बस एक नाम

Summary :

जब भारत और दुनिया के कई अन्य हिस्सों में मतदाता मतदान करने के लिए लंबी दूरी तय करते हैं, तो वे इस उम्मीद के साथ ऐसा करते हैं कि कम से कम इस बार उनके द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के साथ उनका जीवन बेहतर होगा, कम से कम इस बार वे सचमुच उन लोगों के लिए काम करेंगे जिन्होंने अपनी आशाएं और आकांक्षाएं अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों पर टिका रखी हैं। कम से कम इस बार उनकी समस्याओं और मुद्दों का समाधान संसद के भीतर और बाहर कहीं न कहीं निकल पाएगा। कम से कम इस बार… लेकिन यह “कम से…

जब भारत और दुनिया के कई अन्य हिस्सों में मतदाता मतदान करने के लिए लंबी दूरी तय करते हैं, तो वे इस उम्मीद के साथ ऐसा करते हैं कि कम से कम इस बार उनके द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के साथ उनका जीवन बेहतर होगा, कम से कम इस बार वे सचमुच उन लोगों के लिए काम करेंगे जिन्होंने अपनी आशाएं और आकांक्षाएं अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों पर टिका रखी हैं। कम से कम इस बार उनकी समस्याओं और मुद्दों का समाधान संसद के भीतर और बाहर कहीं न कहीं निकल पाएगा। कम से कम इस बार… लेकिन यह “कम से कम इस बार” हर साल एक मृगतृष्णा ही बना रहता है।

चुनाव आते-जाते रहते हैं, सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन आम जनता की हालत और उसकी समस्याएं जस की तस बनी रहती हैं। यह कहना भी अनुचित होगा कि कोई विकास या प्रगति नहीं हुई है, लेकिन सवाल यह है कि क्या लोगों के जीवन में वास्तव में सकारात्मक बदलाव आया है। कुछ क्षेत्रों में शायद ऐसा हुआ हो, पर अनेक क्षेत्रों में आज भी गंभीर कमियां बनी हुई हैं जिन्हें दूर किया जाना बाकी है। लगातार आने वाली सरकारों ने कल्याणकारी योजनाएं लागू की हैं, लेकिन भारत जैसे विशाल देश के लिए ये प्रयास समुद्र में बूंद के समान ही प्रतीत होते हैं।

इसी संदर्भ में संसद की भूमिका भी सवालों के घेरे में रही है। सत्र दर सत्र बार-बार स्थगन और व्यवधान देखने को मिले हैं, जिनके कारण कोई ठोस या रचनात्मक कामकाज नहीं हो पाया। इसके अलावा, सांसदों ने सदन के भीतर और बाहर जनसमस्याओं पर गंभीर चर्चा करने के बजाय गैर-मुद्दों पर अपना बहुमूल्य समय अधिक खर्च किया है। उदाहरण के तौर पर, हाल ही में संपन्न शीतकालीन सत्र में विपक्ष और सत्तापक्ष के बीच, कहने के लिए, एक नाम को लेकर तीखी नोकझोंक देखने को मिली। विवाद का केंद्र सरकार द्वारा एक योजना का नाम बदलना और उसमें महात्मा गांधी के स्थान पर ‘राम’ को शामिल करना था, वह सर्वव्यापी ईश्वर, जिसका राजनीतिक रूप से भाजपा को भरपूर लाभ मिलता रहा है।

यह सर्वविदित है कि राम मंदिर अभियान ने न केवल भाजपा को सत्ता तक पहुंचाने में मदद की, बल्कि उसे लंबे समय तक सत्ता में स्थापित भी किया। इसलिए सत्तारूढ़ भाजपा का समय-समय पर इस मुद्दे को फिर से उभारना स्वाभाविक ही माना जा सकता है। हाल ही में यही हुआ, जब सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के स्थान पर ग्रामीण रोजगार से जुड़ा एक संशोधित कानून पेश किया। मनरेगा की तरह ही इस नए कानून का नाम भी कुछ हद तक जटिल और कठिन उच्चारण वाला है, ‘विकसित भारत–ग्रामीण रोजगार एवं आजीविका मिशन गारंटी विधेयक’, जिसे संक्षेप में VB-G RAM G कहा गया है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि इसमें केंद्रीय भूमिका ‘राम’ शब्द की ही है, एक ऐसा शब्द जो भाजपा के लिए न केवल मधुर ध्वनि रखता है, बल्कि राजनीतिक जादू भी करता रहा है।

इसके पहले और बाद में जुड़े दो ‘जी’ (G) अक्षर उस श्रद्धा का भाव जोड़ते हैं, जो भाजपा के सबसे पूज्य देवता के प्रति अपेक्षित मानी जाती है। सारतः, ‘G RAM G’ में न केवल काव्यात्मकता है, बल्कि यह उस मतदाता वर्ग के साथ गूंज पैदा करने की क्षमता भी रखता है, जो अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए आज भी भगवा दल का आभारी है। हालांकि यह एक अलग विषय है कि इस विशाल परियोजना को रिकॉर्ड समय में पूरा करने के लिए किए गए असाधारण प्रयास और लगभग असंभव समय-सीमाएं अपेक्षित राजनीतिक लाभ दिला पाईं या नहीं। एक रोचक, हालांकि अपुष्ट, पहलू यह भी है कि ‘G RAM G’ नामकरण पर जितना समय लगाया गया, संभवतः उससे कम समय नई योजना की बारीकियों पर विचार करने में लगाया गया।

