पिछले दो दशकों में देश के दूसरे सबसे बड़े राज्य महाराष्ट्र की राजनीति में जो गुणात्मक परिवर्तन गांवों से लेकर शहरों तक में आया है उससे भारतीय जनता पार्टी की तेजी से बढ़ती लोकप्रियता का अन्दाजा आसानी से हो सकता है। हालांकि 2024 के लोकसभा चुनावों में राज्य में भारतीय जनाता पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी थी मगर बाद में इसी वर्ष में हुए विधानसभा चुनावों में इस पार्टी ने सभी पुराने रिकार्ड तोड़ते हुए अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। भाजपा ने यह सफलता एक समय में राज्य में सबसे मजबूत मानी जाने वाली पार्टी कांग्रेस की कीमत पर हासिल की है। इससे राज्य भर में कांग्रेस पार्टी अब हाशिये पर जाती दिखाई पड़ रही है परन्तु इस पार्टी की जड़ें अभी तक राज्य के गांवों से लेकर शहरों तक में फैली हुई हैं और इसकी विरासत काफी विस्तृत मानी जाती है जिसकी वजह से यह यदा-कदा चुनावों में आंचलिक स्तर पर चमत्कार भी पैदा कर देती है।
हाल में सम्पन्न महाराष्ट्र राज्य के 29 नगर निगम ( मुम्बई समेत) चुनावों में भारतीय जनता पार्टी व उसके सहयोगी दलों को 23 शहरों में सफलता प्राप्त हुई है परन्तु कांग्रेस पार्टी भी अपने बूते पर दो शहरों भिवंडी व लाटूर में अपना बहुमत कायम रखने में कामयाब हो गई है किन्तु इस राज्य से 1999 के करीब कांग्रेस से अलग हुई श्री शरद पवार की पार्टी राष्ट्रवादी कांग्रेस का अब लगभग सफाया हो गया है और इसके साथ ही राज्य की दूसरे नम्बर की सर्वाधिक शक्तिशाली माने जाने वाली पार्टी शिवसेना के लिए भी मुम्बई को छोड़ कर शेष राज्य में अस्तित्व का संकट पैदा हो गया है। राज्य में भारतीय जनता पार्टी का राजनीतिक ग्राफ बहुत उतार-चढ़ाव वाला भी रहा है परन्तु 90 के दशक से इसने शिवसेना के साथ गठबन्धन करके अपनी ताकत में इजाफा करना शुरू किया और अपनी हिन्दुत्ववादी राजनीति का विस्तार भी शिवसेना की कीमत पर भी किया। शिवसेना के प्रभाव में 80 के दशक से राज्य भर में विस्तार होना शुरू हुआ जिसकी शुरूआत मुम्बई नगर निगम से ही हुई। इसके बाद इस पार्टी का राज्य के अन्य क्षेत्रों में भी इसकी मराठी अस्मिता की राजनीति ने असर दिखाना शुरू किया और मराठी मानुस व हिन्दुत्व इसके मूल मन्त्र बनते गये। भाजपा ने इसी पार्टी के साथ गठबन्धन करके हिन्दुत्व के राष्ट्रीय फलक को महाराष्ट्र में उतारा और अपने प्रभाव में विस्तार किया। इस बहाने शिवसेना के साथ-साथ भाजपा भी राज्य के गांवों तक पहुंची। वरना 70 के दशक तक यह पार्टी राज्य में उत्तर भारत की पार्टी कहलाती थी और उस नागपुर इलाके से भी हारती रहती थी जहां शुरू से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय विद्यमान है। परन्तु 90 के दशक के आते-आते इसमें आधारभूत परिवर्तन आना शुरू हुआ जिसमें 1986 से शुरू हुए अयोध्या में श्री राम मन्दिर निर्माण आन्दोलन की भी प्रमुख भूमिका रही।
इस आन्दोलन का उस समय शिवसेना ने भी खुलकर समर्थन किया था और आन्दोलन को उग्र तेवर तक बख्शे थे। शिवसेना के संस्थापक स्व . बाला साहेब ठाकरे ने राम मन्दिर आन्दोलन में अपने स्वयंसेवकों की काफी बड़ी फौज भी भेजी थी। मगर इस आन्दोलन की बागडोर भारतीय जनता पार्टी के हाथ में थी और इसके तत्कालीन नेता श्री लाल कृष्ण अडवानी इसका नेतृत्व कर रहे थे। अतः महाराष्ट्र जैसे पश्चिमी राज्य में भाजपा को अपना विस्तार करने में सुविधा हुई। इससे पहले जब 1967 में पूरे देश में गैर कांग्रेसवाद की लहर चली थी तो भाजपा (जनसंघ) केवल उत्तर भारत के राज्यों तक ही सीमित होकर रह गई थी हालांकि इस वर्ष देश के नौ राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारों का पहली बार गठन हुआ था।
