पश्चिम वास्तव में, 1947 से ही भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के नाम देश के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने का रिकॉर्ड दर्ज था। उन्होंने करीब 17 वर्षों से कुछ कम समय तक प्रधानमंत्री पद संभाला, सटीक रूप से कहें तो 4398 दिनों तक। इसे एक रिकॉर्ड के रूप में देखा जाता था, जिसके बाद उनकी बेटी इंदिरा गांधी का 4077 दिनों का कार्यकाल इस सूची में शामिल था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दोनों रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है। मोदी के कार्यकाल की यह गणना नेहरू के पहले निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में 1951-52 के पहले आम चुनाव के बाद के कार्यकाल से की जाती है, जिसमें उनके शुरुआती गैर-निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में बिताए गए समय को शामिल नहीं किया गया है। इसी आधार पर दिन की गणना की जाती है। नेहरू के 4398 लगातार दिनों के रिकॉर्ड को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस सप्ताह की शुरुआत में पद पर लगातार 4399 दिन पूरे कर पार कर लिया। मोदी के समर्थक इसे कई उपलब्धियों और पड़ावों के साथ जोड़ते हैं।
पिछले वर्ष ही मोदी ने इंदिरा गांधी के 4077 लगातार दिनों तक प्रधानमंत्री रहने के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ा था। उस समय पार्टी ने इसे ‘रिकॉर्ड तोड़ उपलब्धियों’ के रूप में प्रस्तुत किया था। इनमें कुछ प्रमुख उपलब्धियां इस प्रकार हैं, श्री मोदी भारत की स्वतंत्रता के बाद जन्म लेने वाले पहले और एकमात्र प्रधानमंत्री हैं ; वे गैर-हिंदी भाषी राज्य से आने वाले सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले प्रधानमंत्री हैं और वे भारत के एकमात्र ऐसे नेता हैं जिन्होंने पार्टी प्रमुख के रूप में लगातार छह चुनाव जीते हैं, इनमें तीन राज्य विधानसभा चुनाव और तीन लोकसभा चुनाव शामिल हैं।
बेशक, एक रिकॉर्ड ऐसा भी है जिसे श्री मोदी अभी तक नहीं तोड़ पाए हैं और जिसे तोड़ने की उनकी इच्छा अवश्य होगी। वह है जवाहरलाल नेहरू का लगभग 17 वर्षों तक प्रधानमंत्री पद पर बने रहने का रिकॉर्ड। इस गणना में भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में उनका शुरुआती ‘गैर-निर्वाचित कार्यकाल’ भी शामिल किया जाता है। यह बात अब स्पष्ट है कि भारतीय जनता पार्टी, विशेषकर सरकार के शीर्ष नेतृत्व में-नेहरू को लेकर एक विशेष आग्रह मौजूद है। यही कारण है कि जब कांग्रेस सांसद ने संसद में कहा था कि भाजपा को इस मुद्दे को हमेशा के लिए समाप्त कर देना चाहिए, तो उनका तर्क एक हद तक उचित था।
वर्ष 2025 में ही प्रियंका गांधी ने संसद में कहा था, ‘नेहरू जी से जितनी भी शिकायतें हैं, जितनी भी गलतियां उन्होंने की हैं’ जितनी भी गालियां देनी हैं, जितना भी अपमान करना है, एक सूची बना दीजिए। 999 अपमान, 9099 अपमान, जितनी भी शिकायतें हैं, उनकी सूची बना दीजिए और फिर हम एक समय निर्धारित कर लेते हैं, 10 घंटे, 20 घंटे, जितने घंटों में आपकी ये शिकायतें पूरी हो जाएं। हम बहस कर लेंगे। लेकिन इस सदन का कीमती समय जिसका इस्तेमाल हमें जनता की समस्याओं को हल करने के लिए चर्चा में करना चाहिए, उसे इसी विषय में हमेशा के लिए इस्तेमाल न करें। जैसा अंग्रेजी में कहते हैं -‘एक बार और हमेशा के लिए इस अध्याय को समाप्त कर दें। सुन लीजिए, फिर खत्म कर दीजिए उसके बाद बेरोजगारी, महंगाई जैसे मुद्दों पर चर्चा करें।
प्रियंका गांधी ने यह बात एक मजबूत तर्क के साथ रखी थी। बार-बार, चाहे संसद के भीतर हो या बाहर, सार्वजनिक सभाओं में हो या चुनावी अभियानों के दौरान, भाजपा का मुख्य राजनीतिक हमला यही रहा है कि नेहरू-गांधी परिवार ने क्या गलतियां कीं, कैसे उन्होंने जानबूझकर धीरे-धीरे देश को नुकसान पहुंचाया। कैसे उन्होंने परिवारवाद को बढ़ावा दिया और कैसे देश उन क्षेत्रों में भी पीछे रह गया जहां उसे आगे बढ़ना चाहिए था। इसके साथ ही इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल और एक अर्थ में लोकतंत्र का गला घोंटने के आरोप को भी बार-बार उठाया जाता रहा है।
