प्रधानमन्त्री की देश से अपील

Summary :

प्रधान्मन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी की देशवासियों से मितव्ययिता बरतने की अपील पर राजनीतिक भूचाल जैसा आ गया है क्योंकि विपक्ष इसे सत्तारूढ़ दल भाजपा की चालाकी बता रहा है और कह रहा है कि सरकार ने यह एहसास पांच राज्यों के चुनाव बीत जाने के बाद अपनी सुविधानुसार किया है जबकि आर्थिक मोर्चे पर सावधानी दिखाने का समय विगत मार्च महीने के शुरू से ही प्रारम्भ हो गया था जब ईरान व इजराइल-अमेरिका युद्ध शुरू हुआ था। जाहिर है कि प्रधानमन्त्री ने युद्ध के संकट को देखते हुए ही इस तरह की अपील की है और लोगों से पूरे वर्ष…

प्रधान्मन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी की देशवासियों से मितव्ययिता बरतने की अपील पर राजनीतिक भूचाल जैसा आ गया है क्योंकि विपक्ष इसे सत्तारूढ़ दल भाजपा की चालाकी बता रहा है और कह रहा है कि सरकार ने यह एहसास पांच राज्यों के चुनाव बीत जाने के बाद अपनी सुविधानुसार किया है जबकि आर्थिक मोर्चे पर सावधानी दिखाने का समय विगत मार्च महीने के शुरू से ही प्रारम्भ हो गया था जब ईरान व इजराइल-अमेरिका युद्ध शुरू हुआ था। जाहिर है कि प्रधानमन्त्री ने युद्ध के संकट को देखते हुए ही इस तरह की अपील की है और लोगों से पूरे वर्ष सोने के आभूषण आदि न खऱीदने और पैट्रोल व डीजल कम खर्च करने तथा स्वदेशी सामान खरीदने का आह्वान किया है जिससे भारत अधिक से अधिक विदेशी मुद्रा बचा सके। यह कडुुवा सत्य है कि भारत प्रतिवर्ष 900 से लेकर एक हजार टन सोने का आयात करता है जिसका मूल्य अरबों डाॅलर में जाकर पड़ता है। विश्व स्वर्ण परिषद (वर्ल्ड गोल्ड कौंसिल) के अनुसार भारत ​िवश्व में सर्वाधिक स्वर्ण आयात करने वाले देशों में से एक है जहां सोने की मांग अत्यधिक रहती है। इसके कई कारण हैं जिनका खुलासा यहां किया जाना संभव नहीं है परन्तु इतना कहना ही काफी है कि भारत में सोने को भविष्य की पूंजी गारंटी के रूप में लिया जाता है जिसे सामाजिक व सांस्कृतिक परंपराओं से जोड़ दिया गया है।
विपक्ष यह सवाल भी खड़े कर रहा है कि जिस देश की कुल आबादी 140 करोड़ लोगों में से 80 करोड़ लोगों को पांच किलो अनाज मुफ्त दिया जा रहा हो उस देश में सोना न खरीदने की अपील किन लोगों से की जा रही है? मगर विपक्ष का यह तर्क रहा है कि देश के दस प्रतिशत लोगों का ही इसकी राष्ट्रीय सम्पत्ति के 90 प्रतिशत हिस्से पर अधिकार है। अतः प्रधानमन्त्री की अपील इसी वर्ग से है। इसमें तो कोई दो राय हो ही नहीं सकती कि भारत में आर्थिक गैर बराबरी की खाई बहुत चौड़ी है। जहां तक पैट्रोल व डीजल का सवाल है तो बढ़ते शहरीकरण व उपभोक्तावाद और टेक्नोलॉजी उन्नयन की वजह से पैट्रोल व डीजल का बढ़ता उपयोग गांव से लेकर शहरों तक की जरूरत बन चुका है। भारत के सुदूर क्षेत्रों तक में अब मोटरसाइकिल ने बाइसिकल की जगह ले ली है। इसे हम बाजार मूलक अर्थव्यवस्था का प्रभाव भी कह सकते हैं मगर यह एक हकीकत है लेकिन यह भी सच है कि यह मोटर क्रान्ति विशुद्ध रूप से पैट्रोल आयात पर ही टिकी हुई है।
