पंजीकरण प्रणाली मजबूत करने की दिशा में अहम कदम

Summary :

संसद के चालू मानसून सत्र में जन्म और मृत्यु पंजीकरण से जुड़े कानून में महत्वपूर्ण बदलाव किया गया है। राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद जन्म और मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक चर्चा का विषय बन गया है। देश की नागरिक पंजीकरण प्रणाली को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम है। देश में हर जन्म और मृत्यु का पंजीकरण कराना कानूनन अनिवार्य है। यह प्रक्रिया केवल एक सरकारी कागज नहीं, बल्कि किसी भी नागरिक की कानूनी पहचान और अधिकारों की पहली सीढ़ी है। नया कानून लागू होने के बाद जन्म प्रमाणपत्र आपके जीवन का सबसे जरूरी और इकलौता मुख्य…

संसद के चालू मानसून सत्र में जन्म और मृत्यु पंजीकरण से जुड़े कानून में महत्वपूर्ण बदलाव किया गया है। राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद जन्म और मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक चर्चा का विषय बन गया है। देश की नागरिक पंजीकरण प्रणाली को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम है। देश में हर जन्म और मृत्यु का पंजीकरण कराना कानूनन अनिवार्य है। यह प्रक्रिया केवल एक सरकारी कागज नहीं, बल्कि किसी भी नागरिक की कानूनी पहचान और अधिकारों की पहली सीढ़ी है। नया कानून लागू होने के बाद जन्म प्रमाणपत्र आपके जीवन का सबसे जरूरी और इकलौता मुख्य दस्तावेज बन जाएगा।

मोदी सरकार ने देशभर में 3.5 लाख से अधिक जन्म-मृत्यु पंजीकरण केंद्र स्थापित किए हैं। 2014 में मोदी सरकार के आने से पहले जन्म के पंजीकरण की दर 86.6 प्रतिशत थी जो आज बढ़कर 99.8 प्रतिशत हो गई है। इसी तरह मृत्यु पंजीकरण की दर 72.5 प्रतिशत से बढ़कर 99.4 प्रतिशत तक पहुंच गई है। हालिया संशोधन यह सुनिश्चित करता है कि जन्म व मृत्यु का पंजीकरण समय रहते कर लिया जाए। यह कानून देर से होने वाले पंजीकरण के लिए सख्त नियम लागू करता है। नये संशोधन के तहत, जन्म व मृत्यु के दो साल बाद रिपोर्ट किए गए मामलों में मौजूदा कार्यकारी मंजूरी की जगह अब प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश की जरूरत होगी।

निस्संदेह, फर्जी पंजीकरण को रोकने की दिशा में सरकार का उद्देश्य सराहनीय है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि देश में जन्म व मृत्यु से जुड़े आंकड़े प्रामाणिक हों और समय रहते दर्ज कर लिए जाएं। इससे जनसंख्या गणना, मतदाता की विश्वसनीयता और अंतत: विकास योजनाओं के लिए विश्वसनीय आंकड़े जुटा पाना संभव होता है। वहीं दूसरी ओर अवैध घुसपैठियों और विदेशी नागरिकों की पहचान भी संभव हो पाती है। जो कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी है।

संसद में विधेयक पेश करते समय सरकार ने कहा कि जन्म और मृत्यु प्रमाणपत्र आज नागरिकों की कानूनी पहचान, उत्तराधिकार, शिक्षा, सामाजिक कल्याण योजनाओं और अन्य सरकारी सेवाओं का आधार बन चुके हैं। ऐसे में वर्षों बाद होने वाले पंजीकरण के मामलों में फर्जी दस्तावेजों या गलत दावों की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
सरकार ने संसद में बताया है कि वक्त पर रजिस्ट्रेशन न कराने और सालों बाद फर्जी दस्तावेजों के जरिए पहचान पत्र बनवाने के मामलों को रोकने के लिए यह व्यवस्था लेकर आना पड़ा।

