प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी की हाल में की गई तीन देशों इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया व न्यूजीलैंड की यात्रा को निश्चित रूप से सफलतम व रचनात्मक कहा जायेगा क्योंकि उन्होंने तीनों देशों के साथ भारत के सम्बन्धों को प्रगाढ़ करते हुए नये आयाम दिये हैं और सुनिश्चित किया है कि हिन्द-प्रशान्त महासागरीय क्षेत्र में स्थायी शान्ति को चुनौती न दी जा सके। श्री मोदी ने सबसे अन्त में न्यूजीलैंड की यात्रा की और वहां के प्रधानमन्त्री के साथ द्विपक्षीय वार्ता में यह तय किया कि दोनों देशों के बीच मतभेद का कोई स्थान न रहे। हिन्द-प्रशान्त महासागर क्षेत्र के इन तीनों देशों में उदार लोकतान्त्रिक व्यवस्था है जिसके तहत इन तीनों देशों का निजाम चलता है जबकि भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतन्त्र कहा जाता है अतः बहुत स्वाभाविक है कि इन तीनों देशों के लोगों के बीच भी सम्बन्धों की प्रगाढ़ता होगी। श्री मोदी ने इस मोर्चे पर भी नये रास्ते खोलने का प्रयास किया है। मगर सबसे बड़ी बात यह है कि हिन्द-प्रशान्त महासागरीय क्षेत्र में चीन जिस तरह अपनी सामरिक ताकत का प्रदर्शन करता रहता है उसके प्रति भी श्री मोदी ने सर्वदा सन्तुलन बनाये रखने की अन्तर्दृष्टि का इजहार किया है।
पूर्व में चीन एेसी हरकतें करता रहा है जिनके प्रति इस क्षेत्र के देशों में आशंका रही है। इसी वजह से भारत उस क्वाड समूह का प्रमुख सदस्य है जिसमें जापान, अमेरिका व आॅस्ट्रेलिया भी शामिल हैं। चारों देशों का यह गठबन्धन चीनी जवाब के रूप में भी देखा जाता है। इससे पहले भारत 80 के दशक तक यह मांग करता रहा था कि हिन्द महासागर क्षेत्र को अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति क्षेत्र घोषित किया जाये परन्तु 90 के दशक के शुरू से जिस प्रकार वैश्विक अर्थव्यवस्था भूमंडलीकरण हुआ उससे भू-राजनीतिक गणित बदला और विभिन्न देशों के बाजार एक- दूसरे के लिए आकर्षण का केन्द्र बनते चले गये। सोवियत संघ का विघटन होने से वैश्विक सामरिक समीकरण बदलने लगे और आर्थिक समीकरणों की वजह से राजनीति भी बदलती गई। कम्युनिस्ट चीन देखते-देखते ही पूंजीवादी कम्युनिस्ट देश बन गया और बाद में विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन बैठा। आर्थिक भूमंडलीकरण से भारत में भी परिवर्तन आया और आज यह विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है।
भारत की इस ताकत का संज्ञान आज पूरा विश्व ले रहा है और इसके साथ विश्व के आधुनिकतम देश भी साझा कारोबार करने को लालायित हैं। अतः श्री मोदी अपनी हर विदेश यात्रा में भारत के उन क्षेत्रों में टेक्नोलॉजी सहयोग व विदेशी निवेश पर जोर देते हैं जिन्हें कुछ कमजोर माना जाता है या जिनमें और अधिक विस्तार की संभावना होती है। इस सिलसिले में आॅस्ट्रेलिया यात्रा में उन्होंने इस देश से परमाणु ऊर्जा उत्पादन हेतु यूरेनियम ईंधन प्राप्त करने का करार किया और इंडोनेशिया को भारत की ब्रह्मोस मिसाइलें देने का समझौता किया। वहीं न्यूजीलैंड के साथ कृषि क्षेत्र के डेयरी उद्योग में प्रौद्योगिकी उन्नयन पर जोर दिया। न्यूजीलैंड के आकलैंड हवाई अड्डे पर तो इस देश के प्रधानमन्त्री श्री क्रिस्टोफर लक्सन उन्हें खुद लेने आये। इससे पता चलता है कि न्यूजीलैंड की निगाहों में भारत देश का कितना उच्च सम्मान है। मगर ऑस्ट्रेलिया के साथ भारत ने 2014 में नागरिक ऊर्जा क्षेत्र में परमाणु समझौता किया था। इस समझौते के तहत आॅस्ट्रेलिया भारत के साथ शान्तिपूर्ण उद्देश्य के लिए परमाणु ऊर्जा उत्पादन में सक्रिय भूमिका निभाने को तैयार था। श्री मोदी ने साफ किया कि अब वह क्षण आ चुका है। वैसे 2008 में जब भारत ने अमेरिका के साथ एेतिहासिक परमाणु करार किया था तो उसने वादा किया था कि वह भारत को परमाणु ईंधन सप्लाई करने वाले (एनएसजी) देशों के समूह का सदस्य बनाने के लिए अपने प्रभाव का हर संभव प्रयास करेगा। मगर इस मोर्चे पर अमेरिका ने आंशिक जोश ही दिखाया है। आॅस्ट्रेलिया भी एनएसजी ( न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप) समूह का सदस्य देश है। अतः उसे भारत को यूरेनियम सप्लाई करने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। दरअसल यह दौर विभिन्न देशों द्वारा अपनी-अपनी बाजार व कारोबार क्षमताओं को बढ़ाने का दौर है, इसी वजह से न्यूजीलैंड भी चाहता है कि वह भी भारत के साथ मिल कर इस क्षेत्र में आगे बढे़।
श्री मोदी इस तथ्य से वाकिफ हैं अतः उन्होंने न्यूजीलैंड के प्रधानमन्त्री के साथ अपनी बातचीत में व्यापार व निवेश पर जोर देते हुए उसकी डेयरी उद्योग की टेक्नोलॉजी लेने पर विचार किया। साथ ही क्रीड़ा क्षेत्र में भी सहयोग करने पर बल दिया। डेयरी दुग्ध उत्पादन में फिलहाल भारत दुनिया में पहला स्थान रखता है इसके बावजूद इस क्षेत्र में विविधीकरण की असीम संभावनाएं मौजूद हैं जिससे भारत के डेयरी किसानों की हालत में सुधार आ सके। इसके साथ ही न्यूजीलैंड का खेती-बाड़ी में भी अच्छा स्थान माना जाता है। अतः यह भी विचारणीय है कि श्री मोदी 40 साल बाद इस देश की यात्रा पर क्यों गये हैं। चालीस साल पहले कोई भारतीय प्रधानमन्त्री न्यूजीलैंड की यात्रा पर गया था। इंडोनेशिया से लेकर न्यूजीलैंड तक यात्रा करके उन्होंने यह ही दर्शाया है कि हिन्द-प्रशान्त क्षेत्र के देशों के बीच वह आत्मीयता होनी चाहिए जिसके बल पर ये देश बिना किसी खौफ-ओ-खतर के अपना-अपना विकास कर सकें। न्यूजीलैंड के साथ तो भारत ने कुछ माह पहले ही शुल्क मुक्त व्यापार समझौता किया था। अतः इसके तहत भारत के कृषि क्षेत्र की मजबूती की राह ढूंढना प्रशंसनीय है।





















