क्या कयामत है कि राजस्थान के शिक्षा मन्त्री श्री मदन दिलावर अपने राज्य के बच्चों को भैंसों के तबेले में स्कूल चला कर पढ़ा रहे हैं और बेशर्मी के साथ कह रहे हैं कि ‘स्कूल ऐसा पवित्र स्थल होता है जहां बालकों के उज्ज्वल भविष्य की नींव रखी जाती है। स्कूलों में शिक्षा के मूल महत्व पर जोर होना चाहिए न कि राजनीति पर’। उनकी इस बानगी पर कौन न फिदा हो जाये क्योंकि जयपुर के समीप बगूरी विधानसभा क्षेत्र के गांव रामपुरा कंवरपुरा में जब कल काॅकरोच जनता पार्टी से जुड़े कुछ कार्यकर्ता इसके सह-संयोजक श्री आशुतोष रांका के नेतृत्व में इस स्कूल का निरीक्षण करने के लिए पहुंचे तो उन पर कुछ कथित ग्रामवासियों ने हिंसक हमला कर दिया और उन्हें गांव में प्रवेश तक करने से रोका। श्री रांका का आरोप है कि हिंसा करने वालों में गांव के केवल गिनती के ही लोग थे जबकि अधिसंख्य लोग बाहर से बुलाये गये थे और उन पर हमला सुनियोजित था। पिछले तीन साल से गांव का यह स्कूल भैंसों के तबेले में चल रहा है और राज्य सरकार चादर तान कर सोये पड़ी है। जबकि पूरा देश जानता है कि राजस्थान में प्राइमरी शिक्षा किस जर्जर अवस्था में पहुंच चुकी है। मगर देखिये तो सितम कि पिछले सोमवार को मदन दिलावर ने शिक्षा विभाग से तुगलकी फरमान जारी करवा दिया कि सरकारी स्कूलों में किसी भी बाहरी व्यक्ति का प्रवेश प्रतिबन्धित होगा और कोई भी छात्र या शिक्षक स्कूल की स्थिति के बारे में बिना अनुमति के कोई भी वीडियो आदि जारी नहीं कर सकेगा।
लोकतन्त्र में जब सरकारें ऐसे फरमान जारी करती हैं तो समझना चाहिए कि वे पूर्णतः निकम्मेपन व नाकारेपन के मुंहाने पर जाकर बैठ गई हैं और अपनी पोल खुलने के डर से घबराई हुई हैं। राजस्थान सरकार की हालत कुछ एेसी ही दिखाई पड़ती है। नहीं भूला जाना चाहिए कि राजस्थान स्व. मोहनलाल सुखाडि़या का प्रदेश है जिन्होंने राज्य की शिक्षा व्यवस्था में सुधार लाने के लिए सबसे ज्यादा जोर प्राइमरी शिक्षा पर ही दिया था और सरकारी क्षेत्र में बेहतर गुणवत्ता के स्कूल खुलवाये थे मगर आज के राजस्थान में शिक्षा मन्त्री तबेलों में स्कूल चला कर बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की बुनियाद रखने का उपदेश दे रहा है। सवाल सिर्फ एक गांव का नहीं है बल्कि आधारभूत रूप से पूरे देश की ही शिक्षा प्रणाली का है क्योंकि विभिन्न राज्यों में धड़ाधड़ सरकारी स्कूल बन्द हो रहे हैं और निजी महंगे स्कूलों की बाढ़ आयी हुई है।
राजस्थान तो ऐसा राज्य रहा है जिसके सेठों ने निजी क्षेत्र में धर्मार्थ कार्य करते हुए स्कूल व काॅलेजों का निर्माण कराया जिससे गरीब का बच्चा भी कम फीस देकर बेहतर किस्म की शिक्षा प्राप्त कर सके परन्तु जब से देश में आर्थिक उदारीकरण के बाद शिक्षा व स्वास्थ्य क्षेत्र को मुनाफे के सौदे में बदल दिया गया तब से नई पीढि़यों के सेठों ने भी इस तरफ उदासीनता दिखानी शुरू कर दी मगर आज भी देशभर में हमें विभिन्न मारवाड़ी सेठों के नाम पर चलने वाले विद्यालय मिल जाते हैं। एेसे वातावरण में लोकतान्त्रिक व्यवस्था में चुनी हुई सरकारों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है क्योंकि गरीबों के बच्चों को भी शिक्षित होने में मदद करना सरकारों का दायित्व होता है। देश के महान समाजवादी चिन्तक राजनेता