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अर्थव्यवस्था की रफ्तार

अर्थव्यवस्था

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ को लेकर दादागिरी भी भारत की आर्थिक रफ्तार को रोक नहीं पा रही। हालांकि भारत के सामने कई तरह की चुनौतियां हैं। इसके बावजूद अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर लगातार गुड न्यूज मिल रही है। पहले भारत ने जापान को पछाड़ते हुए दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का गौरव हासिल किया और अब राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी प्रथम अग्रिम अनुमान रिपोर्ट के मुताबिक चालू वित्त वर्ष 2025-26 के लिए जीडीपी ग्रोथ का अनुमान बढ़ाकर 7.4 प्रतिशत कर दिया गया है जो पिछले वित्त वर्ष के 6.5 प्रतिशत से ज्यादा है। इस वर्ष की वृद्धि दर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया सहित कई विश्लेषकों द्वारा वर्ष की शुरूआत में लगाए गए अनुमानों से कहीं अधिक है।

भारत की जीडीपी में वृद्धि विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि में पिछले वर्ष के 4.5 प्रतिशत से 7 प्रतिशत तक की तीव्र वृद्धि के कारण होगी। हालांकि भारतीय वस्तुओं पर अमेरिका द्वारा लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ के कई समस्याएं उत्पन्न हो गई थीं। भारत की नाममात्र वृद्धि दर आखिरी बार महामारी के वर्ष 2020-21 में थी जब अर्थव्यवस्था में 1.2 प्रतिशत की गिरावट आई थी। महामारी से निकलने के बाद भारत की अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट आई और भारत पूरी दुनिया में तेजी से ​विकास करने वाली अर्थव्यवस्था बन गई। भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाए रखने में कृषि सैक्टर का बहुत बड़ा योगदान रहा।

अलग-अलग आंकड़ों से पता चलता है कि सबसे तेज वृद्धि सेवा क्षेत्र में देखी जा रही है। इस क्षेत्र की वृद्धि दर 2025-26 में 9.1 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो 2024-25 में 7.2 प्रतिशत थी। व्यापार, होटल, परिवहन और संचार, वित्तीय, रियल एस्टेट और पेशेवर सेवाएं तथा सार्वजनिक प्रशासन- सभी क्षेत्रों में वृद्धि दर इससे भी अधिक है। औद्योगिक क्षेत्र में, विनिर्माण क्षेत्र का प्रदर्शन बेहतर है, जबकि निर्माण और उपयोगिता क्षेत्रों की वृद्धि दर धीमी है। दूसरी ओर, उपभोग और निवेश दोनों गतिविधियों में अच्छी वृद्धि होने की उम्मीद है। हालांकि इस वर्ष वृद्धि दर में तेजी आई है, फिर भी कुछ चिंताजनक बातें हैं। नाममात्र जीडीपी की वृद्धि दर केवल 8 प्रतिशत रहने का अनुमान है। यह केंद्रीय बजट में अनुमानित 10.1 प्रतिशत से काफी कम है।

यह लगातार दूसरा वर्ष होगा जब नाममात्र वृद्धि दर 10 प्रतिशत से कम रहेगी। समय के साथ नाममात्र वृद्धि दर में कमी का सरकार के ऋण घाटे की स्थिति पर प्रभाव पड़ सकता है। मोदी सरकार ने लगातार कर सुधार करते हुए अमेरिकी टैरिफ के प्रभाव को कम करने की ​कोशिश की और अमेरिका द्वारा डाली जा रही रुकावटों के बावजूद दुनिया में नए बाजारों की तलाश की और उसे सफलता भी मिली। जीएसटी सुधारों से उत्पादों की कीमतें घटीं और उत्सव सीजन पर भारतीयों ने जमकर खरीदारी की जिससे बाजार तो गुलजार हुए ही खपत भी बढ़ी। जिसके चलते कम्पनियों का उत्पादन भी बढ़ा और अर्थव्यवस्था की गुलाबी तस्वीर बन गई। हालांकि भारत के सामने चुनौतियां बरकरार हैं।
वर्तमान मूल्यों के विशुद्ध संदर्भ में देखें तो अर्थव्यवस्था के 357.14 लाख करोड़ रुपये के आकार तक पहुंचने का अनुमान है, जो 2025-26 के बजट में अनुमानित स्तर से थोड़ा अधिक है।

हालांकि राजस्व वृद्धि कमजोर रहने के कारण राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 4.4 फीसदी पर नियंत्रित करना अभी भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है। चूंकि सरकार अगले वित्तीय वर्ष से ऋण-जीडीपी अनुपात को राजकोषीय लक्ष्य के रूप में अपनाने वाली है, इसलिए अब नॉमिनल वृद्धि पर अधिक ध्यान आकर्षित होगा। आने वाली तिमाहियों में मुद्रास्फीति दर अपने वर्तमान निम्न स्तर से ऊपर जाने की उम्मीद है, जो नॉमिनल वृद्धि में सुधार करने में मदद करेगी। यह भी उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय अगले महीने संशोधित आधार के साथ नई जीडीपी शृंखला जारी करेगा।

बताया जा रहा है कि यह वर्षों से अर्थशास्त्रियों और विश्लेषकों द्वारा वर्तमान शृंखला को लेकर जताई जा रही चिंताओं का समाधान करेगा। सांख्यिकी विभाग उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के लिए भी नई शृंखला जारी करेगा। इस प्रकार समग्र रूप से भारत में आर्थिक गतिविधियों और कीमतों को मापने के तरीके में महत्वपूर्ण बदलाव हो सकते हैं। यद्यपि आधार वर्ष में बदलाव और जीडीपी मापने की पद्धति में परिवर्तन के बावजूद यह मानना कठिन नहीं है कि अगला वित्त वर्ष अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

सरकार आने वाले वर्ष का प्रबंधन कैसे करना चाहती है यह कुछ सप्ताह बाद आने वाले बजट से स्पष्ट हो जाएगा। चुनौतियां मुख्यतः बाहरी मोर्चे से उत्पन्न हो रही हैं। महीनों की वार्ताओं के बावजूद, अमेरिका के साथ व्यापार समझौता अनिश्चित बना हुआ है। बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि परस्पर लाभकारी समझाैता कितनी जल्दी हो पाता है। मुख्य चुनौती मुद्रा का कमजोर होना है। इंडिया रेटिंग्स का अनुमान है कि वर्ष 26-27 में रुपया औसतन 92.3 प्रतिशत अमेरिकी डॉलर रहेगा। भारत यूरोपीय संघ के साथ भी मुक्त व्यापार समझौते के जल्दी होने की उम्मीद कर रहा है। यदि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते में देरी होती है तो भुगतान संतुलन के मोर्चे पर भारी दबाव बन सकता है जो रुपए के कमजोर होने में नजर आ रही है।

शेयर बाजार लगातार घाटे में चल रहा है। 2025 में विदेशी निवेशकों ने 20 अरब डालर से ज्यादा मूल्यों के भारतीय शेयर बेचे और यह सिलसिला अभी थम नहीं रहा है। अगले वित्त वर्ष में वृद्धि की गति बनाए रखने के लिए घरेलू और बाहरी मोर्चों पर लगातार प्रयास किए जाने की जरूरत है। इसमें कोई संदेह नहीं कि जीडीपी तेजी से बढ़ रही है फिर भी निजी निवेश सीमित है। मौजूदा क्षमताओं का पूरी तरह से उपयोग न होने के कारण भारतीय कम्पनियों ने ऋण कम करने, नकदी बचाकर रखने का विकल्प चुना है। इस पर भी ध्यान देना होगा।

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