दरअसल कई मामलों में गलत नाम या उम्र दर्शाकर फर्जी जन्म प्रमाणपत्र बनवा लिए जाते थे, जिससे सरकार की कल्याणकारी योजनाओं और नागरिक पहचान में गड़बड़ी होती थी। डेथ रेट का सही रिकॉर्ड न होने से मतदाता सूची में नाम दर्ज होने से रह जाते थे, जिससे फर्जी मतदान की गुंजाइश बनती थी। देशभर में अभी लगभग 3.5 लाख रजिस्ट्रेशन यूनिट्स काम कर रही हैं। सरकार का उद्देश्य हर बच्चे और हर नागरिक का सही और पारदर्शी रिकॉर्ड रखना है।
सरकार का यह भी तर्क था कि दो वर्ष से अधिक पुराने मामलों की जांच किसी प्रशासनिक अधिकारी के बजाय न्यायिक अधिकारी द्वारा किए जाने से प्रक्रिया अधिक निष्पक्ष और विश्वसनीय होगी।

न्यायिक मजिस्ट्रेट साक्ष्यों, दस्तावेजों और शपथ-पत्रों की विधिक जांच कर उचित आदेश पारित कर सकेंगे। इससे रिकॉर्ड की प्रामाणिकता बढ़ेगी और भविष्य में उत्पन्न होने वाले कानूनी विवादों की संभावना कम होगी और यह जनता के लिए भी आसान होगा। निस्संदेह, आज देश ने सिविल रजिस्ट्रेशन यानी जन्म-मृत्यु पंजीकरण के मामलों में बहुत अच्छी प्रगति की है। आज देश में 99 फीसदी से अधिक जन्म और मृत्यु का रिकॉर्ड रखा जाता है। दरअसल, देश में बड़ी चुनौती सिर्फ रजिस्ट्रेशन की ही नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि जन्म व मृत्यु होने पर 21 दिन के भीतर सूचना दर्ज कर ली जाए।

इसलिए यह जरूरी हो जाता है कि प्रक्रियागत बाधाएं बढ़ाने की बजाय, समय पर रिपोर्टिंग करने को सहज व सरल बनाया जाए। लोगों को इस बारे में जागरूक करने की भी जरूरत है। साथ ही मौजूदा नियमों को सख्ती से लागू करने से अधिक नीतिगत मामलों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। यह संशोधन उन लोगों के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है, जिनके जन्म या मृत्यु का पंजीकरण कई वर्षों तक नहीं कराया गया। ग्रामीण क्षेत्रों, दूरदराज के इलाकों और पुराने रिकॉर्ड वाले मामलों में अक्सर लंबे समय बाद पंजीकरण की आवश्यकता पड़ती है।

अस्पताल या स्थानीय निकाय जैसे नगर निगम या ग्राम पंचायतों में जन्म या मृत्यु की सूचना समय पर देना ही सबसे आसान तरीका है। लेकिन अगर अब आप सालों तक रजिस्ट्रेशन को टालते हैं तो भविष्य में बच्चों के स्कूल एडमिशन, पासपोर्ट, आधार कार्ड या संपत्ति के उत्तराधिकार जैसे कामों के लिए कागजात बनवाने के लिए आपको लंबी न्यायिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है। कानूनी और संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि प्रस्तावित संशोधन हर नागरिक का पंजीकरण सुनिश्चित करने और व्यवस्था के दुरुपयोग को रोकने के बीच संतुलन बनाने का सरकार का एक प्रयास है।

विशेषज्ञों के अनुसार दो वर्ष से अधिक की देरी से होने वाले पंजीकरण के लिए प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट की मंजूरी अनिवार्य करने से उन मामलों में उच्च स्तर की न्यायिक जांच सुनिश्चित होगी, जहां फर्जी दावों की संभावना अधिक होती है। वहीं दूसरी ओर, वास्तविक आवेदकों को पंजीकरण से वंचित नहीं किया जा रहा है, उन्हें केवल जन्म या मृत्यु की प्रामाणिकता के बारे में अदालत को संतुष्ट करना होगा।

यह जरूरी है कि लोग समय पर जन्म व मृत्यु की सूचना का पंजीकरण कराएं, लेकिन इसे दर्ज करने की प्रक्रिया सहज-सरल होनी चाहिए। जिसके लिए लोगों को जागरूक करने की भी जरूरत है। साथ ही जरूरी वजहों से हुई देरी पर सख्ती करने के बजाय सुधारात्मक प्रयासों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यदि इसे प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, तो यह संशोधन नागरिकों को निर्धारित समय के भीतर जानकारी देने के लिए प्रेरित करेगा और नागरिक पंजीकरण रिकॉर्ड की सत्यता व विश्वसनीयता में सुधार लाएगा।

Team Desk