आखिर गिग वर्कर्स के मन की बात सुनी गई

Summary :

दुनिया में पहले कार्यसंस्कृति कुछ अलग थी। अब उसमें समय के साथ बदलाव आ रहे हैं। कोविड-19 महामारी में वर्कफ्रॉम होम जैसे प्रयोग जमकर हुए, उनसे भी काफी कुछ निकला। हाल में एक शब्द सुर्खियों में है गिग वर्कर या गिग कर्मचारी, यह वैश्विक मंच पर नहीं बल्कि भारत में ही खूब चर्चा में हैं। फूड और ग्रॉसरी डिलीवरी ऐप कंपनियों द्वारा 10 मिनट में डिलीवरी देने का नियम सरकार ने अब हटा दिया गया है जिससे गिग वर्करों को बड़ी राहत मिली है। लंबे समय से इस नियम से परेशान गिग वर्करों को अब जान जोखिम में डालकर तेज़…

दुनिया में पहले कार्यसंस्कृति कुछ अलग थी। अब उसमें समय के साथ बदलाव आ रहे हैं। कोविड-19 महामारी में वर्कफ्रॉम होम जैसे प्रयोग जमकर हुए, उनसे भी काफी कुछ निकला। हाल में एक शब्द सुर्खियों में है गिग वर्कर या गिग कर्मचारी, यह वैश्विक मंच पर नहीं बल्कि भारत में ही खूब चर्चा में हैं। फूड और ग्रॉसरी डिलीवरी ऐप कंपनियों द्वारा 10 मिनट में डिलीवरी देने का नियम सरकार ने अब हटा दिया गया है जिससे गिग वर्करों को बड़ी राहत मिली है। लंबे समय से इस नियम से परेशान गिग वर्करों को अब जान जोखिम में डालकर तेज़ गति से दोपहिया वाहन चलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इससे वेतन और इंसेंटिव कटने का डर भी खत्म हो गया है।
इस बदलाव के बाद गिग वर्करों ने खुशी जताई है। उनका कहना है कि 10 मिनट में डिलीवरी की समय सीमा से दबाव बनता था और कई बार वे दुर्घटनाओं का शिकार हो जाते थे। अब वे आराम से अपने काम को पूरा कर सकेंगे और सुरक्षित रहेंगे। वहीं, 31 दिसंबर 2025 को गिग वर्करों ने अपनी विभिन्न मांगों के साथ हड़ताल की थी, जिसमें 10 मिनट में डिलीवरी की समय सीमा को समाप्त करने की प्रमुख मांग थी। इसके अलावा वेतन और इंसेंटिव बढ़ाने की भी मांग की गई थी। गिग वर्करों का कहना है कि इस फैसले से उनकी जिंदगी की सुरक्षा बढ़ेगी और उनके काम की गुणवत्ता भी बेहतर होगी। गिग वर्कर वह व्यक्ति होता है जो प्रोजेक्ट के आधार पर या फ्रीलांस काम करता है। वे आमतौर पर स्व-रोजगार प्राप्त होते हैं और स्वतंत्र रूप से काम करते हैं, अक्सर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से जो उन्हें ग्राहकों से जोड़ते हैं। गिग वर्कर्स को कभी-कभी “स्वतंत्र ठेकेदार” या “फ्रीलांसर” भी कहा जाता है। वे अस्थायी कर्मचारियों से इस मायने में भिन्न होते हैं कि उन्हें किसी निश्चित अवधि के लिए काम पर नहीं रखा जाता है और वे उन कंपनियों के कर्मचारी नहीं होते जिनके लिए वे काम करते हैं। जैसे-जैसे अधिक से अधिक व्यवसाय ऑन-डिमांड, “गिग” मॉडल की ओर बढ़ रहे हैं, गिग वर्कर्स की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इस प्रकार की कार्य व्यवस्था अक्सर परिवहन, खाद्य वितरण और घरेलू सेवाओं जैसे उद्योगों में देखी जाती है।
गिग वर्कर कई मायनों में पारंपरिक कर्मचारियों से भिन्न होते हैं। सबसे पहले, गिग वर्कर पारंपरिक रोजगार समझौतों से बंधे नहीं होते हैं। इसका मतलब है कि वे एक ही समय में कई नियोक्ताओं के लिए काम कर सकते हैं और केवल एक कंपनी तक सीमित नहीं रहते हैं। इसके अलावा, गिग वर्कर आमतौर पर प्रोजेक्ट के आधार पर काम करते हैं, यानी उन्हें नियमित वेतन के बजाय प्रत्येक प्रोजेक्ट पूरा करने पर भुगतान किया जाता है। यह व्यवस्था गिग वर्करों को काम करने के समय और स्थान के मामले में काफी लचीलापन प्रदान करती है। गिग वर्कर्स और पारंपरिक कर्मचारियों के बीच एक और महत्वपूर्ण अंतर यह है कि गिग वर्कर्स को कर्मचारियों के समान लाभ नहीं मिलते हैं। इनमें स्वास्थ्य बीमा, सवैतनिक अवकाश और सेवानिवृत्ति बचत योजनाएं शामिल हैं। गिग वर्कर्स को कर्मचारियों के समान सुरक्षा भी नहीं मिलती है, जैसे बेरोजगारी बीमा या श्रमिक मुआवजा। सबसे पहले गिग वर्क्स की समस्याओं का संज्ञान कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने लिया था। राहुल गांधी ने व्यक्तिगत रूप से कई वर्कर्स से बात की और उनके संघर्षों को समझा।
आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा ने भी इस बदलाव का समर्थन करते हुए कहा कि जब डिलीवरी पार्टनर की वर्दी या बैग पर ’10 मिनट’ लिखा होता है और ग्राहक की स्क्रीन पर टाइमर चलता है तो यह राइडर्स पर वास्तविक और खतरनाक मानसिक तनाव पैदा करता है। उनके अनुसार, सरकार के इस हस्तक्षेप से गिग वर्कर्स की सुरक्षा और गरिमा में सुधार होगा। क्विक कॉमर्स कंपनियों द्वारा ’10-मिनट’ के दावे को वापस लेना इस क्षेत्र में ‘गति बनाम सुरक्षा’ के बीच संतुलन साधने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। राघव चड्ढा के अनुसार यह फैसला न सिर्फ राइडर्स बल्कि सड़कों पर चलने वाले हर व्यक्ति की सुरक्षा के ​िलए जरूरी था। हालांकि कंपनियां अब भी तेज डिलीवरी का प्रयास करेंगी लेकिन आधिकारिक ब्रांडिंग से इस समय-सीमा को हटाना श्रमिकों के कल्याण की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। अब सरकार ने गिग वर्कर्स के लिए सोशल सिक्योरिटी के नए नियमों का ड्राफ्ट जारी किया है। इन नियमों पर सार्वजनिक सुझाव मंगाए गए हैं। सरकार की तरफ से तैयार किये गए ड्रॉफ्ट के अनुसार यदि कोई गिग वर्कर किसी एक ऐप या कंपनी (एग्रीगेटर) के साथ एक फाइनेंशियल ईयर में कम से कम 90 दिन काम करता है तो उसे सोशल सिक्योरिटी के फायदे मिल सकेंगे। इन फोयदों में हेल्थ इंश्योरेंस, लाइफ इंश्योरेंस और एक्सीडेंट कवर जैसी सुविधाएं शामिल की गई हैं। ड्रॉफ्ट के तहत यदि कोई वर्कर कई ऐप्स (जैसे जोमैटो + स्विगी + उबर) पर काम करता है तो कुल 120 दिन काम करना होगा। दिनों की गिनती हर प्लेटफॉर्म से अलग-अलग जोड़ी जाएगी। उदाहरण के तौर पर यदि एक ही दिन तीन अलग-अलग ऐप्स पर काम किया तो वो तीन दिन माने जाएंगे। काम की गिनती को उस दिन से शुरू किया जाएगा, जब वर्कर ने पहली बार उस प्लेटफॉर्म से पैसे कमाए, वो कमाई कितनी भी हो सकती है उसके लिए किसी तरह की लिमिट नहीं है। 16 साल से ज्यादा की उम्र वाले सभी गिग वर्कर्स को आधार से लिंक का रजिस्ट्रेशन कराना होगा। हर एग्रीगेटर को अपने वर्कर्स से जुड़ी डिटेल केंद्र के पोर्टल पर देनी होगी, इससे यूनिवर्सल अकाउंट नंबर बन सकेगा। रजिस्टर होने के बाद हर योग्य वर्कर को डिजिटल या फिजिकल आईडी कार्ड दिया जाएगा। देशभर में करोड़ों गिग वर्कर्स काम कर रहे हैं लेकिन इनमें से बड़ी आबादी को न ही सोशल सिक्योरिटी प्राप्त है और न ही उन्हें कंपनियों की ओर से सही भुगतान किया जा रहा है।
नीति आयोग की 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2020 में भारत में लगभग 77 लाख गिग वर्कर्स थे, जिनकी संख्या 2030 तक बढ़कर 2.35 करोड़ होने का अनुमान है। गिग अर्थव्यवस्था में युवाओं (16 से 23 वर्ष आयु वर्ग) की भागीदारी 2019 से 2022 के बीच आठ गुना बढ़ी है। मौजूदा उपभोक्तावादी दौर में समयबद्ध सेवाओं की मांग बढ़ रही है और दुनिया भर की कंपनियों में होड़ मची है कि वे बेहतर से बेहतर सेवाएं मुहैया कराकर उपभोक्ताओं को अपने साथ जोड़ें और मुनाफा कमाएं। स्थापित तथ्य है कि बाजारवादी व्यवस्था में प्रतिस्पर्द्धा का बड़ा लाभार्थी उपभोक्ता वर्ग है, मगर दुर्भाग्य से सुविधाएं उठाते हुए लोग, खासकर भारत जैसे विकासशील देशों में यह अक्सर भूल जाते हैं कि जो कामगार उन्हें त्वरित सेवाएं मुहैया करा रहा है वह भी इसी समाज का हिस्सा है। ऐसी अनेक खबरें प्रकाशित हो चुकी हैं, जब धर्म, जाति और नस्ल के कारण किसी डिलिवरी पार्टनर को उपभोक्ता की बदसलूकी का शिकार होना पड़ा। सार्वजनिक क्षेत्र में नौकरियों की संख्या सीमित है और काम मांगने वाले हाथ दिनोंदिन बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे में बहुत जरूरी है कि सरकार असंगठित क्षेत्र की सुध लें, क्योंकि ये क्षेत्र देश में सर्वाधिक रोजगार मुहैया कराते हैं। गिग इकॉनामी में लचीलापन और गति महत्वपूर्ण है लेकिन भारत सरकार को अब कामगारों के कल्याण आैर सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए गति और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने के ​िलए और कड़े कदम उठाने होंगे, ताकि गिग वर्कर एक समावेशी और सुरक्षित कार्यबल बन सके।

Aakash Chopra