श्रावण माह चल रहा है और पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में शिव मंदिरों में घंटियों व डमरूओं की ध्वनि सुनी जा रही है। इन दिनों एक बार फिर पाकिस्तान का सबसे बड़ा हिन्दू तीर्थ कटासराज भी चर्चा में है। यहां इन दिनों भी मरम्मत, निर्माण व पुरानी हवेलियों के संवारने का काम चल रहा है। यह कार्य वर्ष 2006 से आरंभ हुआ था, जब भारत के तत्कालीन उपप्रधानमंत्री श्री लाल कृष्ण आडवाणी इस तीर्थ पर दर्शन के लिए आए थे। उनके आग्रह पर उन्हीं दिनों तत्कालीन पाक सरकार ने भग्नावेशों को संवारने और पुरानी गरिमाएं बहाल करने के लिए पांच करोड़ रुपए का आरंभिक बजट भी आवंटित किया था।
कटासराज में इन दिनों भी सावन माह के दृष्टिगत शिव भगवान के डमरू और घंटों-घंटियों की आवाजें गूंज रही हैं। यह मंदिर पाक-पंजाब के चकवाल जिले में वहां ‘नमक-कोह’ (नमक के पत्थरों वाली पर्वत शृंखला) में स्थित है। कटासराज के महातम्य के बारे थोड़ा सा िफर बता दूं। लगभग 28 वर्ष पूर्व गया था मैं भी कटासराज। पाक-पंजाब का एक जि़ला है चकवाल। वहां के चोआ सैदनशाह नामक कस्बे के साथ ही स्थित है गांव कटास जहां कभी वियोगग्रस्त भगवान शिव ने अपनी अर्द्धांगनी सती की स्मृति में इतने अश्रु बहाए कि पीड़ा का एक सरोवर भर गया। पीड़ा के उस सरोवर में जो नहाता, उसके सारे पाप धुल जाते। मुक्ति का मार्ग खुल जाता।
कटासराज के ये खण्डहर अब एक बार फिर से मुखरित हो रहे हैं, बोलने लगे हैं। वर्षों बाद एक बार फिर से साल में दो-चार बार कटास गांव की छोटी-छोटी पहािड़यों में नुकरई घंटियों की गूंज सुनाई देने लगी है। पाकिस्तान की सरकार को भी लगा है कि इन मंदिरों का जीर्णोद्धार, धार्मिक पर्यटन की नई सम्भावनाएं खोल सकता है। अब तो इस स्थल को ‘वैश्विक विरासत’ (वर्ल्ड हैरिटेज) का रूप देने के प्रयास होने लगे हैं। स्वयं पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ भी कुछ वर्ष पूर्व जनवरी में कटासराज गए थे।
इस स्थल पर मुख्य केंद्रीय शिव मंदिर के साथ बने छोटे-छोटे मंदिर प्राप्त विवरणों के अनुसार लगभग 900 वर्ष पूर्व बने थे। मुख्य मंदिर के भग्नावशेष बताते हैं कि वहां अंतिम निर्माण कार्य ईसा से लगभग 600 वर्ष पूर्व के आसपास हुआ था। मंदिर परिसर से सात ग्रह-स्थल हैं। इसमें सात पुराने मंदिर हैं, एक बौद्ध स्तूप के अवशेष हैं, कुछ छोटे-छोटे मध्यकालीन पूजास्थल हैं, हवेलियां हैं और कुछ नवनिर्मित अर्थात् 1947 से कुछ वर्ष पूर्व निर्मित मंदिर भी हैं। लगभग सभी मंदिर चौकोने दायरों में हैं। बीचोंबीच वह ऐतिहासिक एवं पौराणिक सरोवर हैं, जहां चर्चित यक्ष-युधिष्ठिर संवाद हुआ था।
