कल तक तो बेटों के बारे में सुनते थे कि वे मां-बाप का बुढ़ापें में तिरस्कार करते हुए उन्हें छोड़ देते हैं परन्तु अब तो बेटियां भी सामने आ गई हैं। कभी बेटियों को बेटों की तुलना में माता-पिता के प्रति ज्यादा सेवा भावना रखने वाली बताया जाता था परन्तु अब समय तेजी से बदल गया है। मैं पिछले 22 वर्षों से बुजुर्गों को समर्पित वरिष्ठ नागरिक केसरी क्लब चला रही हूं तो मुझे इस चीज का अहसास है कि बुजुर्गों को हमारे यहां अपनी संतान द्वारा अपना सम्मान खो जाने के बाद यहां प्यार और खुशी मिलती है लेकिन फिर भी वह अपनी संतान द्वारा किए गए अपने अपमान को भूल नहीं पाते। यह सब देखकर आंखों में आंसू आ जाते हैं। अगर बेटियां किसी वृद्ध आश्रम संचालक को अपने पिता की अंत्येष्टि के वक्त यह कह दें कि 51 सौ रुपए भेज रही हूं, आप हमारे पिता का संस्कार कर दो और मुझे मोबाइल पर वीडियो भेज दो तो दिल सचमुच रो पड़ता है। पिछले दिनों की यह घटना सोशल मीडिया पर बहुत वायरल हुई, बताती है कि किस तरह से आश्रम संचालक ने यह राशि लेने से इंकार कर दिया लेकिन इसी सोशल मीडिया पर यह भी जमकर वायरल हुआ कि बेटियों के इस व्यवहार से पिता की आत्मा को शांति नहीं मिलेगी।
एक अन्य घटना में एक पुत्र ने अमेरिका से आकर पिता की अंत्येष्टि में भाग लेने से इसलिए मना कर दिया कि वह काम में व्यस्त है। मां-बाप आखिरी सांस तक जिस औलाद के लिए और उसे विदेश भेजने के लिए खुद कष्ट सहकर उसके लिए पैसे जोड़ते रहे और इसी बूढ़े बाप को आखिरी समय में बेटे का कंधा भी नसीब न हो सका। लोग कहने लगे हैं कि घोर कलयुग आ गया है। मैं मानती हूं कि कुछ बच्चे बहुत अच्छे हैं तथा कुछ बच्चे हद से ज्यादा बुरे हैं लेकिन फिर भी माता-पिता के बुढ़ापे में उनका अकेलापन खत्म करने व उन्हें खुश करने के लिए कुछ न कुछ व्यवस्था तो होनी ही चाहिए। इन दोनों घटनाओं ने हृदय को चीर कर रख दिया है। बेटा हो या बेटी हो उनके न आने की मजबूरियां हो सकती हैं लेकिन माता-पिता के प्रति फर्ज निभाने के लिए कुछ न कुछ व्यवस्थाएं जरूर होनी चाहिए। मां-बाप की मौत के बाद उनके नाम पर बड़े-बड़े क्रियाकर्म आयोजित करके दिखावे की क्या जरूरत है? इससे क्या लाभ है? बच्चे क्यों नहीं समझते कि माता-पिता ने सारी जिन्दगी उनकी सुख-सुविधाओं के लिए लगा दी और अब वे उन्हें सहारा देने की बजाय अकेला छोड़ रहे हैं या वृद्ध आश्रमों में भेज रहे हैं। मैं पिछले 22 वर्षों से बुजुर्गों की बातों को, उनकी पीड़ा को समझ रही हूं और मानती हूं कि समाज में कमी तो है लेकिन माता-पिता की खुशी के लिए व्यवस्था तो जरूरी है। संतान को समझना चाहिए कि आज जो बोएंगे कल वही काटेंगे। आप मां-बाप को प्यार देंगे तो कल को बच्चे भी आपको उतना ही प्यार देंगे। मैंने समाज में बहुत परिवारों को जोड़ा है और उनकी समस्याएं हल की हैं। बेटे-बेटियां एक समान हैं, यही समझाकर मैंने एक सकारात्मक अपरोच के साथ काम किया है। मां-बाप इस चीज को समझते हैं तो बच्चों को भी यह समझना चाहिए। माता-पिता की सेवा, सम्मान करते हैं वे व्यस्त रहें और मस्त रहें।
वृद्धावस्था में माता-पिता को अपने बच्चों से प्यार और सहारे की जगह दुत्कार मिले तो भारत में मातृ देवो भव: पितृ देवो भव: की संस्कृति कलंकित हो जाती है।
