नेपाल की नई सियासत

नेपाल की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम देखने को मिला है। बालेन्द्र शाह के प्रधानमंत्री बनते ही नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा आेली, पूर्व गृहमंत्री रमेश लेखक और पूर्व ऊर्जा मंत्री तथा नेपाली कांग्रेस के नेता दीपक खड़का को गिरफ्तार कर​ लिया गया है। पूर्व प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की गिरफ्तारी के बाद विरोध-प्रदर्शन भी हुए हैं। इन पर आरोप है कि पिछले साल जेन-जी आंदोलन के दौरान हुई हिंसा में 77 लोगों की मौत हो गई थी, जिसके लिए वे जिम्मेदार हैं। बालेन्द्र शाह ने चुनाव प्रचार के दौरान वादा किया था कि जेन-जी आंदोलन के दौरान हुई मौतों के लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होगी। पूर्व ऊर्जा मंत्री दीपक खड़का की गिरफ्तारी भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू किए गए अभियान के तहत की गई है। दीपक खड़का पर आरोप है कि उन्होंने सरकारी या सार्वजनिक भूमि पर अवैध कब्जा किया। जेन-जी विरोध-प्रदर्शनों के दौरान उनके घर से भारी मात्रा में नकदी और जले हुए नोट मिले थे। भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच दीपक खड़का के बिजनेस साम्राज्य की चर्चा पहले से ही होती रही है।
गिरफ्तारियों का सिलसिला एक विशेष आयोग की सिफारिशों को लागू करने के बाद शुरू हुआ है। यह आयोग पूर्व जज गौरी बहादुर कार्की की अध्यक्षता में बनाया गया था। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में ओली, रमेश लेखक और तत्कालीन पुलिस प्रमुख चन्द्र कुबेर खापुंग पर केस चलाने की सिफारिश की है। जिन धाराओं के तहत केस बनाया गया है उनमें दोषी पाए जाने पर अधिकतम 10 साल की सजा हो सकती है। इन गिरफ्ता​रियों के चलते राजनीतिक तनाव पैदा हो गया है। के.पी. शर्मा ओली और उनकी पार्टी ने इसे बदले की राजनीति करार दिया है। जबकि नेपाली कांग्रेस ने चुप्पी साध ली है। अब महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या यह गिरफ्तारियां इंसाफ के ​िलए हैं या यह प्रतिशोध की राजनीति है। ये गिरफ्तारियां नेपाल के युवा लोकतंत्र के लिए एक ऐतिहासिक परीक्षा का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो इस बात का संकेत देती हैं कि यहां तक कि पूर्व प्रधानमंत्रियों और मंत्रियों को भी विरोध-प्रदर्शनों के दौरान मानवाधिकारों के उल्लंघन के लिए जवाबदेह ठहराया जा सकता है, जो देश की अशांत राजनीति में एक दुर्लभ घटना है। बालेन्द्र शाह की नई सरकार के लिए, यह “जेनरेशन जेड शहीदों के लिए न्याय” के अपने प्रमुख चुनावी वादे को पूरा करता है जिससे उन युवाओं के बीच उसकी छवि मजबूत होती है जिन्होंने उसे भारी बहुमत से जीत दिलाई। हालांकि इससे ध्रुवीकरण और गहराने का खतरा है। यूएमएल के सड़क प्रदर्शन और संसद में नियोजित विरोध-प्रदर्शन चुनाव के बाद के नाजुक माहौल को अस्थिर कर सकते हैं और टकराव को जन्म दे सकते हैं। नेपाली कांग्रेस का सतर्क रुख संभावित अतिचार के खिलाफ व्यापक विपक्षी एकता में तब्दील हो सकता है। दीर्घकालिक और सफल अभियोजन से कानून का शासन मजबूत हो सकता है और भविष्य में होने वाली दमनकारी कार्रवाइयों को रोका जा सकता है लेकिन विफलता या पक्षपातपूर्ण रवैया जनता के विश्वास को कम कर सकता है और प्रतिशोध की राजनीति से जुड़ी साजिश की थ्याैरी को हवा दे सकता है। आर्थिक और सामाजिक रूप से लंबे समय तक अस्थिरता निवेशकों के विश्वास और चल रहे सुधारों को प्रभावित कर सकती है। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर यह जवाबदेही के प्रति नेपाल की प्रतिबद्धता को उजागर करता है लेकिन न्यायिक स्वतंत्रता पर सवाल खड़े करता है।
चारों ओर जमीन से घिरे इस हिमालयी देश में दशकों से राजनीतिक अस्थिरता व्याप्त है। 1990 के बाद 32 सरकारें सत्ता में आ चुकी हैं और उनमें से कोई भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई है। राजशाही के खात्मे के बाद नेपाल में गणतंत्र स्थापित हुआ लेकिन वह भी राजनीतिक स्थिरता लाने में विफल रहा, तब से सरकार में 15 बार बदलाव हो चुके हैं। सत्ता पूर्व माओवादी विद्रोही दल, उदारवादी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (एकीकृत मार्क्सवादी लेनिनवादी) और नेपाली कांग्रेस के बीच घूमती रही है। खंडित राजनीति के कारण व्यापक जन उदासीनता फैल गई जिससे यह आम धारणा मजबूत हुई कि नेपाल का भ्रष्ट राजनीतिक वर्ग दुनिया के सबसे गरीब लोगों में से एक आम नागरिकों की दुर्दशा की परवाह नहीं करता है। पिछले वर्ष ​िसतम्बर में भ्रष्टाचार विराधी जेन-जी आंदोलन ने जबरदस्त विरोध-प्रदर्शन किए और आंदोलन इतना उग्र हुआ​ कि नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा आेली सरकार को सत्ता से बाहर कर ​िदया गया। उसके बाद हुए संसदीय चुनावों में बालेन्द्र शाह के नेतृत्व वाली आरएसपी को अपने बल पर प्रचंड बहुमत प्राप्त हुआ और सरकार बन गई।
प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह के सामने कई चुनौतियां हैं। उनके सामने कर्जों की अदायगी, महंगाई आैर बेरोजगारी की बड़ी चुनौती है। यद्यपि ओली की गिरफ्तारी चीन के ​िलए एक बड़ा झटका मानी जा रही है। विश्लेषक इसे भारत के हित में मान सकते हैं, क्योंकि ओली के शासनकाल में नेपाल आैर भारत के संबंध बहुत कड़वे रहे। बालेन्द्र शाह को चीन और भारत में भी संतुलन कायम करके चलना होगा तो वहीं नौकरशाही को व्यवस्थित, कानून के शासन को सुनिश्चित आैर न्यायपालिका के मजबूत ढांचे को स्थापित करना होगा। नेपाली युवाओं की आकांक्षाओं को पूरा करना भी जरूरी है। खाड़ी युद्ध के चलते नेपाल में तेल और ऊर्जा की किल्लत भी बहुत बड़ी विपत्ति है। अगर उन्होंने मामलों को सही ढंग से सम्भाला और राजनी​ितक स्थिरता कायम रही तो नेपाल प्रगति के पथ पर बढ़ेगा। अगर उनसे जरा सी भी चूक हुई तो व्यापक अशांति फैल सकती है। भारत नेपाल में लोकतांत्रिक सरकार का प्रबल समर्थक है लेकिन बदले की राजनीति नहीं होनी चाहिए। क्योंकि नेपाल में पूर्व में सरकारें बदलती रहीं लेकिन प्रतिशोध की राजनीति शुरू नहीं हुई इसलिए बालेन्द्र शाह को सतर्कता से काम लेना होगा।

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