देश में रैगिंग प्रतिबंधित है। साल 2001 में रैगिंग पर बैन लगाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर एक गाइडलाइन जारी की थी, जिसमें छात्रों को चिढ़ाने, उनके साथ बुरा बर्ताव, उन्हें परेशान करना, छेड़ना, गलत काम करने के लिए बाध्य करना, सीनियर होने के नाते उनसे अनुचित काम कराना, अपराध है। कॉलेज या यूनिवर्सिटी कैंपस में उनके साथ कुछ भी ऐसा करना, जिससे उन्हें शर्मिंदगी महसूस हो, परेशानी हो या उनकी मानसिक सेहत प्रभावित हो, इसे अनुशासनहीनता माना जाता है। साल 2009 में हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में एक शराबी सीनियर ने अपने जूनियर छात्र पर हमला किया था। अमन नाम के इस स्टूडेंट की मौत हो गई थी, इस घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट ने रैगिंग से निपटने के लिए सीबीआई के तत्कालीन निदेशक आरके राघवन की अध्यक्षता में एक समिति बनाई थी।
उनकी सिफारिशों के आधार पर यूजीसी ने रैगिंग से निपटने के लिए कॉलेजों में दिशा-निर्देश तैयार किए। रैगिंग आज भी मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में समस्या बनी हुई है। फ्री प्रेस जर्नल की एक रिपोर्ट में यूजीसी के हवाले से कहा गया था कि साल 2022 से लेकर 2023 के बीच में एंटी-रैगिंग हेल्पलाइन नंबर 1800-180-5522 पर रैगिंग की 858 शिकायतें मिली थीं। यह संख्या साल 2021-22 में 582 थी। 1 जनवरी, 2023 से 28 अप्रैल, 2024 के बीच शिक्षण संस्थानों में रैगिंग की 1,240 घटनाएं दर्ज की गईं। इनमें से 82.18 प्रतिशत शिकायतें छात्रों ने दर्ज कराईं, 17.74 प्रतिशत छात्राओं ने और 0.08 प्रतिशत ट्रांसजेंडर वर्ग के स्टूडेंट ने शिकायत की। जनवरी 2018 से अगस्त 2023 के बीच रैगिंग के कारण कम से कम 25 छात्रों ने आत्महत्या कर ली।
सीनियर छात्र, अपना दबदबा दिखाने के लिए रैगिंग करते हैं। डर की वजह से जूनियर छात्र, अपनी शिकायतें नहीं दर्ज करा पाते हैं। जो छात्र बड़े राजनीतिक पकड़ वाले होते हैं वे इसकी धौंस दिखाकर छात्रों को डराते हैं। कुछ लोग गुंडों के समर्थन की वजह से अपना दबदबा दिखाते हैं। रैगिंग के दर्ज मामले बेहद कम होते हैं, पुलिस जांच और गिरफ्तारी की नौबत कई मामलों में कभी नहीं आती। हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला की रहने वाली 19 साल की एक दलित छात्रा की 26 दिसंबर 2025 को मौत हो गई थी. परिजनों के मुताबिक़, वह पिछले क़रीब दो महीनों से गंभीर मानसिक तनाव और डिप्रेशन में थीं और इस दौरान अलग-अलग अस्पतालों में उनका इलाज भी चला। छात्रा के पिता का आरोप है कि उनकी बेटी कॉलेज में पढ़ाई के दौरान प्रताड़ना का शिकार हुई थीं। उन्होंने आरोप लगाया कि कॉलेज की तीन छात्राओं और एक प्रोफ़ेसर ने उनकी बेटी को मानसिक और शारीरिक रूप से परेशान किया, जिसके चलते उसकी हालत बिगड़ती चली गई।