पंजाब केसरी ने लगभग दो दशक पहले जब परिवारों में बुजुर्गों की उपेक्षा और तिरस्कार के चलते उनके सम्मान की सुरक्षा के लिए वरिष्ठ नागरिक केसरी क्लब की स्थापना की थी तो यह पहल आज समाज की जरूरत बन गई है। उनके बुढ़ापे की जरूरतें पूरी करने के लिए पैसे से लेकर मनोरंजन के साधन जुटाने तक का काम वरिष्ठ नागरिक केसरी क्लब के प्लेटफार्म से किया गया। आज दिल्ली से लेकर पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात तक वरिष्ठ नागरिक केसरी क्लब की शाखाएं हैं और बुजुर्गों के आत्मसम्मान के लिए ढेरों प्रतियोगिताएं तक आयोजित की गईं। मैं यह काम खुद अपनी टीम के हजारों सदस्यों के साथ मिलकर करती हूं। बुजुर्गों की पीड़ा को समझ सकती हूं।
कुछ मामलों में बच्चे आर्थिक रूप से सक्षम होने के बावजूद माता-पिता की देखभाल नहीं करते। कहीं माता-पिता को वृद्धाश्रम भेज दिया जाता है, कहीं संपत्ति के विवाद में उनसे संबंध तोड़ लिए जाते हैं और कहीं बच्चे विदेश या दूसरे शहरों में जाकर इतने दूर हो जाते हैं कि माता-पिता के जीवन में उनकी उपस्थिति केवल फोन तक सीमित रह जाती है। पहले संयुक्त परिवारों में दादा-दादी, माता-पिता, चाचा-चाची और बच्चे एक ही घर में रहते थे। बुजुर्ग परिवार के निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे लेिकन अब वे दुत्कार दिए जाते हैं। मैं तो यह कहूंगी कि ‘बुजुर्ग कदमों की धूल नहीं माथे की शान हैं’, हमारा थीम भी यही है िक आओ चलें उनके साथ जिन्होंने हमें चलना सिखाया। जिस व्यक्ति ने बचपन में हमें चलना सिखाया, उसके बुढ़ापे में उसके कदम धीमे हो जाएं तो उसे सहारा देना हमारा नैतिक कर्त्तव्य होना ही चाहिए। कानून की बात करें तो माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण तथा कल्याण की व्यवस्था की गई है। मेरा यह मानना है कि केवल कानून बनाकर समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता। माता-पिता की सेवा अदालत के आदेश से नहीं, संस्कार और संवेदना से होनी चाहिए। माता-पिता को महीने में एक बार पैसे भेज देना पर्याप्त नहीं है। उन्हें यह महसूस होना चाहिए कि उनका बेटा या बेटी उनके जीवन में मौजूद है। बुजुर्गों का सम्मान जरूरी है तभी समाज आैर उसका भविष्य सुरक्षित है। याद रखो कि माता-पिता की सेवा केवल कर्त्तव्य और संस्कार ही नहीं बल्कि मानव होने की पहचान है तभी तो श्रवण कुमार व श्रीराम, लखन जैसे पुत्रों आैर आदर्श परिवारों के अतुलनीय उदाहरण भारत में िमलते हैं जिसे दुनिया भी मानती है।
क्या बुजुर्ग माता-पिता संतान पर बोझ हैं?
Summary :
कल तक तो बेटों के बारे में सुनते थे कि वे मां-बाप का बुढ़ापें में तिरस्कार करते हुए उन्हें छोड़ देते हैं परन्तु अब तो बेटियां भी सामने आ गई हैं। कभी बेटियों को बेटों की तुलना में माता-पिता के प्रति ज्यादा सेवा भावना रखने वाली बताया जाता था परन्तु अब समय तेजी से बदल गया है। मैं पिछले 22 वर्षों से बुजुर्गों को समर्पित वरिष्ठ नागरिक केसरी क्लब चला रही हूं तो मुझे इस चीज का अहसास है कि बुजुर्गों को हमारे यहां अपनी संतान द्वारा अपना सम्मान खो जाने के बाद यहां प्यार और खुशी मिलती है लेकिन…



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