संसदीय राजनीति में बढ़ती कर्कश भाषा

संसदीय राजनीति

भारत की संसद में ऐसे अवसर भी आ चुके हैं जब पूरे के पूरे सत्र शोर- शराबे में ही बेकार जाते रहे हैं। ऐसे मौके बोफोर्स कांड से लेकर 2-जी घोटाले तक कई बार आए, मगर ऐसे अवसर भी कम नहीं आये जब संसद के सदस्यों ने अपने राजनीतिक पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में दोनों सदनों में रचनात्मक बहस की और देश को आगे बढ़ाने में अपने कीमती सुझाव रखे। बेशक संसद के चालू बजट सत्र के प्रथम चरण का अवसान हो गया है, मगर उम्मीद की जा रही है कि आगामी 9 मार्च से शुरू होने वाले दूसरे चरण में जब वित्त विधेयक पारित होगा तो संसद गंभीरता का परिचय देते हुए राष्ट्र के समक्ष ज्वलन्त समस्याओं का हल ढूंढेगी और लोगों को आश्वस्त करेगी कि उसके चुने हुए प्रतिनिधी अपने उस दायित्व से बेखबर नहीं हैं जो जनता ने उन्हें सौंपा है।

समाप्त हुए पहले चरण को संभवतः इसलिए याद किया जायेगा कि इसमें राष्ट्रपति के अभिभाषण पर सरकार द्वारा रखे गये धन्यवाद प्रस्ताव पर कोई चर्चा नहीं हो सकी और हद यह हो गई कि न तो विपक्ष के नेता ही बोल पाये और न ही प्रधानमन्त्री अतः प्रस्ताव को सदन में ध्वनिमत से ही पारित कर दिया गया। संसद का जब भी नये साल का बजट सत्र शुरू होता है तो राष्ट्रपति महोदय राज्यसभा व लोकसभा सदस्यों की संयुक्त बैठक बुला कर उसे सम्बोधित करते हैं और देश को सत्तारूढ़ दल की सरकार की नीतियों व कार्यों से अवगत कराते हैं।

राष्ट्रपति हमारी संसद का ही अंग होते हैं क्योंकि उन्हीं के आदेश से संसद का कोई सत्र बुलाया जाता है और उन्हीं के निर्देश पर इसका सत्रावसान होता है। बेशक उनके पास सरकार चलाने के कार्यकारी अधिकार नहीं होते मगर वह ही सरकार के संवैधानिक मुखिया होते हैं । लोकसभा में बहुमत के आधार पर चुनी गई किसी भी राजनीतिक दल की सरकार उनकी ही अपनी सरकार होती है जो उनके नाम पर देश का शासन चलाती है। भारत में राष्ट्रपति के पद का भी हर पांच साल बाद चुनाव होता है। चुनाव संसद व विधानमंडलों के सदस्य करते हैं जिनका चुनाव आम जनता द्वारा प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से किया जाता है अतः भारत के राष्ट्रपति भी जनता के नुमाइन्दे ही होते हैं इसलिए जब वह साल में एक बार संसद के संयुक्त अधिवेशन को सम्बोधित करते हैं तो संसद उनका धन्यवाद ज्ञापन करती है।

एक मायनों में यह भारत के लोकतन्त्र के असली मालिक मतदाताओं के प्रति ही धन्यवाद होता है जिसकी वजह से संसद में यह परंपरा डाली गई कि अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हो, क्योंकि भारत के मतदाता ही सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष में बैठे सभी सांसदों का चुनाव करते हैं। यह भारत के जीवन्त लोकतन्त्र की परंपरा है जो यह सचेत करती है कि सत्ता में बैठाई गई पार्टी की जवाबदेही सीधे मतदाताओं के प्रति होती है, लेकिन इस बार लोकसभा में जो हुआ उसे भविष्य में कभी भी न दोहराने की कसम भी सांसदों को उठानी चाहिए और सुनिश्चित करना चाहिए कि भारत का संसदीय लोकतन्त्र बेदाग रहते हुए चलता रहे, लेकिन लोकसभा के इसी सत्र में इसके अध्यक्ष श्री ओम बिरला के विरुद्ध उन्हें पद से हटाये जाने का प्रस्ताव भी लाया गया।

