पंजाब की राजनीति में डेरों का प्रभाव कोई नई बात नहीं है, यह सालों से चलता आ रहा है। असल में डेरों की शुरुआत अंग्रेजों के समय से हुई जब उन्होंने सिखों की ताकत को कम करने के लिए, उन्हें गुरु ग्रन्थ साहिब से तोड़कर डेरों की ओर अग्रसर किया। देखते ही देखते सिख समुदाय के ज्यादातर लोगों का रुख डेरों की ओर बढ़ने लगा क्योंकि जितने भी डेरे खोले गए हैं उनमें से ज्यादातर डेरों के संचालक सिख समुदाय से ही लिए जाते। इतना ही नहीं डेरों के अन्दर गुरबाणी कीर्तन या गुरु ग्रन्थ साहिब से पंक्तियां लेकर उन्हें इधर-उधर जोड़कर लोगों को लुभाने का कार्य किया जाता।
आज तक किसी भी डेरे के द्वारा अपनी बाणी नहीं लिखी गई। आज हालात ऐसे बन चुके हैं कि पंजाब केवल खेत-खलिहानों और गुरुओं की धरती ही नहीं है, बल्कि यह डेरों की संस्कृति का भी बड़ा केंद्र बन चुका है। समय के साथ-साथ यह डेरे सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं रहे, बल्कि उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक जीवन में भी गहरी दख़लअंदाज़ी शुरू कर दी। आज पंजाब की राजनीति को समझने के लिए डेरों के प्रभाव को समझना बेहद ज़रूरी है।
अनौपचारिक आंकड़े बताते हैं कि पंजाब के 13 हजार में से 9 हजार गांवों में डेरों का प्रभाव है। इसलिए सभी राजनीतिक दलों को यह लगता है कि बिना डेरों से जुड़े उनका राजनीति में आगे बढ़ना संभव नहीं है जिसके चलते वह डेरों में हाजरियां भरते हैं। कांग्रेस, भाजपा, आप से लेकर स्वयं को पंथक कहलाने वाली पार्टी शिरोमणि अकाली दल के ज्यादातर नेतागण भी लम्बे समय से ऐसा ही करते आ रहे हैं। असल में डेरों के द्वारा समाजिक सेवाएं कर राजनीतिक पहचान बनाई जाती है जैसे शिक्षा, नशा-मुक्ति, लंगर और स्वास्थ्य सेवाएं देते हैं। इससे लोगों में भरोसा बनता है और वही भरोसा चुनाव के समय राजनीतिक फैसले में बदल जाता है।
आज पंजाब में वैसे तो सैंकड़ों डेरे चल रहे हैं मगर उनमें से कुछ प्रमुख हैं जिनमें डेरा सच्चा सौदा, राधा स्वामी सत्संग ब्यास, निरंकारी मिशन, नामधारी पंथ (भैणी साहिब), डेरा बाबा मुराद शाह (नकोदर), डेरा बाबा बालक नाथ, डेरा बल्लन रविदासिया डेरा है जिनके हजारों लाखों अनुयाई हैं और उन्हें डेरों से जो भी आदेश मिलता है वह उसी पर चलते हुए वोट करते हैं और उन्हें देखते हुए ज्यादातर आम वोटर की राय भी बदल जाती है जिससे यह तय माना जाता है कि डेरा प्रमुख की दिव्य दृष्टि जिस पार्टी या नेता पर पड़ गई उसके समर्थन में वोटों की बारिश होना तय है। पंजाब में कई चुनाव ऐसे रहे हैं जहां हार-जीत का अंतर बहुत कम था।
ऐसे में डेरों का समर्थन ही तय करता है कि सत्ता किसके हाथ में जाएगी। युवा पीढ़ी भले ही सोशल मीडिया और शिक्षा से जुड़ रही है लेकिन आज भी ग्रामीण पंजाब में डेरों का प्रभाव कम नहीं हुआ है। जब तक सामाजिक असमानता और पहचान की ज़रूरत बनी रहेगी तब तक डेरों की भूमिका राजनीति में बनी रहेगी। प्रधानमंत्री मोदी का पंजाब दौरा देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का पंजाब दौरा और वह भी संत रविदास की जयंती वाले दिन उनके डेरे में जाना पंजाब की राजनीति में होने वाले बदलाव की ओर इशारा करता दिख रहा है। नरेन्द्र मोदी शायद पहले प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने रविदास भाईचारे के डेरे में जाकर ना सिर्फ हाजरी भरी, बल्कि उन्हें पूर्ण सम्मान भी दिया और आदमपुर हवाई अड्डे का नाम भी संत रविदास के नाम पर रखा गया।
देखा जाए तो इस क्षेत्र में 32 प्रतिशत दलित समुदाय के वोट हैं और इस सम्मान के बाद निश्चित तौर पर उनकी सोच भाजपा के प्रति बदलने वाली है। आम तौर पर देखा जाता है कि यह वोट किसी एक पार्टी का ना जाकर इसका बंटवारा होता आया है, पर अब माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री के इस कदम के बाद यह एकतरफा भाजपा के समर्थन में भुगत सकता है जिसके चलते अन्य सभी पार्टियों की चिन्ता बढ़ना स्वभाविक सी बात है। आज तक पंजाब में भाजपा अकाली दल की बैसाखी बनकर सरकार बनाती आई है मगर अब पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अपने दम पर सरकार बनाने का ख्वाब संजोए हुए है और वह तभी पूरा हो सकता है जब शहरों के साथ साथ गांव देहात का वोट भी भाजपा के हक में भुगतें जो कि शुरू से ही एकतरफा शिरोमणि अकाली दल और पिछले चुनाव में आप को मिला।
