ईरान में भारतीयों की सुरक्षा

Summary :

1947 तक भारत के पड़ोसी देश ईरान का इतिहास काफी उथल-पुथल रहा है विशेष कर ​िद्वतीय विश्व युद्ध के बाद की 20वीं सदी मंे। भारत के साथ इस देश के गहरे सांस्कृतिक एेतिहासिक सम्बन्ध रहे हैं जिसके प्रमाण में इतना ही काफी है कि इसके पूर्व शहंशाह रजा पहलवी की पदवी ‘आर्य मिहिर’ अर्थात आर्यों का सूरज हुआ करती थी। 1954 तक यह देश पूरी तरह लोकतान्त्रिक देश था और इसके लोगों द्वारा चुनावों में चुने गये तत्कालीन प्रधानमन्त्री स्व. मोहम्मद मुसद्दिक अपने देश के आधुनिकीकरण के लिए प्रतिबद्ध थे परन्तु तब उन्होंने ईरान के राष्ट्रीय हितों का ध्यान रखते…

1947 तक भारत के पड़ोसी देश ईरान का इतिहास काफी उथल-पुथल रहा है विशेष कर ​िद्वतीय विश्व युद्ध के बाद की 20वीं सदी मंे। भारत के साथ इस देश के गहरे सांस्कृतिक एेतिहासिक सम्बन्ध रहे हैं जिसके प्रमाण में इतना ही काफी है कि इसके पूर्व शहंशाह रजा पहलवी की पदवी ‘आर्य मिहिर’ अर्थात आर्यों का सूरज हुआ करती थी। 1954 तक यह देश पूरी तरह लोकतान्त्रिक देश था और इसके लोगों द्वारा चुनावों में चुने गये तत्कालीन प्रधानमन्त्री स्व. मोहम्मद मुसद्दिक अपने देश के आधुनिकीकरण के लिए प्रतिबद्ध थे परन्तु तब उन्होंने ईरान के राष्ट्रीय हितों का ध्यान रखते हुए वहां की तेल कम्पनियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था जिसके चलते यूरोपीय देशों विशेषकर ब्रिटेन व अमेरिका ने वहां सत्ता बदल को बढ़ावा दिया और शहंशाह रजा पहलवी को गद्दीनशीन कर दिया। शहंशाह का शासन 1979 तक चलता रहा मगर इस वर्ष ईरान में इस्लामी क्रन्ति हुई और धार्मिक नेता आयतुल्लाह खुमेनी के नेतृत्व मे वहां पुनः सत्ता पलट हुआ। इसमें भी यूरोपीय देशों व अमेरिका के हित बन्धे हुए थे परन्तु 21वीं सदी के शुरू होने के बाद इसमें भी परिवर्तन आना शुरू हुआ और अमेरिकी व यूरोपीय देशों को अपने हित खतरे में लगने लगे। इसकी मूल वजह रही कि ईरान अपने बूते पर परमाणु शक्ति बनने की कोशिश करने लगा और अपनी सामरिक ताकत में वृद्धि करने लगा जिससे पश्चिम एशिया का शक्ति सन्तुलन अमेरिका विरोधी धड़े के पक्ष में जा सकता था। ईरान को अपने विकास में 21 वीं सदी में रूस व चीन का साथ मिला जिससे पश्चिमी व अमेरिकी शक्तियों का चिन्तित होना स्वाभाविक था लेकिन अब 2026 चल रहा है और ईरान में 1979 से स्थापित मजहबी शिया इस्लामी शासन के विरुद्ध लोगों में विद्रोह की भावना जागृत हो रही है। इसका मूल कारण यह है कि इस्लामी निजाम के चलते लोगों के मूल मानवीय अधिकारों को कुचला गया विशेष कर महिलाओं को ईरान में दोयम दर्जे की नागरिक बना कर रखा गया। अतः हम आज के वातावरण में पूरे ईरान में जन विद्रोह को देख रहे हैं। हालात इतने खराब हो गये हैं कि अभी तक इस्लामी सत्ता विरोधी प्रदर्शनों में ढाई हजार से अधिक नागरिकों की जान पुलिस बलों द्वारा ले ली गई है। वर्तमान इस्लामी खामेनेई प्रशासन इस जन विद्रोह को अपनी दमनकारी नीतियों से कुचलना चाहता है जिसका विरोध पश्चिमी देश व अमेरिका कर रहे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने तो साफ कह दिया है कि यदि ईरान ने अपने नागरिकों पर इसी तरह जुल्म ढहाना जारी रखा तो उनका देश ईरान में सैनिक कार्रवाई तक कर सकता है। अमेरिका पूरी दुनिया में मानवीय अधिकारों का अलम्बरदार माना जाता है हालांकि श्री ट्रम्प की इस बारे में सोच