बाबा केदार : सनातन संस्कृति का आधार, विचार और विस्तार

Summary :

मंदाकिनी के तट पर स्थित करोड़ों भारतीयों की अटूट आस्था का केंद्र और हमारी सनातन संस्कृति की धड़कन बाबा केदार के पवित्र प्रांगण में उत्तराखंड के मुख्य सेवक के रूप में देश व प्रदेश की समृद्धि हेतु जब भी मैं कदम रखता हूं तो मुझे यहां की वायु में आदि गुरु शंकराचार्य व गुरु शंकराचार्य के तप की सुगंध और पत्थरों में पांडवों की भक्ति का स्पंदन सुनाई देता है। केदारनाथ मेरे लिए राजनीति से परे आत्मा का विश्राम स्थल और कर्त्तव्य की बेटी है। आज का केदारनाथ एक नए और भव्य भारत के आत्मविश्वास का प्रतीक बनकर पूरी दुनिया…

मंदाकिनी के तट पर स्थित करोड़ों भारतीयों की अटूट आस्था का केंद्र और हमारी सनातन संस्कृति की धड़कन बाबा केदार के पवित्र प्रांगण में उत्तराखंड के मुख्य सेवक के रूप में देश व प्रदेश की समृद्धि हेतु जब भी मैं कदम रखता हूं तो मुझे यहां की वायु में आदि गुरु शंकराचार्य व गुरु शंकराचार्य के तप की सुगंध और पत्थरों में पांडवों की भक्ति का स्पंदन सुनाई देता है। केदारनाथ मेरे लिए राजनीति से परे आत्मा का विश्राम स्थल और कर्त्तव्य की बेटी है। आज का केदारनाथ एक नए और भव्य भारत के आत्मविश्वास का प्रतीक बनकर पूरी दुनिया के सामने भारत की आध्यात्मिक तस्वीर और सनातन चेतना का प्रतिनिधित्व कर रहा है।
इतिहास इस बात का प्रमाण है कि कांग्रेस के शासनकाल में आस्था के केंद्र केदारनाथ को विकास योजनाओं से बाहर रखा गया लेकिन उससे भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण और वेदनापूर्ण था वर्ष 2013 की त्रासदी के समय तत्कालीन सरकार का संवेदनहीन और दूरदृष्टिहीन रवैया जिसे मानवता के माथे पर लगा एक ऐसा कलंक कहना अनुचित नहीं होगा जिसने करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और आपदा से प्रभावित लोगों की पीड़ा दोनों को गहराई से आहत किया। जब पूरी केदार घाटी अपनों को खोने के गम में डूबी थी, कोई अपने करीबियों की तलाश में भटक रहा था तो कोई अपने सपनों के आशियाने को मलबे के ढेर में समाते हुए देख प​ीड़ा में डूबा था। तब तत्कालीन प्रदेश सरकार दिल्ली के गलियारों में फाइलों और औपचारिकताओं में उलझी रही।
जबकि तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने मानवीय संवेदनाओं को सर्वोपरि रखते हुए राहत एवं पुनर्वास कार्यों के लिए सहायता कर हाथ बढ़ाया, परंतु राजनीतिक अहंकार में डूबी सरकार ने केंद्र के इशारों पर उस सहयोग को भी नकारने का संकेत दिया। स्थिति इतनी भयावह थी कि विभिन्न माध्यमों से प्राप्त 6260 करोड़ के बजट में से तत्कालीन प्रशासन मात्र 59% राशि ही खर्च कर पाया। हालिया कैग की जांच रिपोर्ट में पाया गया कि आपदा राहत हेतु प्राप्त लगभग 96.08 करोड़ रुपए उन सड़कों और पूलों पर खर्च किए गए जो त्रासदी में क्षतिग्रस्त ही नहीं हुए थे, जबकि लगभग 294 करोड़ से अधिक की राशि उन कार्यों में बहा दी गई जो मूल योजना का हिस्सा ही नहीं थे। ऐसा प्रतीत होता है मानो आपदा पीडि़तों के आंसू भी तत्कालीन सरकार की भ्रष्ट और दिशाहीन कार्यशैली की भेंट चढ़ गए हों।
सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह रहा कि राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण लगभग निष्क्रिय पड़ा रहा और केदारनाथ रोपवे व पुरोहित आवास जैसी महत्वपूर्ण परियोजनाएं बजट स्वीकृत होने के बावजूद वर्षों तक फाइलों में दबी रहीं। उस भीषण संकट में जब कई सरकारी तंत्र विफल हो रहे थे, तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक और भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता स्थानीय लोगों के लिए देवदूत बनकर सामने आए। शून्य से नीचे के तापमान में निस्वार्थ भाव से हमारे साथियों ने घायलों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया, अपनों से बिछड़े लोगों को मिलाया और मानवता की सेवा का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। वही संस्कार आज भी हमारी कार्यशैली का आधार हैं, नर सेवा ही नारायण सेवा है।