भारत अपने वार्षिक बजट के आधे के मूल्य का प्रतिवर्ष कच्चा तेल आयात करता है अतः इस मद में विदेशी मुद्रा का खर्च सर्वाधिक होता है। दूसरी तरफ युद्ध के डर से भारत में विदेशी मुद्रा की आवक में सिलसिलेवार कमी दर्ज हो रही है मगर एेसा नहीं है कि देश का विदेशी मुद्रा भंडार खाली हो। अभी भी भारत के पास 688 अरब डाॅलर का यह भंडार है परन्तु मितव्ययिता वक्त की मांग है। इसके साथ ही भारत खाने के तेल का भी भारी मात्रा में आयात करता है क्योंकि इसका उत्पादन मांग के अनुरूप हम नहीं कर पाते हैं अतः श्री मोदी ने इसमें भी बचत करने की अपील की है। इसके साथ ही उन्होंने बिजली वाहनों का अधिकाधिक प्रयोग करने की सलाह भी दी है और इसे राष्ट्र भक्ति से जोड़ा है क्योंकि यह संभावित संकट का समय है। हम जानते हैं कि ईरान के साथ भारत के सम्बन्ध बहुत एेतिहासिक व मधुर रहे हैं परन्तु बदलते भू-राजनीतिक कारणों की वजह से इनमें बदलाव आया है। अमेरिका जिस तरह से ईरान पर अपनी दादागिरी चला रहा है उसकी वजह से इस देश की व्यापारिक क्षमताओं पर विपरीत प्रभाव पड़ा है वरना भारत ईरान से अपनी मुद्रा रुपये में ही तेल खरीदा करता था। परन्तु 2019 से हमने इससे तेल खरीदना बन्द कर दिया है। इसके साथ ही इसके हाेर्मुज जलडमरूमध्य समुद्री मार्ग के बन्द होने के कारण भारत को आने वाली तेल व गैस सप्लाई पर भी विपरीत असर पड़ रहा है और साथ ही अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में इन दोनों वस्तुओं के भाव रोजाना महंगे होते जा रहे हैं जिसकी वजह से भारत को अधिक विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ रही है। इसके समानान्तर भारत को अन्य समुद्री मार्गों से तेल व गैस की सप्लाई लेनी पड़ रही है जिस पर अधिक खर्चा आ रहा है। यह क्रम पिछले तीन महीने से चल रहा है परन्तु भारत में पैट्रोल व डीजल के भाव स्थिर हैं।
सरकार ने ये भाव उत्पाद शुल्क में कमी करके थाम रखे हैं। विपक्ष यह भी आरोप लगाता रहता है कि सरकार ने उत्पाद शुल्क की दर बहुत ऊंची रखी हुई है। हालांकि इस बारे में विशेषज्ञों की राय अलग-अलग हो सकती है कि पैट्रोल व डीजल के भाव घरेलू बाजार में स्थिर रखने के लिए उत्पाद शुल्क में घट-बढ़ अन्तर्राष्ट्रीय भावों के समानान्तर होनी चाहिए जिससे घरेलू अर्थव्यवस्था के मानकों पर विपरीत असर न पड़े लेकिन जहां तक ईंधन गैस का सवाल है तो इसमें सरकार को भारी वृद्धि करनी पड़ी है जिसका असर रोजमर्रा की जिन्दगी पर भी पड़ा है। जाहिराना तौर पर वर्तमान समय सामान्य नहीं है तभी प्रधानमन्त्री को अपील करनी पड़ी है अतः प्रत्येक भारतवासी को देश को सर्वोपरि रखते हुए अपना निजी योगदान देना चाहिए।

Aditya Chopra

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