिमा का सम्मान करना भी उतना जरूरी है। ऐसे मामलों में निर्णय लेना बहुत आसान नहीं होता, क्योंकि अदालत का हर फैसला समाज के लिए एक उदाहरण बन जाता है। बहुत गहराई से सोचो, डॉक्टरों की रिपोर्ट देखने और कानूनी सिद्धांतों को समझने के बाद अदालत ने निर्णय लिया, क्योंकि यह निर्णय सिर्फ कानून का ही नहीं बल्कि संवेदना और करुणा से भरा हुआ है। कहते हैं जज भी बड़े भावुक थे और एक की आंखों में आंसू थे। मेरा यह सब लिखते भी दिल कांप रहा है। हरीश के पिता की भावुकता से भरी स्टेटमेंट देखी तो वो भी बड़ी भावुक करने वाली थी। हे ईश्वर ऐसा दिन किसी दुश्मन को भी न दिखाये।
जस्टिस पारदीवाला फैसला सुनाते वक्त भावुक हो उठे। उन्होंने अमेरिकी धर्मगुरु हेनरी वार्ड बीचर के शब्दों का हवाला देते हुए कहा, ‘ईश्वर मनुष्य से यह नहीं पूछते कि वह जीवन स्वीकार करता है या नहीं, उसे जीवन लेना ही पड़ता है।’उन्होंने विलियम शेक्सपीयर के प्रसिद्ध नाटक हेलमेट की पंक्ति “To be or not to be” का भी जिक्र करते हुए कहा कि अदालतों को कई बार इसी तरह के प्रश्नों के संदर्भ में “मरने के अधिकार” पर विचार करना पड़ता है। लाइफ सपोर्ट हटाने का निर्णय दो आधारों पर होना चाहिए- यह हस्तक्षेप चिकित्सा उपचार की श्रेणी में आता हो। यह मरीज के सर्वोत्तम हित में हो। अदालत ने यह भी कहा कि डॉक्टर का कर्त्तव्य मरीज का इलाज करना है लेकिन जब मरीज के ठीक होने की कोई संभावना न हो तो यह कर्त्तव्य उसी रूप में कायम नहीं रहता।
मेरा भारी मन कह रहा है कि इस उदाहरणीय फैसले के बाद लिविंग विल की चर्चा बढ़ी है और लिविंग विल वह दस्तावेज है जिसमें व्यक्ति पहले से लिख सकता है कि यदि भविष्य में असाध्य बीमारी से पीड़ित हो जाए तो उसे लाइफ सपोर्ट पर न रखा जाए इससे व्यक्ति की इच्छाओं का सम्मान किया जा सकता है। सच तो यह है कि इसके साथ ही अब सामाजिक और नैतिक बहस छिड़ गई है। देहदान के उनके उदाहरण भी अदालतों में भरे पड़े हैं लेकिन हरीश राणा केस ने कई महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने संसद को स्पष्ट कानून बनाने की वकालत भी की है। मेरा मानना है कि हरीश राणा का केस भारतीय इंसाफ के मंदिर में एक मील का पत्थर साबित होगा। जीवन का अधिकार जीने के साथ-साथ अगर मौत की बात करें तो वह गरिमापूर्ण तरीके से होनी चाहिए, यह फैसला इच्छा मृत्यु के लिए एक नजीर बनेगा और मानवता के आधार पर हमारे न्याय के मंदिर के पुजारियों को इस कलम का बार-बार सलाम है। मैं ऐसे न्यायधीशों और माता-पिता को बड़े दिल से नमन करती हूं।
मानवता और संवेदना से भरा न्याय…
Summary :
हम सभी जानते हैं कि जीवन केवल सांसों का चलना नहीं है। जीवन का असली अर्थ है चेतना, सम्मान और गरिमा। एक मां-बाप के लिए सबसे बड़ा दर्द अपने बच्चे को खोना और उससे भी बड़ा दर्द है उसे वर्षों से पीड़ा में अचेत बने देखना। उससे भी ज्यादा पीड़ा, दर्द हरीश राणा के केस में हम समझ सकते हैं। कभी-कभी सबसे बड़ा प्रेम किसी को पकड़कर रखने में नहीं, बल्कि उसकी पीड़ा को समझने में होता है और दूसरी तरफ न्याय की असली शक्ति तब दिखाई देती है जब कानून के साथ करुणा भी खड़ी हो। हरीश राणा के…


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