इसमें कोई पुरानी परंपरा नहीं टूटी है, क्योंकि पूर्व में भी तत्कालीन अध्यक्षों के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आ चुके हैं हालांकि तीनों ही बार ये प्रस्ताव गिर भी गये। आगामी 9 मार्च को जब श्री बिरला के खिलाफ प्रस्ताव आयोगा तो उसका गिरना भी सुनिश्चित है क्योंकि सदन में सत्तारूढ़ दल भाजपा व उसके सहयोगी दलों का पूर्ण बहुमत है अतः विरोध सांकेतिक ही माना जायेगा, मगर संसदीय प्रणाली में इसके नैतिक संकेत काफी गंभीर होंगे । यह नैतिक संकेत यह होगा कि लोकतन्त्र लोकलज्जा से ही नहीं चलता बल्कि यह सीधे लोगों की भागीदारी से भी चलता है। संसद में जो दल विपक्ष में बैठता है उसके सदस्यों के अधिकार भी सत्ता पक्ष के सदस्यों के बराबर ही होते हैं क्योंकि अध्यक्ष की नजर में वे सभी सांसद होते हैं।

सभी सांसदों के एक समान विशेषाधिकार होते हैं। सत्ता पक्ष के सदस्य के पास भी अपनी बात सदन में पूरी तरह बेखौफ रहते हुए कहने का अधिकार होता है। यह केवल विपक्षी सांसदों का ही विशेषाधिकार नहीं होता, मगर यह भी सच है कि सदन अपनी ही बनाई गई नियमावली के अनुसार चलता है जिसमें विपक्षी सांसद सरकार को जवाबदेह ठहराते हैं। विपक्षी सांसद पूरी जिम्मेदारी का परिचय दे सकें और सदन के भीतर केवल सत्य पर आधारित तथ्यों को ही रखें, नियमावली का यही मूल उद्देश्य रहता है, लेकिन हम देख रहे हैं कि लोकसभा में सत्तारूढ़ व विपक्ष के सांसद दो दुश्मनों जैसा व्यवहार कर रहे हैं और एक- दूसरे के प्रति बहुत कर्कश भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं। लोकतन्त्र उस भाषा के इस्तेमाल की इजाजत देता है जिसमें विरोधी के विचारों को भी सम्मान के साथ देखा जाये जिनमे तीखी आलोचना का भाव होता है।

आलोचना लोकतन्त्र का अविभाज्य अंग होती है, क्योंकि आम जनता सत्ता पक्ष व विपक्ष का चुनाव जब करती है तो वह परस्पर एक-दूसरे के विरोधी दलों द्वारा की गई आलोचना के आधार पर ही करती है। लोकतन्त्र में प्रत्येक दल संविधान के प्रति समर्पित होता है मगर समाज व राष्ट्र के विकास के प्रति उनका नजरिया अलग- अलग होता है जिसकी वजह से उनके सिद्धान्तों में अन्तर होता है। जाहिर है कि संसद में जो बजट सरकार की तरफ से इसकी वित्तमन्त्री श्रीमती निर्मला सीतारमन ने रखा उसे विपक्षी नेता अपने नजरिये से उतना कल्याणकारी नहीं मानते जितना कि वे अपने सिद्धान्तों की नजर से उसे बनाने की कूवत रखते, मगर यह बात कड़वाहट भऱे शब्दों की जगह समालोचना की दृष्टि से की जानी चाहिए।

इसी प्रकार भारत- अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर संसद से लेकर सड़क तक जिस तरह बवंडर खड़ा किया जा रहा है उससे यह आभास कराने की कोशिश की जा रही है कि मोदी सरकार ने राष्ट्रीय हितों की परवाह नहीं की है। यह केवल एक नजरिया है, क्योंकि व्यापार समझौता तभी सफल माना जायेगा जबकि उसके सिरे चढ़ने से भारतीयों को भविष्य में लाभ होगा। यदि ऐसा न होता तो स्व. राजीव गांधी अपने कार्यकाल के दौरान भारत में सूचना व कम्प्यूटर क्रान्ति न कर पाते। उनके कार्यकाल के दौरान संसद में बैठे विपक्षी दलों ने कम्प्यूटर प्रणाली शुरू करने पर बवाल खड़ा कर दिया था और कहा था कि इसके आने से भारत मे बेरोजगारी बेइन्तहा बढ़ जायेगी, मगर आज का भारत इसी क्षेत्र में विश्व का सिरमौर बना हुआ है।

इसी प्रकार जब भारत-अमेरिका परमाणु समझौता हुआ था तो विपक्ष ने आसमान सिर पर उठा लिया था। कहने का मतलब इतना सा है कि लोकतन्त्र में जब भी कोई सरकार सत्ता में होती है तो उसका पहला ध्येय राष्ट्रहित व उसके लोगों का विकास ही होता है। अतः विपक्ष को पिछले उदाहरणों से सीख लेते हुए अपने नजरिये में परिमार्जन करना चाहिए और आलोचना करते हुए कठोर शब्दों का कम से कम इस्तेमाल करना चाहिए, लेकिन वर्तमान समय में राजनीति इतनी रंजिश भरी होती जा रही है कि संसद के भीतर भी शब्दों की मर्यादा समाप्त होती जा रही है, मगर इस स्थिति से भी हमे संसद ही बचा सकती है।

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