विपक्ष का तर्क है कि नई योजना की कोई वास्तविक आवश्यकता नहीं थी और सरकार जिन उद्देश्यों की बात कर रही है, उन्हें हासिल करने के लिए मौजूदा कानून में संशोधन ही पर्याप्त था। तकनीकी पहलुओं से परे, इस पूरे विवाद के केंद्र में योजना का नामकरण ही है। विपक्षी दल सरकार द्वारा योजना से महात्मा गांधी का नाम हटाए जाने से नाराज हैं। इस विरोध का नेतृत्व कांग्रेस कर रही है, जिसने केंद्र सरकार की उस “सनक” पर सवाल उठाया है, जिसके तहत वह पहले से मौजूद हर योजना का नाम बदलने पर आमादा दिखती है। हालांकि यह टकराव राष्ट्रपिता और भारतीय ईश्वर के बीच का नहीं बनाया गया, क्योंकि ऐसा करना घोर अपवित्रता माना जाता। इसलिए विपक्ष ने सावधानी बरती और राम का उल्लेख किए बिना, अथवा नए नाम पर सीधा प्रहार किए बिना, केवल महात्मा गांधी का नाम हटाए जाने पर ही अपनी आपत्ति सीमित रखी।

यदि उसने ऐसा नहीं किया होता, तो न केवल राम भक्तों के आक्रोश का सामना करना पड़ता, बल्कि भाजपा को यह कहने का एक आसान अवसर भी मिल जाता कि विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस, राम-विरोधी है। अपनी ओर से सत्तारूढ़ नेतृत्व ने गांधी और राम, इन दोनों विषयों को जोर-शोर से उछाला। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने यह कहते हुए कि गांधी “हमारे दिलों में बसते हैं”, कहा, “बापू रामराज्य की बात किया करते थे और उनके अंतिम शब्द ‘हे राम’ थे, लेकिन विपक्ष को ‘राम’ कहने में समस्या है।” कांग्रेस ने पलटवार करते हुए कहा, “इतिहास आपको इस बात के लिए याद रखेगा कि आपने विधेयक से महात्मा गांधी का नाम हटा दिया,” और इस दौरान उसने महात्मा गांधी की तस्वीरें हाथ में लेकर विरोध प्रदर्शन भी किया।

नाम बदलने को लेकर भाजपा का जुनून कोई नई बात नहीं है। एक स्तर पर यह औपनिवेशिक विरासत के प्रति उसके विरोध से जुड़ा है, तो दूसरे स्तर पर नेहरू–गांधी विरासत के प्रति उसकी तीव्र असहमति से। पहले पहलू में भाजपा मुगलकाल और औपनिवेशिक दौर से जुड़े नामों को बदलने पर अडिग रही है। इसी के परिणामस्वरूप भाजपा ने कई शहरों के नाम बदलकर उन्हें हिंदू या हिंदी पहचान देने का प्रयास किया है। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद का नाम प्रयागराज किया गया, फैजाबाद को अयोध्या और मुस्तफाबाद को कबीर धाम नाम दिया गया। इसी तरह महाराष्ट्र में औरंगाबाद का नाम छत्रपति संभाजीनगर तथा उस्मानाबाद का नाम धाराशिव कर दिया गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दिल्ली में भी कई प्रतीकात्मक बदलाव किए गए।

राजधानी का प्रसिद्ध राजपथ अब ‘कर्तव्य पथ’ कहलाता है और रेसकोर्स रोड स्थित प्रधानमंत्री आवास का नाम बदलकर ‘लोक कल्याण मार्ग’ कर दिया गया। इन परिवर्तनों के पीछे संभवतः यह संदेश निहित था कि वर्तमान सरकार स्वयं को कर्तव्यनिष्ठ शासन के रूप में प्रस्तुत करना चाहती है और सत्ता का उसका केंद्र जनकल्याण के विचार से प्रेरित है। एक अन्य स्तर पर, भाजपा-नेतृत्व वाली सरकार ने योजनाओं से ‘विरासत की छाप’ हटाने का भी प्रयास किया। जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीनीकरण मिशन को ‘अमृत’ (अटल मिशन फॉर रीजुवेनेशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन) में बदला गया और राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना का नाम बदलकर ‘दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना’ कर दिया गया, ये केवल दो उदाहरण हैं।

इसके पीछे उद्देश्य गैर-कांग्रेस नेताओं को केंद्र में लाना भी था, जिनके राष्ट्र, उसके विकास और प्रगति में योगदान को लंबे समय तक अपेक्षित महत्व नहीं मिला। इसलिए जब जवाहरलाल नेहरू या राजीव गांधी के नाम की जगह अटल बिहारी वाजपेयी और दीन दयाल उपाध्याय के नाम रखे गए, तो इसमें एक तरह की ‘सोची-समझी रणनीति’ थी। एक बड़ा संशोधन नेहरू मैमोरियल संग्रहालय को लेकर किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हस्तक्षेप से पहले तक विशाल तीन मूर्ति भवन मुख्यतः भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से ही जुड़ा माना जाता था। यद्यपि यह नेहरू का आधिकारिक निवास था, लेकिन समय के साथ यह नेहरू–गांधी परिवार की एक तरह की निजी विरासत जैसा बन गया था। वास्तव में, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की अंतिम यात्रा भी तीन मूर्ति भवन से ही शुरू हुई थी।

Team Desk