एक हवेली है, जिसे सरदार हरि सिंह नलवा की हवेली कहा जाता है। इसी हवेली के पूर्व में स्थित है भगवान रामचंद्र-मंदिर। इसमें पूर्व की ओर से प्रवेश द्वार है, मगर बाकी सभी ओर से यह मंदिर बंद है। इसके पीछे की कथा बताने वाला कोई नहीं। मगर यह दो मंजि़ला परिसर है। पहली मंजिल पर अलग-अलग आकार के आठ कक्ष हैं और दक्षिण की ओर से एक सीढ़ी पहली मंजिल तक जाती है। मंदिर में दो झरोखे भी हैं, जो अब भग्नावस्था में हैं। परिसर के पश्चिमी भाग में एक चौकोने स्थल पर हनुमान मंदिर स्थित है। मगर मंदिर की छत व अब अतीत वाले भित्तिचित्र या स्थापत्य कला के अवशेष भी दिखाई नहीं देते।
यक्ष-युधिष्ठिर संवाद से भी ज़्यादा शिव-सती प्रकरण उदास करता है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार जब सती के शव को भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से शिव की बाहों से मुक्त कराया तब शिव की आंखों से जो अश्रुधाराएं बहीं, उनसे दो स्थलों पर सरोवर बन गए। कटास शब्द का संस्कृत मूल कटाक्ष है। एक प्रचलित मान्यता यही है कि ब्रह्मांड का पहला शिवलिंग कटास में ही स्थापित हुआ था। कुछ पुरानी पांडुलिपियों में ऐसा उल्लेख भी है कि भगवान राम का जन्म यहीं हुआ था। लेकिन इस मान्यता को अनेक अन्य ग्रंथों में भरपूर चुनौती भी दी गई है।
बहरहाल, यह तो एक सत्य है कि इस स्थल से प्राप्त अवशेषों का समय ईसा से लगभग छह हज़ार से सात हज़ार वर्ष तक पुराना है। पुरातात्विक खुदाई में डायनासारों की हड्डियां व अन्य चिह्न भी प्राप्त हुए हैं। यहां प्राप्त कुछ अवशेष हड़प्पाकालीन सभ्यता से पूरी तरह मेल खाते हैं। तथ्य क्या हैं? कितनी पुरानी हैं यहां की पुरातात्विक व प्रागैतिहासिक कहानियां, यह शोध का उतना ही महत्वपूर्ण विषय है जितना कि मोहेन्जोदड़ो। मगर इस दिशा में वहां की सरकार सिर्फ एक सीमा तक ही गम्भीर है। अब प्राच्य, दुर्लभ एवं प्रागैतिहासिक काल के चिह्नों की तलाश में एक ऐसा वर्ग भी निकला है जिसकी नज़र में यहां की खुदाई में मिले अवशेषों को अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में मुंहमांगे दामों पर बेचा जा सकता है। मान्यता यह है कि इसी सरोवर के किनारे महाभारत काल में पांचों पांडवों ने अपने 12 वर्ष के वनवास के अज्ञातवास वाले दिन बिताए थे। यहीं पर इसी सरोवर के किनारे यज्ञ-युधिष्ठिर संवाद सम्पन्न हुआ था। बहरहाल, स्थिति यह है कि इन दिनों पाकिस्तान में डर का माहौल व्याप्त है। अभी यह तय नहीं है कि कटासराज यात्रा इस बार भी सम्पन्न हो पाएगी या नहीं। वहां अब भी खण्डहर बोलते हैं। गौर से एक पल देख लो या छू भर लो, पूरी कहानी बयान होने लगती है।
इस स्थल पर मुख्य शिव मंदिर के साथ बने छोटे-छोटे मंदिर प्राप्त विवरणों के अनुसार लगभग 900 वर्ष पूर्व बने थे। मुख्य मंदिर के भग्नावशेष बताते हैं कि वहां प्रथम निर्माण कार्य ईसा से लगभग 600 वर्ष पूर्व के आसपास हुआ था। 1947 तक यहां पर हर वर्ष शिवरात्रि के अवसर पर हजारों श्रद्धालु नियमित रूप से आते थे। मगर विभाजन के समय से ये मंदिर वर्षों तक उपेक्षित रहे। 