जम्मू-कश्मीर को लेकर अमेरिका के भारत में राजदूत श्री सर्जियो गोर ने जो वक्तव्य दिया है वह इसलिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि इससे 5 अगस्त 2019 को भारत की संसद द्वारा उठाये गये कदम को अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता का दायरा लगभग सर्वस्वीकार्यता के स्तर तक पहुंचता है और इस मामले में पाकिस्तान द्वारा की गई हाय-तौबा की निरर्थकता सिद्ध करता है। श्री गोर ने कहा है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अहम हिस्सा है जिसकी खूबसूरती बेमिसाल है अतः अमेरिका अपने देश के लोगों को इस क्षेत्र का भ्रमण करने के बारे में पूर्व में जारी सलाह में संशोधन करने पर विचार करेगा। हालांकि 5 अगस्त 2019 के बाद कई अवसरों पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कश्मीर को भारत-पाकिस्तान के बीच का विवाद बताया है। लेकिन पाकिस्तान इसके बावजूद कश्मीर का मुद्दा अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर उठाने से बाज नहीं आया है मगर इस मामले में उसे चीन के अलावा बहुत कम देशों से ही आंशिक समर्थन मिल पाया है।
5 अगस्त 2019 को भारत की संसद के दोनों सदनों ने गृहमन्त्री श्री अमित शाह की पहल पर अनुच्छेद 370 को खत्म करके इस राज्य को दो केन्द्र प्रशासित हिस्सों जम्मू-कश्मीर व लद्दाख में विभक्त कर दिया था। इसके बाद से जम्मू-कश्मीर की सीमित अधिकारों वाली विधानसभा के चुनाव भी हो चुके हैं और वहां अब नेशनल कान्फ्रेंस पार्टी की श्री उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में चुनी हुई सरकार चल रही है। बेशक इस सरकार के अधिकार बहुत सीमित हैं और सीधे केन्द्र सरकार के हाथ में उपराज्यपाल के जरिये राज्य की कानून व्यवस्था आती है मगर लोगों की दैनन्दिन की समस्याओं को हल करने के अधिकार अब्दुल्ला सरकार के पास हैं। यह व्यवस्था भारत के संविधान के अन्तर्गत ही स्थापित है और इसमें सुधार करने की मांग भी संविधान के तहत ही राज्य सरकार पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग कर कर रही है। जाहिर है कि जम्मू-कश्मीर के लोग भारतीय संविधान के दायरे में ही अपने लोकतान्त्रिक अधिकारों में बढ़ौतरी चाहते हैं जिससे यही नतीजा निकलता है कि जम्मू-कश्मीर भी भारतीय संघ का उसी प्रकार हिस्सा है जिस प्रकार इसके अन्य राज्य। जहां तक 370 का सवाल है तो वह आजादी के तुरन्त बाद अस्थायी तौर पर संविधान में इसीलिए जोड़ी गई थी जिससे जम्मू-कश्मीर भारतीय संघ का हिस्सा बना रहे। बेशक इसके तहत राज्य को कुछ विशेषाधिकार प्राप्त थे मगर इससे राज्य के लोगों को वे नागरिक अधिकार प्राप्त नहीं हो रहे थे जो संविधान देश के दूसरे राज्यों के नागरिकों को देता है इसलिए इसका खत्म होना भारत की एकता को मजबूत करने वाला समझा गया और देश के लगभग सभी लोगों ने इसका स्वागत भी किया। मगर पाकिस्तान और चीन ने इस पर आपत्ति जाहिर की।
चीन ने तो यहां तक कहा कि भारत को यथास्थिति में बदलाव लाने का कोई अधिकार नहीं है क्योंकि इससे भारत व चीन के बीच के समझौते की अवहेलना होती है परन्तु चीन का यह प्रलाप पूरी तरह बेमानी था क्योंकि जम्मू-कश्मीर के बारे में किसी भी प्रकार का अन्तिम फैसला करने का अधिकार खुद 370 ही देती थी जिसका प्रथम वाक्य यही था कि जम्मू-कश्मीर भारतीय संघ का अभिन्न भाग है। इसके साथ ही इस मुद्दे पर रूस ने भारत का पूरा साथ देते हुए साफ कर दिया था और कहा था कि जम्मू-कश्मीर भारत का आन्तरिक मामला है। वैसे एेतिहासिक तौर पर देखा जाये तो सोवियत संघ (रूस) भारत की आजादी के समय से ही जम्मू-कश्मीर को भारत का हिस्सा मानता रहा है। पचास के दशक में जब सोवियत नेता ख्रुश्चेव अपने कुछ अन्य साथियों के साथ भारत की लम्बी यात्रा पर आये थे तो उहोंने श्रीनगर की धरती पर ही खड़े होकर कहा था कि जम्मू-कश्मीर समस्या का हल हो चुका है और इसका पूर्ण विलय भारत में हो चुका है परन्तु उस समय अमेरिका समेत पश्चिमी यूरोपीय देश परोक्ष रूप से पाकिस्तान की हामी भरा करते