इसके विपरीत हमारी सरकार ने हर संकट में विकल्प रहित संकल्प की भावना के साथ करने किया है। ​सिलक्यारा सुरंग रेस्क्यू अभियान से लेकर उत्तरकाशी व धराली जैसी भीषण आपदा तक हमने टाइम बाउंड और ‘ग्राउंड जीरो’ आधारित आपदा प्रबंधन का उदाहरण प्रस्तुत किया। मैं स्वयं तब तक घटनास्थल पर डटा रहा, जब तक स्थिति पूर्णतः सामान्य नहीं हुई। आज उत्तराखंड आपदा प्रबंधन विभाग हर संकट में संवेदनशीलता, तत्परता के साथ जमीन पर कार्य करता हुआ दिखाई देता है।
हमारे लिए राजनीति नहीं, जनसेवा करना सर्वोच्य प्राथमिकता है। उनके लिए केदारनाथ मात्र एक पर्यटन स्थल था लेकिन हमारे लिए यह बाधा, संस्कृति और राष्ट्रचेतना का सर्वोच्य शिखर है। यही कारण है कि देश की जनता आज उस राजनीति को लगातार नकार रही है, जिसने दशकों तक भारत की प्राचीन सांस्कृतिक को और सनातन प्रतीकों को यह सम्मान और प्राथमिकता नहीं दी, जिसके वे वास्तविक रूप से पात्र थे।
इसके विपरीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हमारी सरकार विरासत के साथ, विकास की भावना के साथ केदार बद्रीनाथ, जागेश्वर, आदि कैलाश मानसखंड मंदिर माला के साथ ही काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, उज्जैन में महाकाल, अयोध्या और साेमनाथ जैसे आध्यात्मिक केंद्रों के पनर्जागरण को भारत की सांस्कृतिक अस्मिता और सनातन चेतना के पनर्स्थापन का राष्ट्रीय अभियान मानकर कार्य कर रही है। जिसने भारत की सांस्कृतिक आत्मा के पुनर्स्थानों को राष्ट्रीय संकल्प का स्वरूप दिया है। उनके नेतृत्व में अयोध्या में प्रभु श्री रामलला की प्राण प्रतिष्ठा ने करोड़ों भारतीयों की सदियों पुरानी प्रतीक्षा को पर्ण किया। आज सोमनाथ में भी, आध्यात्म व दिव्य अमृत महोत्सव हो रहा है जो ऐतिहासिक है। केदारनाथ में आधुनिक पुनर्निर्माण, बद्रीनाथ मास्टर प्लान चारधाम ऑल वेदर रोड, आदि कैलाश यात्रा मार्ग, मानसखंड मंदिर माला मिशन और देवभूमि उत्तराखंड के प्राचीन मंदिरों का संरक्षण भारत की आध्यात्मिक धारा को पुनः जनमानस के केंद्र में स्थापित कर रहे हैं।
मोदी जी के नेतृत्व में, संसद भवन में स्थापित संगोल’ आरती परंपरा, धर्माधारित नैतिक शासन और सांस्कृतिक निरंतरता का जीवंत प्रतीक बन चुका है। जिसका संदेश है कि आधुनिक भारत अपनी आत्मा से कटकर नहीं, अपनी सभ्यतागत चेतना को साथ लेकर आगे बढ़ेगा।
आज रिकॉर्ड संख्या में श्रद्धालुओं का केदारनाथ से अयोध्या व सोमनाथ पहुंचना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि जनता अपनी जड़ों की ओर लौट रही है। यह भारत के सांस्कृतिक आत्मविश्वास, सभ्यतागत गौरव और सनातन चेतना के पुनर्जागरण का प्रतीक है। आज देश जिस भव्य और दिव्य स्वरूप में दुनिया के सामने खड़ा है उसके पीछे मोदी जी का अटूट संकल्प, सनातन के प्रति उनकी अगाध आस्था है। लगभग 12,000 करोड़ रुपए से अधिक लागत की चारधाम ऑल वेदर रोड परियोजना ने श्रद्धालुओं की यात्रा को सुरक्षित और सुगम बनाया है, जबकि लगभग 4081 करोड़ रुपए की सोनप्रयाग- केदारनाथ रोपवे परियोजना और लगभग 2730 करोड़ की हेमकुंड साहिब रोपवे परियोजना भविष्य में करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए सुगम सिद्ध होगी।
चारधाम यात्रा में भी लगातार बढ़ रही श्रद्धालुओं की संख्या ने स्थानीय अर्थव्यवस्था और पर्यटन क्षेत्र को नई ऊर्जा प्रदान की है। होम स्टे योजना और आध्यात्मिक पर्यटन ने हजारों स्थानीय परिवारों की आजीविका को सशक्त किया है आज उत्तराखंड पहले से कहीं अधिक मजबूत हुआ है। आगामी 2027 महाकुंभ हेतु भी हमारी सरकार युद्ध स्तर पर कार्य कर रही है।
मोदी जी के कुशल मार्गदर्शन में, मैं देवभूमि के मूल स्वरूप इसकी आध्यात्मिक पहचान, हमारी प्राचीन परंपराओं और करोड़ों सनातन भाई-बहनों की श्रद्धा के प्रतीक इस पावन धाम की आत्मा को किसी भी कीमत पर विकृत या कमजोर नहीं होने दूंगा। मेरे लिए सत्ता और राजनीति से कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह प्रदेश, इसकी विरासत, इसकी समृद्धि और जनभावनाएं हैं। अतः देवभूमि की अस्मिता और सनातन गौरव की रक्षा के लिए मेरा प्रत्येक क्षण समर्पित रहेगा।

Shera Rajput