व नीति बहुत चुनीन्दा समझी जाती है। हाल ही में उन्होंने जिस तरह दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला में वहां के राष्ट्रपति को सपत्नीक अपहृत करके वहां सत्ता बदल किया है उससे पूरी दुनिया सहमी हुई है मगर ईरान के बारे में कहा जा रहा है कि वहां अमेरिका इस तरह की हिमाकत नहीं कर सकता क्योंकि ईरान की सामरिक ताकत बहुत ज्यादा है, खास कर उसके पास अत्याधुनिक मिजाइलों का जखीरा है जो पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य अड्डों को तहस-नहस कर सकता है। पूरे विश्व ने पिछले वर्ष जून महीने में देखा था कि अमेरिका व इजराइल ने मिलकर किस तरह ईरान पर हमला किया था लेकिन यह युद्ध केवल 12 दिन ही चल सका और अमेरिका को युद्ध विराम के लिए सहमत होना पड़ा मगर आज के हालात बदले हुए हैं और ईरान के लोग ही अपनी सरकार का विरोध कर रहे हैं तथा सत्ता बदल चाहते हैं जिसे खामेनेई प्रशासन लोगों पर जुल्म ढहा कर समाप्त करना चाहता है। इससे ईरान की स्थिति विस्फोटक होती जा रही है क्योंकि श्री ट्रम्प आह्वान कर रहे हैं कि ईरान के लोग अपने हकों के लिए प्रदर्शन जारी रखे उनकी मदद के लिए अमेरिका शीघ्र ही आयेगा। ट्रम्प ने यह भी चेतावनी दे रखी है कि यदि प्रदर्शनकारी नागरिकों को ईरान अपनी अदालती कार्रवाइयों के जरिये फांसी पर चढ़ायेगा तो उसे इसका परिणाम भुगतना होगा। पश्चिम एशिया में अमेरिका का सबसे बड़ा सहयोगी देश इजराइल है जिसके पास अद्यतन टैक्नोलॉजी के अस्त्र-शस्त्र हैं और जिसे पिछले समय में अरब देशों को युद्ध में हराने का अनुभव भी प्राप्त है लेकिन दूसरी तरफ ईरान प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कड़े कदम उठाने से बाज नहीं आ रहा है और इसकी न्यायिक प्रणाली के प्रमुख ने कह दिया है कि बागियों के खिलाफ जल्द से जल्द मुकदमे चलाकर उन्हें माकूल सजा दी जानी चाहिए। इसके चलते ईरान के हालात राजनैतिक व रणनीतिक रूप से बहुत ही अस्थिर व असमंजस भरे होते जा रहे हैं अतः भारत की मोदी सरकार ने ईरान में रह रहे भारत वासियों से कह दिया है कि वे जल्दी से जल्दी ईरान से बाहर आने की कोशिश करें और प्रदर्शन स्थलों से दूर रहें। इस सन्दर्भ मे‘ ईरान की राजधानी तेहरान में स्थित भारतीय दूतावास सभी भारतीयों की पूरी मदद करेगा। भारत की सरकार ने पिछले वर्ष 2025 के जून महीने में भी एेसा ही किया था और ईरान में रह रहे चार हजार से अधिक व इजराइल में रहने वाले सैकड़ों भारतीय नागरिकों को वहां से विशेष विमानों के जरिये निकाला था। ईरान में भारत के विद्यार्थी से लेकर धार्मिक यात्री व व्यापारी तक जाते हैं जिनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी उनके मूल देश की ही होती है अतः भारत की सरकार ने भविष्य की आशंकाओं को भांपते हुए पहले से ही चेतावनी जारी कर दी है। इसका असली कारण यह माना जा रहा है कि ईरान की मौजूदा सरकार प्रदर्शनकारियों पर गोली तक चलाने से बाज नहीं आ रही है और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प कह रहे हैं कि एेसी कार्रवाई को उनका देश किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं करेगा जिसके चलते ईरान व अमेरिका में सैनिक संघर्ष कभी भी भड़क सकता है। एेसी परिस्थियों से बचाने के लिए ही मोदी सरकार अपने नागरिकों की रक्षा हेतु यह कदम उठा रही है।

Aditya Chopra

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