नौकरी डॉट कॉम कहिए, जीवनसाथी डॉट कॉम या पॉलिसीबाजार का िजक्र कीजिए, लगभग हर कोई तुरंत समझ जाता है कि बात किसकी हो रही है लेकिन जैसे ही संजीव बिखचंदानी का नाम लिया जाता है, बहुत से लोग थोड़े ठिठक जाते हैं। कौन हैं वे? नाम जाना-पहचाना लगता है, पर पूरी तरह स्पष्ट नहीं। वे किस लिए जाने जाते हैं? ये सवाल स्वाभाविक हैं, क्योंकि आज के दौर में ब्रांड अपने निर्माताओं से कहीं बड़े हो चुके हैं।
यह स्थिति अपने आप में खुशी और गर्व दोनों का विषय है। ठीक वैसे ही जैसे किसी माता-पिता के लिए यह संतोष की बात होती है कि उनका बच्चा इस तरह आगे बढ़े कि लोग उसे माता-पिता की पहचान से नहीं, बल्कि माता-पिता को उसकी पहचान से जानें। संजीव बिखचंदानी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है, आज वे अपने ब्रांड्स के माध्यम से अधिक पहचाने जाते हैं, न कि उनके ब्रांड्स उनके नाम से। हालांकि कॉरपोरेट, बिजनेस और डॉट-कॉम की दुनिया से जुड़े लोगों के लिए संजीव बिखचंदानी कोई अनजान नाम नहीं, बल्कि एक जाना-पहचाना व्यक्तित्व हैं।
डॉट-कॉम की दुनिया में क्रांति लाने वाले संजीव बिखचंदानी को आज भले ही ‘स्टार्ट-अप्स के जनक’ के रूप में जाना जाता हो लेकिन एक समय ऐसा भी था जब इस शब्द से, कम से कम दुनिया के इस हिस्से में, बहुत कम लोग परिचित थे। दिलचस्प यह है कि अपने शुरूआती दौर में बिखचंदानी स्वयं ई-मेल जैसी अवधारणा से भी अनजान थे। भारत की राजधानी नई दिल्ली स्थित प्रगति मैदान में आयोजित एक प्रदर्शनी के दौरान उन्होंने एक स्टॉल संचालक से पूछा था-“ई-मेल क्या होता है?”
साल 1996 में बिखचंदानी ने पहली बार इंटरनेट को देखा। वे बताते हैं, “एक प्रदर्शनी में मैंने ‘www’ लिखा हुआ एक छोटा सा स्टॉल देखा। मैंने स्टॉल वाले से पूछा कि यह क्या है, तो उसने कहा- ई-मेल।” जब उसने विस्तार से समझाया तो बिखचंदानी की पहली प्रतिक्रिया थी, “यह तो फेल हो जाएगा।” उनका तर्क सीधा था, जब बहुत कम लोगों के पास ई-मेल है तो मेल भेजेंगे किसे? “यह ऐसा है जैसे दुनिया में सिर्फ एक ही टेलीफोन हो तो बात किससे करेंगे?” लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। स्टॉल संचालक ने उन्हें दोबारा बुलाकर कहा “इंटरनेट भी है।” बिखचंदानी बताते हैं कि उन्होंने इंटरनेट का नाम पहली बार वहीं सुना। जब उस व्यक्ति ने समझाया कि इंटरनेट के ज़रिये आप अपने घर या दफ्तर से लॉग-इन कर दुनिया भर की हजारों कंपनियों में संग्रहित जानकारियों तक पहुंच सकते हैं तो बात कुछ और ही हो गई। उसने याहू खोलकर पूछा “क्या सर्च करना है?” बिखचंदानी ने कहा- “इंडिया।” क्लिक करते ही ढेरों वेबपेज सामने आ गए।