यह कहने के बाद भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इन तमाम आलोचनाओं के बावजूद कांग्रेस लंबे समय तक देश की एकमात्र अखिल भारतीय पार्टी बनी रही। लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में मोदी के 4399 दिनों के कार्यकाल ने स्थिति को पूरी तरह बदल दिया है। भाजपा अब उस लक्ष्य के बेहद करीब पहुंच चुकी है, बल्कि कई मायनों में उसने वह मुकाम हासिल भी कर लिया है। आज विपक्ष बिखरा हुआ है और राष्ट्रीय नीतियों या कार्यक्रमों को प्रभावित करने की अपनी क्षमता खो चुका है।
इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने भी बहुमत वाली सरकारें चलाई थीं, लेकिन उस समय विपक्ष उतना निष्प्रभावी नहीं था, जितना आज है जबकि वर्तमान में मोदी की पार्टी के पास लोकसभा में केवल 240 सदस्य हैं। इस लिहाज से भाजपा एक तरह से नेहरू युग को दोहरा रही है, क्योंकि उनके शासनकाल में भी विपक्ष का प्रभाव सीमित था। संख्या मौजूद थी, लेकिन आवाज कमजोर थी।
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में मोदी की व्यक्तिगत छवि ने बाकी सभी मुद्दों को पीछे छोड़ दिया है और क्षेत्रीय दल अपनी जगह तलाशने में लगे हुए हैं। अगर पश्चिम बंगाल में एक समय की संघर्षशील और आंदोलनकारी नेता ममता बनर्जी को भाजपा के हाथों करारी हार का सामना करना पड़ा, तो यह सभी क्षेत्रीय दलों के लिए एक स्पष्ट संकेत है। यहां तक कि ‘हमारा बंगाल’ की अवधारणा पर गर्व करने वाले लोग भी यह स्वीकार कर चुके हैं कि मोदी सरकार की कल्याणकारी योजनाओं ने बदलाव लाने में भूमिका निभाई।
इस मुद्दे पर उनका तर्क सही भी है। मोदी की राजनीति को लेकर किसी के भी मतभेद हो सकते हैं, लेकिन उनकी शासन व्यवस्था का मॉडल चर्चा का विषय रहा है और कई बार इसे उनकी सरकार की बड़ी ताकत के रूप में देखा गया है। निश्चित रूप से इसमें कमियां भी हैं, लेकिन भारत जैसे विशाल देश में कुछ चुनौतियों का होना स्वाभाविक है।
महिलाओं को केंद्र में रखकर बनाई गई मोदी सरकार की राजनीति और नीतियों का जमीन पर प्रभाव दिखाई दिया है। शौचालय, व्यक्तिगत बैंक खाते और घरों के स्वामित्व जैसी सुविधाओं के साथ महिलाएं भाजपा, यानी मोदी के लिए एक मजबूत मतदाता वर्ग के रूप में उभरी हैं। समय सीमा के आधार पर पूरी की जाने वाली परियोजनाएं भी मोदी सरकार के पक्ष में काम करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक रही हैं। वह दौर पीछे छूट गया जब परियोजनाओं की आधारशिला रख दी जाती थी, लेकिन वे दशकों तक अधूरी पड़ी रहती थीं। मोदी के व्यक्तिगत प्रयास और दृढ़ संकल्प ने यह दिखाया है कि वे और उनकी सरकार लगातार काम करने वाली सरकार है। प्रधानमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान दिखाई गई ऊर्जा उल्लेखनीय रही है।
हालांकि समय सीमा में पूरी की गई परियोजनाओं को लेकर भी समस्याएं सामने आई हैं पुलों का गिरना और हवाई अड्डों की छतों का उड़ जाना इसके उदाहरण हैं। लेकिन इन समस्याओं को दूर किया जा सकता है और मोदी सरकार को इन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। विश्व मंच पर भी मोदी ने भारत की स्थिति को मजबूत किया है। आज जब मोदी बोलते हैं तो दुनिया सुनती है। आज मोदी ऐसे नेता हैं जिन्हें दुनिया अच्छे और बुरे, दोनों कारणों से नजरअंदाज नहीं कर सकती। उन्होंने भारत को वैश्विक मंच के केंद्र में ला खड़ा किया है। कोई यह तर्क दे सकता है कि यह केवल छवि निर्माण है और इसमें वास्तविकता की कमी है। संभव है, लेकिन आम नागरिक के नजरिए से ये बड़े बदलाव हैं। मोदी सरकार को अपनी सकारात्मक उपलब्धियों को और मजबूत करने के साथ-साथ नकारात्मक पहलुओं को कम करने की दिशा में काम करना होगा। तभी प्रधानमंत्री के रूप में बिताए गए दिनों की यह संख्या वास्तविक मायने रखेगी और लंबे समय तक प्रभावी साबित होगी।
मोदी ने कर दिखाया
Summary :
पश्चिम वास्तव में, 1947 से ही भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के नाम देश के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने का रिकॉर्ड दर्ज था। उन्होंने करीब 17 वर्षों से कुछ कम समय तक प्रधानमंत्री पद संभाला, सटीक रूप से कहें तो 4398 दिनों तक। इसे एक रिकॉर्ड के रूप में देखा जाता था, जिसके बाद उनकी बेटी इंदिरा गांधी का 4077 दिनों का कार्यकाल इस सूची में शामिल था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दोनों रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है। मोदी के कार्यकाल की यह गणना नेहरू के पहले निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में 1951-52 के पहले…


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