पिता की शिकायत के आधार पर धर्मशाला पुलिस ने यौन उत्पीड़न और जानबूझकर चोट पहुंचाने से जुड़ी भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 75, 115(2), 3(5) और हिमाचल प्रदेश शैक्षणिक संस्थान (रैगिंग निषेध) अधिनियम, 2009 की धारा 3 के तहत मामला दर्ज किया है। छात्रा के पिता का दावा है कि उन्होंने कई बार इस बारे में आवाज़ उठाने की कोशिश की, लेकिन उन्हें यह समझ नहीं आ रहा था कि किस स्तर पर शिकायत दर्ज कराई जाए। “धर्मशाला के बाद मंडी में रैगिंग का मामला सामने आया है। श्री लाल बहादुर शास्त्री मेडिकल कालेज एवं अस्पताल नेरचौक में एमबीबीएस तृतीय वर्ष के दो प्रशिक्षु डाक्टरों ने द्वितीय वर्ष के प्रशिक्षु डॉक्टर के छात्रावास के कमरे में घुसकर पिटाई की। दोनों आरोपितों पर रैगिंग करने का आरोप भी लगाया था।
शिकायत मिलने के बाद कॉलेज प्रबंधन ने मामले की जांच के लिए एक कमेटी का गठन किया था। कमेटी ने जांच में दोनों आरोपितों पर छात्रावास के कमरे में घुसकर जूनियर प्रशिक्षु डॉक्टर की पिटाई किए जाने के आरोप सही पाए गए। आगरा के एसएन मेडिकल कालेज में भी रैगिंग का मामला सामने आया है। एमबीबीएस तृतीय वर्ष के छात्र ने चार सीनियर छात्रों पर कार में बैठाकर ले जाने से मना करने पर पिटाई का आरोप लगाया है। छात्र ने अपने भाई को बुला लिया मगर आरोपियों ने उसकी भी पिटाई कर दी। पीड़ित की शिकायत पर थाना एमएम गेट में चार मेडिकल छात्रों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है। जीवन के असहाय पन्ने अगर कालेज में बिखरे या कानून की नजर में उजड़े, तो न समाज का घर आबाद है और न ही देश का सही हाल है।
क्या रैगिंग में संलिप्त छात्राएं सुरक्षा में रहीं और क्या कोई अध्यापक अपनी नीच हरकतों से कालेज का ईमान बेचता रहा। आखिर हो क्या रहा और होता क्या रहा। आपसी परिचय या सहजता के नाम पर किसी विद्यार्थी को इस हद तक प्रताड़ित करना कि वह उसके लिए जानलेवा साबित हो, क्या एक सामंती कुंठा का परिचायक नहीं है? शारीरिक और मानसिक यातना दिए जाने की वजह से किसी विद्यार्थी की जान जाने की घटनाएं अक्सर व्यापक चिंता का कारण बनती रही हैं और इस पर हर हाल में रोक लगनी चाहिए। रैगिंग लेने वाले छात्रों की मनोवृत्ति बहुत हद तक, उनके परिवेश पर निर्भर करती है। वे कहां से आते हैं, कैसे उनके माता-पिता का व्यवहार है, किस सामाजिक पृष्ठभूमि से वे हैं।
कुछ युवा जब स्कूलों में पहुंचते हैं और अपने सामाजिक पहुंच या ताकत की वजह से कुछ और छात्रों का संरक्षण उन्हें मिलता है तो वे अपनी मनोवृत्ति दिखानी शुरू करते हैं। उन्हीं छात्रों को ज्यादा निशाना बनाया जाता है, जो थोड़े डरे-सहमे से रहते हैं। कुछ छात्र सीधे गांव या एकाकी परिवारों से निकलकर चमक-दमक वाले कॉलेज में आते हैं। वे कुछ दिन असहज होते हैं और ऐसे में जब उन्हें रैगिंग या किसी सीनियर साथी के उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है तो वे मनोवैज्ञानिक तौर पर टूट जाते हैं। ये छात्र अपने परिवार से भी दूर होते हैं और वे समूह के सामने अपमानित होने की वजह से आत्मघाती कदम तक उठा लेते हैं। कॉलेज और विश्वविद्यालयों के पास एंटी रैगिंग समितियां नाम की होती हैं। जब तक भारतीय न्याय संहिता में इसे संज्ञेय और गंभीर अपराध नहीं माना जाएगा, ऐसी घटनाएं थमेंगी नहीं। बिना कठोर कानूनी नियमों के यह सोचना भी कि रैगिंग खत्म हो जाएगी, कोरी कल्पना है। इसे खत्म करना है तो पहले इसे अपराध मानना अनिवार्य है।


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