यहीं बिखचंदानी को वह विचार सूझा जिसने आगे चलकर इतिहास रच दिया। वे कहते हैं, “तभी मुझे लगा कि क्यों न देश भर के अखबारों से नौकरियों के विज्ञापन लेकर उन्हें इंटरनेट पर डाल दिया जाए और देखा जाए कि क्या होता है।” इसके बाद, जैसा कि कहा जाता है, इतिहास बनता चला गया। इस विचार की पृष्ठभूमि कहीं और भी तैयार हो रही थी। बिखचंदानी को याद है कि उनके दफ्तर में युवा कर्मचारी एक मैगजीन को हमेशा पीछे के पन्नों से पढ़ते थे। वे समाचार पन्नों को छोड़ सीधे विज्ञापनों पर जाते थे। “तब बिजनेस इंडिया के पिछले पन्नों में 30-40 पेज सिर्फ नियुक्ति विज्ञापनों के होते थे। लोग लेख पढ़ें या न पढ़ें, विज्ञापन जरूर देखते थे। उसी वक्त पहली बात साफ हुई, नौकरियां हमेशा उच्च रुचि की श्रेणी में आती हैं।”
दूसरा अहम तथ्य उन्हें तब समझ आया जब उन्होंने देखा कि हर हफ्ते दो-तीन हेडहंटर उनके सहकर्मियों को लैंडलाइन पर कॉल करते थे। मोबाइल फोन का दौर नहीं था और ये नौकरियां अक्सर अखबारों में छपती भी नहीं थीं। “तभी मुझे एहसास हुआ कि जो कुछ प्रिंट में दिखता है, वह तो हिमखंड का सिरा भर है। असली बाजार कहीं बड़ा है, सैकड़ों कंपनियों और उच्च रुचि वाली नौकरियों का।”
हालांकि उस समय उन्हें यह नहीं पता था कि इन समझों के साथ आगे क्या करना है। वे स्वीकार करते हैं कि इसके बाद सात साल तक वे बस भटकते रहे लेकिन विचार मन में बना रहा। बीज बोया जा चुका था और जब यात्रा शुरू हुई तो फिर पीछे मुड़कर देखने का सवाल ही नहीं था। इसलिए उन्हें डॉट-कॉम कारोबार का ‘सचिन तेंदुलकर’ कहा जाना पूरी तरह तर्कसंगत माना जाता है।
हालांकि, अपनी सहज विनम्रता के कारण संजीव बिखचंदानी ऐसी उपमाओं को गंभीरता से लेने से इन्कार कर देते हैं। वे कहते हैं, “यह कुछ ज्यादा ही बढ़ा-चढ़ाकर कहा गया है। तारीफ है, इसमें संदेह नहीं, लेकिन अतिशयोक्ति भी है। युवा उद्यमियों के लिए मेरी उपलब्धता शायद इस पहचान का कारण बनी। इसका यह अर्थ नहीं कि मैं इसका पात्र हूं। हर स्टार्ट-अप का अपना एक ‘पिता’ होता है।”
स्टार्ट-अप संस्कृति में क्रांतिकारी भूमिका निभाने की बात को भी वे सादगी से खारिज करते हैं, “तब हम इसे स्टार्ट-अप नहीं कहते थे, हम इसे उद्यमिता कहते थे।” बचपन में वे यह तय नहीं कर पाए थे कि उन्हें क्या बनना है लेकिन इस बात को लेकर वे पूरी तरह स्पष्ट थे कि उन्हें क्या नहीं बनना है। स्कूल के दिनों में उन्होंने स्वयं से कहा था “मैं बिजनेस करूंगा, नौकरी नहीं करूंगा।” यही उनका सबसे मजबूत संकल्प था। इसके अलावा कुछ क्षणिक सपने भी थे “मैं क्रिकेटर बनूंगा” या “मैं राजेश खन्ना बनूंगा।” राजेश खन्ना बनने की चाह लोकप्रिय फिल्म हाथी मेरे साथी से प्रेरित थी। विडंबना यह रही कि अपने इस निश्चय के बावजूद उन्होंने नौकरी भी की एक ऐसा बोझ, जिसे वे वर्षों तक ढोते रहे, जब तक कि उन्होंने अपने दम पर कुछ सार्थक और बड़ा खड़ा नहीं कर लिया। उस दौर का जीवन उन्हें भीतर से खोखला लगता था। वे कहते हैं, “छोटे केबिन से बड़े केबिन में जाना, पड़ोसी से कुछ इंच लंबी कार रखना या उससे बड़ा घर होना इन सबका मेरे लिए कोई अर्थ नहीं था। मैं खुद से पूछता था कि सेवानिवृत्ति के बाद मेरे पास ऐसा क्या होगा, जिसे मैं अपनी उपलब्धि कह सकूं?” यही प्रश्न उन्हें लगातार मथता रहा और अंततः यही प्रश्न उनके जीवन की दिशा और नियति बदलने वाला सिद्ध हुआ। आज संजीव बिखचंदानी