थे और इसी वजह से जम्मू-कश्मीर की समस्या अन्तर्राष्ट्रीय समस्या भी बनी थी। बेशक भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पं. जवाहर लाल नेहरू पाकिस्तान के कश्मीर में हुए आक्रमण के खिलाफ खुद राष्ट्रसंघ में गये थे मगर उनकी मंशा जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान को अनाधिकार आक्रमणकारी देश घोषित कराने की ही थी। उनके इस कदम की आलोचना तात्कालिक परिस्थितियों को देखते हुए की जा सकती है क्योंकि तब पाकिस्तान ने अपनी सेनाओं के माध्यम से बलूचिस्तान को बलात अपने भूभाग में मिला लिया था जबकि बलूची जनता इसके पक्ष में नहीं थी।
पाकिस्तान की इस जोर-जबर्दस्ती के खिलाफ राष्ट्रसंघ में पत्ता तक नहीं हिला था। जबकि राष्ट्रसंघ ने कश्मीर मुद्दे पर भारत-पाक की सेनाओं के बीच युद्ध विराम लागू कर दिया था जिसकी वजह से कश्मीर घाटी का एक तिहाई हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में रह गया। लेकिन इसके बाद पाकिस्तान ने नेहरू जी के जीवित रहते कभी भी कश्मीर में आक्रमण करने की हिम्मत नहीं जुटाई और अपनी मृत्यु से कुछ दिन पहले ही जब उन्होंने जम्मू-कश्मीर के नेता शेख मुहम्मद अब्दुल्ला को नजरबन्दी से मुक्त करके पाकिस्तान भेजा तो पाकिस्तान के तत्कालीन फौजी शासक जनरल अयूब ने शेख अब्दुल्ला को नेहरू का गुर्गा बताते हुए अगले कुछ महीने बाद ही भारत आने को स्वीकृति दे दी। यह इतिहास के गर्भ में ही दबा रह गया कि जनरल अयूब कश्मीर विवाद के हल की किस शर्त पर राजी हो गये थे क्योंकि 27 मई 1964 को नेहरू जी की मृत्यु हो गई और उसी दिन शेख अब्दुल्ला अपनी पाकिस्तान यात्रा का समापन करके पाक के कब्जे वाले मुजफ्फराबाद शहर में एक जनसभा को सम्बोधित कर रहे थे । नेहरू जी की मृत्यु की खबर उन्हें जनसभा में ही मिली थी। मैंने यह वृतान्त इतिहास की सही पृष्ठभूमि उजागर करने की दृष्टि से लिखा है जिससे जम्मू-कश्मीर के बारे में पाकिस्तान के खोखले दावों का सच सामने आ सके और वर्तमान सन्दर्भों में हम उनकी समीक्षा कर सकें। मगर इसके बाद 1972 में बांग्लादेश युद्ध के बाद जब भारत-पाकिस्तान के बीच शिमला समझौता हुआ तो तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने पाकिस्तानी सदर जुल्फिकार अली भुट्टो से लिखित में ले लिया कि कश्मीर सहित दोनों देशों के बीच जितने भी मसले हैं उन सभी का हल केवल आपसी बातचीत के जरिये ही होगा। इस प्रकार कश्मीर भारत -पाक के बीच का मसला होकर रह गया। अतः अमेरिकी राजदूत के ताजा बयान से पाकिस्तान का छटपटाना समझा जा सकता है क्योंकि नब्बे के दशक के अन्तिम वर्षों से पुनः उठे कश्मीर विवाद को भारत-पाकिस्तान के बीच सीमित करने की प्रक्रिया का यह मजबूत पड़ाव समझा जायेगा। मगर अमेरिका के इस रुख को भारत गारंटी के रूप में भी नहीं ले सकता है क्योंकि हाल के दिनों में पाकिस्तान के साथ उसके प्रगाढ़ सम्बन्धों को न तो हम भूल सकते हैं और न इतिहास के सन्दर्भों में। अतः गोर के बयान की हमें पश्चिम एशिया की बदलती भू-राजनैतिक परिस्थितियों के बीच परख कर ही अपनी प्रतिक्रिया देनी होगी और कश्मीर मसले पर किसी भी तीसरे पक्ष की भूमिका को नकारना होगा।
कश्मीर की सर्व-स्वीकार्यता
Summary :
जम्मू-कश्मीर को लेकर अमेरिका के भारत में राजदूत श्री सर्जियो गोर ने जो वक्तव्य दिया है वह इसलिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि इससे 5 अगस्त 2019 को भारत की संसद द्वारा उठाये गये कदम को अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता का दायरा लगभग सर्वस्वीकार्यता के स्तर तक पहुंचता है और इस मामले में पाकिस्तान द्वारा की गई हाय-तौबा की निरर्थकता सिद्ध करता है। श्री गोर ने कहा है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अहम हिस्सा है जिसकी खूबसूरती बेमिसाल है अतः अमेरिका अपने देश के लोगों को इस क्षेत्र का भ्रमण करने के बारे में पूर्व में जारी सलाह में संशोधन करने पर विचार…



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