महाराष्ट्र की 48 लोकसभा सीटों में से 47 सीटें कांग्रेस के पास रही थी और राज्य विधानसभा में इसका दो-तिहाई बहुमत आया था। मगर 70 के दशक के बाद से इसमें कमी दर्ज होनी शुरू हुई जिसकी वजह मूल रूप से शिवसेना ही थी क्योंकि इसने अपनी उग्र हिन्दुत्व व मराठी अस्मिता की राजनीति को राज्य के मराठी मानुस तक पहुंचाने में सफलता प्राप्त की। भाजपा के 90 के दशक से इसके साथ सहयोग से राज्य में कांग्रेस का प्रभुत्व घटने लगा और 80 के दशक के उत्तरार्द्ध में भाजपा के राष्ट्रीय फलक पर चमकने से राष्ट्रीय लोकसभा चुनावों व विधानसभा चुनावों में भी शिवसेना के साथ इसे अच्छी सफलता मिलने लगी। दोनों पार्टियों के बीच यह मेलजोल 2019 तक बना रहा मगर इस वर्ष हुए चुनावों के बाद मुख्यमन्त्री पद को लेकर दोनों पार्टियों के बीच तकरार हो गई और शिवसेना ने भाजपा के साथ अपना गठबन्धन तोड़ दिया और उस कांग्रेस पार्टी के साथ हाथ मिला लिया जिसके विरुद्ध वह अपने जन्मकाल से ही संघर्ष करती आ रही थी। इससे शिवसेना के उस सैद्धान्तिक पक्ष को गहरा धक्का लगा जिसे सामने रखकर वह मराठियों से वोट मांगा करती थी।
हकीकत यह थी कि 2019 का विधानसभा चुनाव शिवसेना व भाजपा दोनों ने साथ मिल कर ही लड़ा था और मतदाताओं ने इस गठबन्धन को पूर्ण बहुमत भी दिया था जिसमें भाजपा विधायकों की संख्या शिवसेना के विधायकों से ज्यादा थी परन्तु शिवसेना मुख्यमन्त्री पद अपने पास ही रखना चाहती थी और इसी लालच में इसने गठबन्धन तोड़कर कांग्रेस व शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस से हाथ मिला कर अपने नेता उद्धव ठाकरे को मुख्यमन्त्री बना दिया इससे शिवसेना के हाथ में सत्ता तो आ गई मगर उसका जनाधार सिसकियां भरने लगा जिसे 2022 में इसी पार्टी के नेता एकनाथ शिन्दे ने तोड़ लिया और शिवसेना से विद्रोह करके अपनी अलग शिवसेना बना ली। 2022 के बाद महाराष्ट्र में जितने भी चुनाव हुए हैं उन सभी में शिन्दे की शिवसेना को बेहतर सफलता प्राप्त हुई है। शिन्दे ने रणनीतिक रूप से भाजपा से गठबन्धन किया और बाला साहेब ठाकरे की सैद्धान्तिक राजनीति को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जिसमें उन्हें लगातार सफलता मिल रही है। मगर इस उठा-पटक में कांग्रेस व शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस तथा उद्धव ठाकरे की शिवसेना राज्यभर से अपना अस्तित्व खोती जा रही हैं जिसे भारतीय जनता पार्टी बहुत तेजी से भरती जा रही है। एक मायने में महाराष्ट्र भारतीय जनता पार्टी के लिए एेसी प्रयोगशाला बनी है जिसका अनुकरण उन राज्यों में किया जा सकता है जहां भाजपा अभी कमजोर है और क्षेत्रीय दल कांग्रेस से काफी आगे निकल चुके हैं। अतः महाराष्ट्र के निकाय चुनावों का प्रभाव राष्ट्रीय स्तर पड़ना स्वाभाविक माना जा रहा है।
तेजी से बदलता ‘महाराष्ट्र’
Summary :
पिछले दो दशकों में देश के दूसरे सबसे बड़े राज्य महाराष्ट्र की राजनीति में जो गुणात्मक परिवर्तन गांवों से लेकर शहरों तक में आया है उससे भारतीय जनता पार्टी की तेजी से बढ़ती लोकप्रियता का अन्दाजा आसानी से हो सकता है। हालांकि 2024 के लोकसभा चुनावों में राज्य में भारतीय जनाता पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी थी मगर बाद में इसी वर्ष में हुए विधानसभा चुनावों में इस पार्टी ने सभी पुराने रिकार्ड तोड़ते हुए अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। भाजपा ने यह सफलता एक समय में राज्य में सबसे मजबूत मानी जाने वाली पार्टी कांग्रेस की कीमत पर…


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