भारतीय उद्यमिता जगत का एक ऐसा नाम हैं, जिसकी अनदेखी संभव नहीं। नौकरी डॉट कॉम, जीवनसाथी डॉट कॉम और 99एकर्स जैसे अग्रणी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की स्थापना करने वाले बिखचंदानी ने आगे चलकर जोमैटो जैसे उभरते स्टार्ट-अप्स में निवेश कर नई पीढ़ी के उद्यमियों को भी संबल दिया। भारतीय डिजिटल अर्थव्यवस्था के निर्माण में उनका योगदान अब एक संदर्भ बिंदु बन चुका है।
धन कमाने के जुनून से दूर रहने वाले बिखचंदानी ने वह मुकाम हासिल किया जिसकी कल्पना बहुत कम लोग कर पाते हैं। फोर्ब्स की भारत के अमीरों की सूची में स्थान बनाते हुए वे देश के 100 सबसे धनी उद्योगपतियों में शामिल हुए। एक बार जब सफलता ने दस्तक दी तो उसका सिलसिला थमा नहीं लेकिन यह सफलता संघर्षों से रहित नहीं थी बल्कि इसके पीछे लंबे और कठिन दिनों की कहानी छिपी है।
नौकर क्वार्टर से जीवन की शुरूआत करने वाले बिखचंदानी को तंज भी झेलने पड़े “यह आदमी अपनी पत्नी की कमाई पर पलता है।” यह कटु सत्य था जिससे वे उस दौर में बच नहीं सकते थे। लंबे समय तक उनकी पत्नी ने ही परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी संभाली। एक साक्षात्कार में उन्होंने स्वीकार किया था, “घर की रसोई पत्नी के पैसों से चलती थी।” एक बहुराष्ट्रीय कंपनी की सुरक्षित नौकरी छोड़ते समय उनके पास कोई विकल्प नहीं था, सिवाय इस विश्वास के कि यही आखिरी मौका है। उनके पिता एक सरकारी कर्मचारी, वास्तव में डॉक्टर थे लेकिन वह रास्ता उन्होंने कभी अपने लिए नहीं चुना। वे कहते हैं, “मेरा परिवेश मध्यमवर्गीय था, सेवा वर्ग का। परिवार में व्यवसाय की कोई परंपरा नहीं थी। कुछ बच्चे वही करते हैं जो उनके माता-पिता करते हैं और कुछ उससे ठीक उलटा, मैं दूसरी श्रेणी में था।”
यही ‘उलटा रास्ता’ उन्हें अपने माता-पिता से अलग पहचान गढ़ने की ओर ले गया। वे स्पष्ट थे कि वे न तो डॉक्टर बनेंगे और न ही सरकारी नौकरी करेंगे। “मुझे यह तो मालूम था कि मैं क्या नहीं करना चाहता, लेकिन यह तय नहीं था कि मैं क्या करूंगा,” वे कहते हैं। स्वभाव से स्वप्नदर्शी बिखचंदानी एक सपने से दूसरे सपने की ओर बढ़ते रहे और अंततः उन्होंने अपना रास्ता खुद बनाने का निश्चय किया। उनका सपना किसी फिल्मी सितारे या क्रिकेटर बनने का नहीं था बल्कि व्यवसाय करने का था।
मैं राजेश खन्ना बनूंगा
Summary :
नौकरी डॉट कॉम कहिए, जीवनसाथी डॉट कॉम या पॉलिसीबाजार का िजक्र कीजिए, लगभग हर कोई तुरंत समझ जाता है कि बात किसकी हो रही है लेकिन जैसे ही संजीव बिखचंदानी का नाम लिया जाता है, बहुत से लोग थोड़े ठिठक जाते हैं। कौन हैं वे? नाम जाना-पहचाना लगता है, पर पूरी तरह स्पष्ट नहीं। वे किस लिए जाने जाते हैं? ये सवाल स्वाभाविक हैं, क्योंकि आज के दौर में ब्रांड अपने निर्माताओं से कहीं बड़े हो चुके हैं। यह स्थिति अपने आप में खुशी और गर्व दोनों का विषय है। ठीक वैसे ही जैसे किसी माता-पिता के लिए यह संतोष…


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