1988 में जब में एक धार्मिक यात्रा के साथ यहां आया तब अस्थायी रूप से जिला प्रशासन ने यहां सफाई भी कराई और सरोवर में भी स्वस्थ जल का प्रावधान किया। मुझे याद है कि उस यात्रा के मध्य कुछ यात्रियों ने वहां के जिलाधीश से कुप्रबंधों की शिकायतें भी की थीं। मगर जिलाधीश की विनम्रता, शालीनता व आतिथेय के आगे सब शिकायतें निरस्त होने लगी थीं। अब वहां पर एक नियमित प्रजाति भी है जो इन दिनों शिव-स्त्रोत का पाठ भी करता है। अब वहां यद्यपि भारतीय श्रद्धालुओं को आसानी में ‘वीजा’ नहीं मिलता, लेकिन पाकिस्तान के हिन्दू श्रद्धालु व विश्व के कुछ अन्य देशों के श्रद्धालु वर्ष में दो बार यहां आते हैं।
पौराणिक आख्यानों के अनुसार जब सती के शव को भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से शिव की बाहों से मुक्त कराया तब शिव की आंखों से जो अश्रुधाराएं बहीं, उनसे दो स्थलों पर सरोवर बन गए। एक सरोवर कटासराज में था, दूसरा पुष्कर में। कटास शब्द का संस्कृत मूल कटाक्ष है। जब यह मूल तथ्य मैंने वहां के मुस्लिम जिलाधीश को बताया तो कौतूहलवश उन्होंने मेरे एक सहयोगी से वह सारा विवरण अंग्रेजी या उर्दू में लिखकर देने का आग्रह किया। वह पुराने राजस्व रिकार्ड खंगालना चाहते थे, शायद कहीं पुराने संदर्भों का उल्लेख मिल जाए। उन्हें प्रतीकात्मक व मिथकीय संदर्भ भी बेहद दिलचस्प लगे थे। उनकी यह भी टिप्पणी अच्छी लगी, ‘आखिर तो वे लोग हम सबके सांझे बुज़ुर्ग ही थे।’
एक प्रचलित मान्यता यही है कि ब्रह्मांड का पहला शिवलिंग कटास में ही स्थापित हुआ था। कुछ पुरानी पांडुलिपियों में ऐसा उल्लेख भी है कि भगवान राम का जन्म यहीं हुआ था। लेकिन इस मान्यता को अनेक अन्य ग्रंथों में भरपूर चुनौती भी दी गई। तथ्य क्या हैं? कितनी पुरानी हैं यहां की पुरातात्विक व प्रागैतिहासिक कहानियां, यह शोध का उतना ही महत्वपूर्ण विषय है जितना कि मोहेन्जोदड़ो। मगर इस दिशा में वहां की सरकार सिर्फ एक सीमा तक ही गम्भीर है। अब प्राच्य, दुर्लभ एवं प्रागैतिहासिक काल के चिह्नों की तलाश में एक ऐसा वर्ग भी निकला है जिसकी नज़र में यहां की खुदाई में मिले अवशेषों को अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में मुंह मांगे दामों पर बेचा जा सकता है।
फिर चर्चा में इन दिनों ‘कटासराज’
Summary :
श्रावण माह चल रहा है और पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में शिव मंदिरों में घंटियों व डमरूओं की ध्वनि सुनी जा रही है। इन दिनों एक बार फिर पाकिस्तान का सबसे बड़ा हिन्दू तीर्थ कटासराज भी चर्चा में है। यहां इन दिनों भी मरम्मत, निर्माण व पुरानी हवेलियों के संवारने का काम चल रहा है। यह कार्य वर्ष 2006 से आरंभ हुआ था, जब भारत के तत्कालीन उपप्रधानमंत्री श्री लाल कृष्ण आडवाणी इस तीर्थ पर दर्शन के लिए आए थे। उनके आग्रह पर उन्हीं दिनों तत्कालीन पाक सरकार ने भग्नावेशों को संवारने और पुरानी गरिमाएं बहाल करने के लिए पांच करोड़…


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