इसी के चलते शायद भाजपा ने अब डेरों का रुख किया और हाल ही में डेरा बल्लन में प्रधाननमंत्री ने हाजरी भरी। इससे पूर्व डेरा ब्यास में भी प्रधानमंत्री मोदी होकर आए। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन सीमित था लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने कुछ बढ़ाैतरी दर्ज की। भाजपा की नजर अब दोआबा क्षेत्र की उन विधानसभा सीटों पर है जहां दलित और रविदासिया मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। भाजपा की रणनीति यही संकेत देती है कि पार्टी पंजाब में केवल पारंपरिक शहरी या सीमित वर्गीय राजनीति से बाहर निकलकर व्यापक सामाजिक संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है।
इसी प्रकार पंजाब के बड़े सियासी चेहरों को भी पार्टी में शामिल किया जा रहा है। सिख, रविदासिया और दलित समुदाय तक पहुंच बनाना पार्टी की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है, ताकि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी अपने लिए नया सामाजिक आधार तैयार कर सके। मजीठिया की रिहाई से अकालियों में ऊर्जा विक्रम सिंह मजीठिया की जेल से रिहाई ने वैंटीलेटर पर जाती शिरोमणि अकाली दल को मानो नया जीवनदान दे दिया। सत्ताधारी आम आदमी पार्टी की इच्छा रही होगी कि विक्रम मजीठिया को 2027 के आम चुनावों तक जेल में रखवाया जाए जिससे उन्हें शिरोमणि अकाली दल के खिलाफ प्रचार करने का पूरा मौका मिले मगर आज जिस प्रकार रिहा होकर मजीठिया ने पहला संदेश “टाइगर अभी ज़िंदा है” दिया जो सिर्फ भावनात्मक नहीं, बल्कि राजनीतिक संकेत था।
यह संदेश अकाली कार्यकर्ताओं के लिए ऊर्जा है और आम आदमी पार्टी की सरकार के लिए सीधी चुनौती। अब विपक्ष की राजनीति सिर्फ बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि सड़क से सदन तक संघर्ष का रूप ले सकती है। पंजाब की सियासत में लंबे समय बाद ऐसा दिन आया जब एक रिहाई ने पूरे राजनीतिक माहौल में हलचल पैदा कर दी। शिरोमणि अकाली दल के वरिष्ठ नेता बिक्रम सिंह मजीठिया की जेल से वापसी सिर्फ एक व्यक्ति की आज़ादी नहीं है, बल्कि यह उस राजनीति की वापसी है जो आक्रामक तेवर, संगठनात्मक पकड़ और सत्ता से सीधी टक्कर के लिए जानी जाती है। मजीठिया जब जेल में थे तब अकाली दल की राजनीति कुछ हद तक रक्षात्मक हो गई थी। पार्टी का हमला सीमित था और नेतृत्व का एक बड़ा चेहरा मैदान से बाहर था।
उनकी अनुपस्थिति में अकाली दल वह धार नहीं बना पाया जो कभी उसकी पहचान थी। अब मजीठिया की वापसी से पार्टी को फिर से आक्रामक विपक्ष की आवाज़ मिल गई है। अब तक सरकार मजीठिया की गिरफ्तारी को ‘नशे के खिलाफ कार्रवाई’ के रूप में पेश करती रही लेकिन रिहाई के बाद विपक्ष इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताकर जनता के बीच ले जाएगा। मुख्यमंत्री भगवंत मान के द्वारा रिहाई से पूर्व जेल में मजीठिया से मिलने पहुंचे डेरा ब्यास मुखी गुरिन्दर सिंह ढिल्लो पर जिस प्रकार तंज कसा गया उससे भी जनता काफी खफा दिखाई दे रही है।
वहीं दिल्ली से शिरोमणि अकाली दल नेता परमजीत सिंह सरना ने साफ कहा कि एक धार्मिक डेरे के मुखी का जेल में मजीठिया से मुलाकता करना और बाहर आकर मीडीया से रूबरू होकर यह कहना कि वह उनके दोस्त, रिश्तेदार हैं और बेकसूर हैं, दर्शाता है कि मजीठिया ही नहीं समूचे शिरोमणि अकाली दल को बिना वजह बदनाम किया जा रहा है मगर सच्चाई ज्यादा देर तक छुपाई नहीं जा सकती। मजीठिया की रिहाई के बाद एक बार पुनः भाजपा-शिरोमणि अकाली दल गठबंधन के क्यास भी लगाए जाने लगे हैं क्योंकि बीते लम्बे से पंजाब भाजपा के नेता यह कहते दिख रहे हैं कि बिना गठबंधन के सरकार बनाना मुश्किल है, मगर दिल्ली में बैठे नेतागण शिरोमणि अकाली दल से गठबंधन के पक्ष में नहीं।
क्योंकि जिस प्रकार के इल्जाम अकाली दल पर लगे उसके चलते उन्हें लगता है कि इसके छींटे कहीं उनके दामन पर भी ना आ जाएं, इसलिए वह हाईकमान को अपने दम पर पंजाब में चुनाव लड़ने की बात करते हैं।


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