साल 1971 के युद्ध के बाद पाकिस्तान के समर्पण को दर्शाने वाली प्रतिष्ठित फोटो को हटाने पर विवाद आरंभ हो गया है। यह विवाद दिसंबर 2024 में तब शुरू हुआ जब भारतीय सेना मुख्यालय के आर्मी चीफ लाउंज (जहां सेना प्रमुख विदेशी गणमान्य व्यक्तियों से मिलते हैं) से 1971 के भारत-पाक युद्ध में पाकिस्तान के आत्मसमर्पण को दर्शाने वाली ऐतिहासिक तस्वीर को हटा दिया गया। दरअसल 1971 में पाकिस्तानी जनरल ए.ए.के. नियाज़ी द्वारा भारतीय सेना के सामने हथियार डालने वाले ऐतिहासिक चित्र की जगह ‘कर्मक्षेत्र’ नामक एक नई पेंटिंग लगाई गई। नई पेंटिंग में आधुनिक सैन्य उपकरणों के साथ-साथ लद्दाख की पैंगोंग त्सो झील महाभारत से श्रीकृष्ण-अर्जुन का रथ, चाणक्य और गरुड़ को दर्शाया गया है।
ऐतिहासिक तस्वीर को हटाए जाने पर सेना के पूर्व सैनिकों और विपक्षी नेताओं ने कड़ी नाराजगी जताई और आरोप लगाया कि सरकार ऐतिहासिक सैन्य विजय के इतिहास को मिटाने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने भी संसद में इस मुद्दे को उठाया था। इस बढ़ते विवाद के बीच सेना और थलसेना प्रमुख जनरल उपेन्द्र द्विवेदी ने स्पष्ट किया कि 1971 के आत्मसमर्पण वाली तस्वीर को हटाया नहीं गया है। इसे नई दिल्ली के मानेकशॉ सेंटर में अधिक उचित और व्यापक दर्शकों तक पहुंचाने के लिए स्थापित किया गया है।
सेना प्रमुख ने बताया कि नई पेंटिंग भारत के प्राचीन इतिहास, वर्तमान चुनौतियों और भविष्य की रणनीतियों को जोड़ती है जो आधुनिक दौर में चीन से मिलने वाली चुनौतियों पर केंद्रित है। वस्तुतः हर तस्वीर कोई ना कोई संदेश देती है। भारतीय थलसेना प्रमुख के लॉन्ज में लगाई पेंटिंग भी ऐसा ही संदेश दे रही है। हालांकि इस तस्वीर को लेकर घर पर ही विवाद हो गया। सोशल मीडिया पर 1971 की जंग की पेंटिंग वायरल क्या हुई बवाल मच ही गया। पहले सोशल मीडिया पर पूर्व सैनिकों ने सवाल उठाए तो मामला संसद तक पहुंच गया।
कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने लोकसभा में बांग्लादेश के मुद्दे पर बोलते हुए यह पेंटिंग हटाए जाने का मसला उठाया। दरअसल साउथ ब्लॉक में सेना प्रमुख के लॉन्ज से 1971 की जंग में पाकिस्तानी सेना के सरेंडर की ऐतिहासिक तस्वीर हटा दी गई और उसकी जगह दूसरी पेंटिंग लगाई गई है। यह तस्वीर तब खींची गई थी, जब पाकिस्तान के जनरल नियाजी 1971 की जंग में हार मानते हुए सरेंडर डॉक्यूमेंट पर दस्तखत कर रहे थे। इस तस्वीर की एक पेंटिंग साउथ ब्लाक में सेना प्रमुख के लॉन्ज में लगी थीए जहां सेना प्रमुख विदेशी मेहमानों से मुलाकात करते हैं, फोटो खींची जाती है। 1971 की जंग के हीरो रहे फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ के नाम पर दिल्ली में सेना का एक भवन है।
अमूमन सेना से जुड़े सारे कार्यक्रम वहीं आयोजित होते हैं। अब वो पेंटिंग मानेकशॉ सेंटर में लगा दी गई है। खुद थलसेना प्रमुख इस मौके पर वहां मौजूद थे। सेना के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल ‘एक्स’ पर इसकी फोटो साझा की गई है और लिखा गया कि विजय दिवस के अवसर पर जनरल उपेन्द्र द्विवेदी और सुनीता द्विवेदी के साथ 1971 के आत्मसमर्पण की प्रतिष्ठित पेंटिंग को उसके सबसे उपयुक्त स्थान मानेकशॉ सेंटर में स्थापित किया गया। इसमें कहा गया कि यह पेंटिंग भारतीय सशस्त्र बलों की सबसे बड़ी सैन्य जीतों में से एक और सभी के लिए न्याय और मानवता के लिए भारत की प्रतिबद्धता का प्रमाण है।
मानेकशॉ सेंटर में इसके प्लेसमेंट से इस स्थान पर भारत और विदेशों से विविध दर्शकों और गणमान्य व्यक्तियों की पर्याप्त उपस्थिति के कारण बड़े पैमाने पर दर्शकों को लाभ होगा। 1971 की वो पेंटिंग जो भारत के शौर्य और पाकिस्तान की फजीहत से जुड़ी थी। उसकी जगह जो पेंटिंग लगाई गई है वो नए भारत की ताकत को दिखाती है। नई पेंटिंग में लद्दाख का पैंगांग लेक दिखाया गया है। इसमें आधुनिक बोट भी हैं तो चाणक्य नीति का भी जिक्र है। आधुनिक टैंक और ऑल टेरेन व्हीकल है, तो कुरुक्षेत्र में महाभारत युद्ध में अर्जुन का रथ हांकने वाले कृष्ण भी हैं। आसमान में अटैक हैलिकॉप्टर अपाचे भी है तो गरुड़ भी नजर आ रहा है। इस तस्वीर से संदेश यह मिलता है कि अब सेना का फोकस पाकिस्तान नहीं बल्कि ड्रैगन यानी चीन है।
रक्षा सूत्रों के मुताबिक यह पेंटिंग भारतीय सेना की धार्मिकता और शाश्वत प्रतिबद्धता को दर्शाती हैए जैसा कि महाभारत की शिक्षा में दिखाया गया है। इसमें सेना को धर्म के संरक्षक के रूप में दिखाया गया है जो न केवल राष्ट्र की रक्षा कर रही है बल्कि न्याय बनाए रखने और राष्ट्र के मूल्यों की सुरक्षा के लिए भी संघर्ष कर रही है। यह चाणक्य के रणनीतिक और दार्शनिक ज्ञान से प्रेरित है जो सेना के नेतृत्व, कूटनीति और युद्ध के दृष्टिकोण को मार्गदर्शन प्रदान करता है। बहरहाल चीन जिस शुन त्जू के ‘आर्ट ऑफ वॉर’ में लिखी गई युद्ध नीतियों को फॉलो करता है वो 2020 में पूर्वी लद्दाख में चाणक्य नीति और गीता के सार से हार गया। भारतीय सेना ने ऐसी रणनीति अपनाई कि चीन को बातचीत की मेज पर आना पड़ा।


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