आज की तारीख में सोशल मीडिया भारत के लिए एक बुरी खबर ला रहा है। नैतिकता और संस्कार खत्म हो रह हैं। हमारा युवा वर्ग किधर जा रहा है, इसे फोकस में रख कर कुछ करने का वक्त आ गया है।
सोशल मीडिया के इस आधुनिक युग में ‘रील्स’ मनोरंजन का सबसे सशक्त माध्यम बनकर उभरी है। इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब शॉर्ट्स पर 15 से 60 सैकेंड के ये वीडियो आज हर उम्र के व्यक्ति की पहली पसंद बन चुके हैं लेकिन मनोरंजन के नाम पर शुरू हुआ यह सिलसिला अब धीरे-धीरे ‘रील्स के दुरुपयोग’ और एक गंभीर सामाजिक लत में बदलता जा रहा है। िकसी भी रील के जरिए झूठ फैला कर दंगे कराने जैसी घिनौनी साजिशें इसी रील के माध्यम से की जा रही हैं। सरकार को कुछ करना ही होगा।
रील्स ने सूचना और मनोरंजन के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है लेकिन इसके पीछे एक काला सच भी छिपा है। आज रील्स केवल मनोरंजन का साधन नहीं रहीं, बल्कि यह मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक मूल्यों और शारीरिक सुरक्षा के लिए एक चुनौती बन गई है। मेरा यह मानना है कि माता-पिता को अपने बच्चों को घरों में उनकी मोबाइल से जुड़ी गतिविधियों को लेकर नजर रखनी चाहिए। इतना ही नहीं जब वे देर रात तक घर नहीं आते या रात को घर में ही रहने पर मोबाइल में रीलें एक-दूसरे से शेयर करते रहते हैं तो इस पर भी माता-पिता को नजर रखनी होगी। रील्स के चंगुल में फंसा हर व्यक्ति एक के बाद एक वीडियो देखता जाता है जिससे मस्तिष्क में डोपामिन नामक हार्मोन रिलीज होता है। यह ठीक वैसी ही लत है जैसी शराब या जुए की होती है। अब कुछ करना ही होगा। लोग दूसरों की रील्स में दिखाई गई चमक-धमक वाली जिंदगी से अपनी वास्तविकता की तुलना करने लगते हैं जो कि डिप्रैशन वाली है। लगातार छोटे वीडियो देखने से इंसानी दिमाग की एकाग्रता कम हो रही है। अब लोग लंबी फिल्में या किताबें पढ़ने में असमर्थ महसूस करते हैं।
मीडिया की सुर्खियां बता रही हैं कि आजकल “वायरल” होने की चाहत में लोग अपनी जान की परवाह भी नहीं करते। रेलवे ट्रैक पर वीडियो बनाना, चलती गाड़ी की छत पर स्टंट करना या ऊंची इमारतों से लटकना-ये सब रील्स के दुरुपयोग के खतरनाक उदाहरण हैं। कई बार इन स्टंट्स के चक्कर में युवाओं को अपनी जान तक गंवानी पड़ी है। प्रेस के लिए मीडिया रैगुलेटरी है तो रील्स पर कंट्रोल के लिए भी सरकार को कुछ रैगुलेटरी लानी होगी। प्रैस कौंसिल ऑफ इंडिया ने मीडिया जगत में अपनी एक गौरवपूर्ण पहचान बनाई है।
मैंने पाया है िक व्यूज और फॉलोअर्स बटोरने के लिए कई लोग रील्स पर अश्लील डांस, अभद्र भाषा और द्विअर्थी संवादों का सहारा ले रहे हैं। चूंकि ये वीडियो हर उम्र के बच्चों तक पहुंच रहे हैं, इसलिए यह उनके कोमल मन पर बुरा प्रभाव डाल रहा है। लिहाजा अब सरकार से अनुरोध है कि वह इस दिशा में कुछ करने के लिए पग उठाए।
किसी बड़े स्टार की मौत पर उसकी पत्नी के साथ किसी अन्य कलाकार के अश्लील कंटैंट डालने को क्या कहेंगे? कहीं भी बुलडोजर चलने को किसी जाति के साथ जोड़कर चलने का काम रील द्वारा किया जा रहा है। साम्प्रदायिक माहौल बिगाड़ने की अनुमति नहीं दी जा सकती। कुछ रैगुलेटरी तो लानी ही होगी। रील बनाने में यूथ पैसे कमाने के लिए अपना असली मकसद भुलाकर दिशा से भटक चुका है। यदपि सरकार का टैक्नोलॉजी एवं डिजीटल विभाग अश्लीलता के खिलाफ एक्स तक के ऊपर शिकंजा कस चुका है परन्तु फिर भी रील के माध्यम से भारत को टारगेट भी किया जा रहा है। इसके लिए भी कुछ करना जरूरी है।
रील्स के माध्यम से अक्सर लोगों का मजाक उड़ाया जाता है या उनकी जानकारी के बिना उनके वीडियो बनाकर उन्हें वायरल कर दिया जाता है। यह प्राइवेसी का गंभीर उल्लंघन है। रील्स अपने आप में बुरी नहीं हैं लेकिन इनका अति उपयोग और दुरुपयोग विनाशकारी है। हमारा मानना है कि मोबाइल में रील्स के लिए एक समय सीमा तय करना जरूरी है। रील्स का उपयोग केवल नाचने-गाने के लिए नहीं, बल्कि शिक्षा और जागरूकता फैलाने के लिए करें। आपत्तिजनक रील्स को डिलीट करना और उन्हें उस प्लेटफार्म से हटाना भी बहुत जरूरी है। तकनीक हमेशा इंसान की प्रगति के लिए होती है, न कि उसे गुलाम बनाने के लिए। रील्स का सदुपयोग जहां आपकी कला को दुनिया के सामने ला सकता है, वहीं इसका दुरुपयोग समाज को खोखला कर सकता है। महाज 15 या 20 सैकेंड की चमक-धमक और झूठे कटैंट साम्प्रदायिक टकराव पैदा कर चुके हैं। मीडिया के बाद विशेष रूप से रील्स रैगुलेटरी लानी ही होगी। जाति के नाम पर रीलें वायरल करना आसान है लेकिन जब इनकी वजह से बवाल मचता है और दंगे होते हैं तो जिन घरों के चिराग बुझते हैं उनकी पीड़ा को कोई मुआवजा खत्म नहीं कर सकता इसलिए मानवता की रक्षा करने और नई पीढ़ी की मानसिक सोच बचाने के लिए रैगुलेटरी लाना जरूरी है।
खतरनाक हैं रील्स : कंट्रोल जरूरी…
Summary :
आज की तारीख में सोशल मीडिया भारत के लिए एक बुरी खबर ला रहा है। नैतिकता और संस्कार खत्म हो रह हैं। हमारा युवा वर्ग किधर जा रहा है, इसे फोकस में रख कर कुछ करने का वक्त आ गया है। सोशल मीडिया के इस आधुनिक युग में ‘रील्स’ मनोरंजन का सबसे सशक्त माध्यम बनकर उभरी है। इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब शॉर्ट्स पर 15 से 60 सैकेंड के ये वीडियो आज हर उम्र के व्यक्ति की पहली पसंद बन चुके हैं लेकिन मनोरंजन के नाम पर शुरू हुआ यह सिलसिला अब धीरे-धीरे ‘रील्स के दुरुपयोग’ और एक गंभीर सामाजिक लत…



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