इधर रिकॉर्ड, उधर नेता नहीं चुन पा रहे !

Summary :

भारतीय राजनीति की चाल-ढाल बहुत दिलचस्प है। पिछले सप्ताह दो वाकये एक साथ हुए, एक तरफ नरेंद्र मोदी ने निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में सबसे ज्यादा दिनों तक पद पर रहने का रिकॉर्ड बना दिया। मोदी जी को बधाई ! वैसे मैं राहुल गांधी को भी बधाई देने का इंतजार कर रहा था क्योंकि मुझे लग रहा था कि 25 विपक्षी पार्टियां उन्हें इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस, संक्षेप में बोले तो इंडिया गठबंधन का नेतृत्व सौंप देंगी, मगर ऐसा हुआ नहीं। अब जो मोदी जी के विरोधी हैं, वे कह रहे हैं कि सबसे ज्यादा समय तो जवाहर लाल…

भारतीय राजनीति की चाल-ढाल बहुत दिलचस्प है। पिछले सप्ताह दो वाकये एक साथ हुए, एक तरफ नरेंद्र मोदी ने निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में सबसे ज्यादा दिनों तक पद पर रहने का रिकॉर्ड बना दिया। मोदी जी को बधाई ! वैसे मैं राहुल गांधी को भी बधाई देने का इंतजार कर रहा था क्योंकि मुझे लग रहा था कि 25 विपक्षी पार्टियां उन्हें इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस, संक्षेप में बोले तो इंडिया गठबंधन का नेतृत्व सौंप देंगी, मगर ऐसा हुआ नहीं।
अब जो मोदी जी के विरोधी हैं, वे कह रहे हैं कि सबसे ज्यादा समय तो जवाहर लाल नेहरू प्रधानमंत्री रहे। वे 1947 से 1952 तक के कार्यकाल को भी गिन रहे हैं। 1947 में चुनाव तो हुआ नहीं था इसलिए नेहरू जी को प्रधानमंत्री पद पर मनोनीत किया गया था। चुनाव 1952 में हुए और सांसदों ने उसी साल उन्हें प्रधानमंत्री चुना। यानी वे निर्वाचित प्रधानमंत्री बने, मोदी जी के रिकॉर्ड का संदर्भ निर्वाचित प्रधानमंत्री का है इसलिए मोदी जी के समर्थक कह रहे हैं कि विपक्ष के विलाप का कोई मतलब नहीं है।
अब यह सब राजनीति का गुणा-भाग है, सबके अपने समीकरण हैं। जनता जब वोट देती है तो अपना समीकरण वह अपने हिसाब से तय कर लेती है, इसलिए विवाद का कोई मतलब नहीं है। नरेंद्र मोदी का जलवा कायम है तो है। लोग उन्हें चाह रहे हैं, दुनिया उन्हें चाह रही है। विपक्ष इस बात का भले ही शोर मचाता रहे कि महंगाई चरम पर है। डीजल, पैट्रोल और गैस का संकट है, किसान अभी भी आत्महत्या कर रहे हैं, अमेरिका भारतीय खेतों को चरने का षड्यंत्र कर रहा है, कुछ आंतरिक संकट है तो कुछ संकट अंतर्राष्ट्रीय है। नीट का संकट अलग से आ गया। कॉकरोच अलग निकल आए, मगर हकीकत यही है कि देश-विदेश में नरेंद्र मोदी के प्रति विश्वास कायम है। आप घर में बैठ कर गाल बजाते रहो, क्या फर्क पड़ने वाला है?
इस बात से कोई कैसे इन्कार कर सकता है कि दुनिया के विभिन्न देशों ने नरेंद्र मोदी को 30 से ज्यादा पुरस्कारों और सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजा है। सात मुस्लिम बहुल देशों-सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, फिलिस्तीन, अफगानिस्तान, मिस्र और मालदीव ने अपने यहां के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से उन्हें सम्मानित किया है। यानी जलवा तो है। पश्चिम बंगाल में यदि ममता बनर्जी जैसी कद्दावर नेता को भाजपा ने उखाड़ फेंका तो यह निश्चय ही मोदी जी के नाम का ही जलवा है। यह बात और है कि उनके साथ अमित शाह जैसा कुशल सारथी भी है।
अब ऐसे नेतृत्वकर्ता से विपक्ष को लड़ना है तो सबसे पहले गठबंधन के 25 दलों को एक नेता तो चुनना होगा। इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस को गठित हुए तीन साल हो गए. 2024 में लोकसभा चुनाव के पहले और बाद में एक संक्षिप्त बैठक हुई थी। 2025 में कोई बैठक नहीं हुई, जरा सोचिए कि तीन साल बीतने पर भी अलायंस की स्टीयरिंग किसके हाथ में हो, यही अभी तक तय नहीं हो पाया। सभी क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को यह समझना चाहिए कि पूरे देश में केवल कांग्रेस की उपस्थिति है इसलिए स्वाभाविक रूप से राहुल गांधी ही अलायंस का नेतृत्व संभालने के योग्य हैं। यदि उन्हें तिलक लगा देते, राज्याभिषेक कर देते तो वे भी काम से लग जाते। या फिर प्रियंका गांधी का नाम है, यदि आपके पास लीडर नहीं होगा तो फिर काम आगे कैसे बढ़ेगा? फिर तो बस गाल बजाते रहो। मोदी जी की आलोचना करते रहो, हासिल कुछ भी नहीं होने वाला है। मगर क्या कीजिएगा? यहां हर किसी को नेता बनना है, न बन पाए तो दूसरे की टांग खींचनी है…! किसी को यह फिक्र नहीं कि मजबूत लोकतंत्र के लिए मजबूत विपक्ष भी बहुत जरूरी है।
नए की जय-जयकार
पुराने की पूछ नहीं…!
रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव को जब भी मैं रेलवे की उपलब्धियों का बखान करते सुनता हूं तो दो तरह की भावनाएं एक साथ दिल-दिमाग में पैदा होने लगती हैं। रेलवे के विस्तार, आधुनिकीकरण से लेकर नए-नए रूट पर वंदे भारत दौड़ने की खबर गर्व से भर देती है। कश्मीर के दुरूह इलाकों में ट्रेन पहुंचने की खबर के साथ ही मन में एक सवाल पैदा होता है कि पुरानी योजनाओं के प्रति बेरुखी आखिर क्यों? वर्धा-यवतमाल-नांदेड़ रेलवे लाइन को मेरी कोशिशों के बाद वित्तीय वर्ष 2008-2009 में स्वीकृति मिली मगर आज भी 284 किलोमीटर लंबी इस रेल लाइन का काम पूरा नहीं हुआ है, क्या अश्विनी वैष्णव जी को इसका ख्याल है?

– विजय दर्डा
संपादक : लोकमत समूह

पूर्व राज्यसभा सांसद

विजय दर्डा