डाॅ. राम मनोहर लोहिया की स्कूली शिक्षा भी एक मारवाड़ी विद्यालय में ही हुई थी। इसी से अन्दाजा लगाया जा सकता है उस समय हमारे ‘देशज’ विद्यालयों की स्थिति कैसी थी। मगर आज राजस्थान में ही सरकार ने एेसी हालत कर दी है कि बच्चे गाय-भैंसों के तबेलों में पढ़ रहे हैं। होना तो यह चाहिए था कि स्व. सुखाड़िया की परंपरा को जीवित रखते हुए राज्य के सभी सरकारी विद्यालय आदर्श विद्यालयों में तब्दील होते मगर हुआ यह है कि भैंसें व बच्चे एक साथ रहने को मजबूर हैं। मगर इससे भी ज्यादा दुखदायी यह है कि जो लोग इस स्थिति को बदलने का प्रयास करते हैं उन पर ही हमला करवाया जाता है। राज्य सरकार ने क्या कभी यह प्रयास किया है कि वह अपने स्कूलों की हालत जानने के लिए वार्षिक आधार पर सख्त लेखा-जोखा करवाये और पैमाने पर खरे न उतरने वाले स्कूलों की हालत में तुरन्त सुधार किया जाये। यदि ऐसा होता तो पिछले तीन साल से रामपुरा का स्कूल तबेले में न चल रहा होता।
जहां तक बाहरी लोगों के स्कूलों में प्रवेश का सवाल है तो आम नागरिकों को यह अधिकार है कि वे सभी सरकारी संस्थाओं की कारगुजारियों के बारे में विस्तृत जानकारी ले सकें और आम लोगों को इस बारे में सचेत भी कर सकें। संसद द्वारा बनाये गये सूचना के अधिकार कानून की बुनियाद भी यही है। अतः काॅकरोच जनता पार्टी जो ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान चला रही है उसका सम्बन्ध इस देश के लोगों के बुनियादी हकों से है। सरकारी विद्यालय आम जनता से वसूले गये राजस्व के जरिये ही चलते हैं अतः आम जनता को यह जानने का अधिकार रहता है कि हर पांच साल बाद उसके द्वारा चुने गये सेवादार अपना काम ठीक ढंग से कर रहे हैं या नहीं। बेशक इसके लिए लोकतन्त्र में कुछ नियम-कायदे भी होते हैं जिससे लोकतान्त्रिक प्रणाली अनुशासित तरीके से अपने दायित्वों का निर्वाह कर सके मगर इसका मतलब यह कदापि नहीं होता कि सस्ती राजनीति की गोटें बिछा कर गांव वालों को ही शिक्षा व्यवस्था में सुधार का विरोधी बनाने का कुप्रयास किया जाये। अतः राजस्थान सरकार को अपने गिरेबान में झांकना होगा और सरकारी स्कूलों के खुले लेखे-जोखे के लिए खुद को तैयार करना होगा जिससे भारत के नौनिहालों का भविष्य उज्ज्वल बन सके। हालांकि यह समस्या का एक ही पहलू है। दूसरा पहलू शिक्षकों की बदहाल स्थिति से भी जुड़ा हुआ है जिस पर फिर कभी चर्चा करूंगा। फिलहाल इतना ही जानना काफी है कि विकसित देशों में प्राइमरी शिक्षक के वेतन और एक उच्च शिक्षा देने वाले प्रोफेसर के वेतन में ज्यादा अन्तर नहीं होता।
भैंसों के तबेले में स्कूल !
Summary :
क्या कयामत है कि राजस्थान के शिक्षा मन्त्री श्री मदन दिलावर अपने राज्य के बच्चों को भैंसों के तबेले में स्कूल चला कर पढ़ा रहे हैं और बेशर्मी के साथ कह रहे हैं कि ‘स्कूल ऐसा पवित्र स्थल होता है जहां बालकों के उज्ज्वल भविष्य की नींव रखी जाती है। स्कूलों में शिक्षा के मूल महत्व पर जोर होना चाहिए न कि राजनीति पर’। उनकी इस बानगी पर कौन न फिदा हो जाये क्योंकि जयपुर के समीप बगूरी विधानसभा क्षेत्र के गांव रामपुरा कंवरपुरा में जब कल काॅकरोच जनता पार्टी से जुड़े कुछ कार्यकर्ता इसके सह-संयोजक श्री आशुतोष रांका के…


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