भारत में बच्चों का बढ़ता स्क्रीन टाइम एक गंभीर चिंता का विषय है। अक्सर हमने अपने आसपास और घरों में देखा है कि बच्चे अब बाहर खेलने के बजाय अपना अधिकतर समय मोबाइल के इस्तेमाल में लगा रहे हैं। पढ़ाई से लेकर खेल और दोस्ती तक, सब कुछ स्क्रीन के जरिए होने लगा है। आमतौर पर शहरों में रहने वाले बच्चों में मोबाइल का इस्तेमाल ज्यादा देखा गया है जिससे उनके पेरेंट्स की चिंता बढ़ गई है। कई माता-पिता का मानना है कि बच्चों द्वारा मोबाइल का बढ़ता इस्तेमाल उनके व्यवहार में भी बदलाव ला रहा है। बच्चों के माता-पिता का कहना है कि उनके बच्चे मोबाइल और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर ज्यादा से ज्यादा समय बिता रहे हैं। बच्चे बड़ी मात्रा में सोशल मीडिया, गेमिंग और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल कर रहे हैं जो एक चिंता का विषय है। कोरोना काल में ऑनलाइन पढ़ाई ने बच्चों के हाथों में मोबाइल थमा दिया।
अब यह कहीं न कहीं बच्चों के भविष्य में रुकावट बन रहा है। बच्चे अब पढ़ाई और खेल मैदान से दूर होते जा रहे हैं। समय-समय पर प्रबुद्ध लोगों ने मोबाइल फोन के बढ़ते प्रचलन पर चिंता जताई है। सोशल मीडिया और इंटरनेट की लत युवाओं को न केवल पढ़ाई से दूर कर रही है, बल्कि युवा वर्ग खेल के मैदान से भी दूर होता जा रहा है। अभिभावकों को इस विषय पर ध्यान देने की खासी जरूरत है। लाड-प्यार में बच्चों और युवाओं का भविष्य बर्बाद होने से बचाया जा सकता है। हाल ही में हुए एक सर्वे से चौंकाने वाली बात सामने आई है। भारत के लगभग 302 शहरी स्थानों या जिलों में बच्चों के बढ़ते स्क्रीन टाइम को लेकर किए गए इस सर्वे के मुताबिक, आधे से ज्यादा माता-पिता ने माना कि उनके बच्चे दिन में 3 घंटे से ज्यादा समय मोबाइल पर बिता रहे हैं। सर्वे के मुताबिक, लगभग 70 प्रतिशत माता-पिता का मानना है कि उनके बच्चे मोबाइल पर यूट्यूब, स्ट्रीमिंग वीडियो और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं ।
6-7 प्रतिशत माता-पिता ने सर्वे के दौरान यह भी स्वीकार किया कि मोबाइल और सोशल मीडिया के अधिक इस्तेमाल से बच्चों के व्यवहार में बदलाव आया है। उनके अनुसार बच्चे अब ज्यादा चिड़चिड़े, गुस्सैल और मानसिक रूप से परेशान नजर आ रहे है। स्क्रीन मासूमियत ही नहीं छीन रही – बेचैनी, ध्यान की कमी, नींद से जुड़ी समस्याएं, चिड़चिड़ापन भी दे रही है। स्क्रॉल से फोकस घट रहा है। यही वजह है कि हाल में ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के किशोर-बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन कर दिया। मद्रास हाईकोर्ट ने भी एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र को ऑस्ट्रेलिया जैसा कानून बनाने का सुझाव दिया है। भारत में दस साल से कम उम्र के बच्चों तक के सोशल मीडिया अकाउंट बने हुए हैं।
ऐसे दौर में जब बच्चे डिजिटल मीडिया को अंतिम सत्य मानने लगे हैं, उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा स्कूलों में अखबार पढ़ना अनिवार्य बनाना एक सुखद अहसास ही है। सुबह की प्रार्थना के दौरान दस मिनट तक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय खबरें व संपादकीय पढ़ना अनिवार्य किया गया है। बाकायदा रोज पांच कठिन शब्द अर्थ के साथ ब्लैकबोर्ड पर दर्ज होंगे। निश्चय ही इस प्रयास से जहां बच्चों में पढ़ने की संस्कृति, शब्द व सामान्य ज्ञान बढ़ेगा, वहीं उनके स्क्रीन टाइम में कमी आ सकेगी। निर्विवाद रूप से इससे धीरे-धीरे छात्रों की पढ़ने की प्रवृत्ति बढ़ेगी। बच्चे पढ़ने की संस्कृति से जुड़कर भावनात्मक, बौद्धिक व सामाजिक सरोकारों से समृद्ध होंगे। बहुत संभव है कि यदि इस अभियान को निरंतरता के साथ चलाया जाता रहा तो बच्चे पुस्तकालयों में रुचि लेने लगेंगे। विडंबना यह है कि आज बच्चों की उंगलियां पुस्तकों के पन्ने पलटने के बजाय मोबाइल के की-बोर्ड पर थिरकती रहती हैं।
स्कूलों को यह भी निर्देश दिए गए हैं कि वे विद्यार्थियों को मासिक या त्रैमासिक स्कूल समाचार पत्र अथवा पत्रिकाएं प्रकाशित करने के लिए प्रोत्साहित करें। कक्षा नौवीं से 12वीं तक के विद्यार्थियों के लिए संपादकीय लेखन या समूह चर्चा आयोजित की जाए । ‘क्रॉसवर्ड’ और ‘सुडोकू’ प्रतियोगिताएं कराई जाएं तथा कनिष्ठ कक्षाओं के विद्यार्थियों में अखबारों की कटिंग से ‘स्क्रैपबुक’ बनाने की गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाए। चिंताजनक स्थिति है कि भारत में पांच साल तक के बच्चे भी रोज दो घंटे से अधिक समय स्क्रीन पर बिताते हैं। अखबार केवल सूचनाएं नहीं पहुंचाते, समझ, संवेदनशीलता और सामाजिकता भी पैदा करते हैं।
इस तरह के आदेश की नौबत आना ही बताता है कि बच्चों में स्क्रीन की लत किस कदर गंभीर हो चुकी है। पढ़ने का मतलब केवल कोर्स की किताबें नहीं होतीं। डिजिटल दौर में सूचनाएं हर तरफ से आ रही हैं लेकिन उसमें कौन-सी सही हैं और कौन गलत,यह समझना चुनौती है। अखबार आज भी सबसे भरोसेमंद माध्यम हैं। इनको पढ़ने से बच्चों को विश्वसनीय जानकारी मिलेगी, विभिन्न घटनाओं को लेकर उनका अपना नजरिया बनेगा और भाषा में सुधार होगा। प्रायः ऐसे प्रयासों को यह कहकर खारिज किया जाता है कि ‘स्कूली बच्चों का खबरों की दुनिया से कोई लेना-देना नहीं होता, लिहाजा उन्हें सिर्फ पाठ्यपुस्तकें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।’ वास्तव में यह धारणा सही नहीं है। भले ही अखबारों में छपने वाली खबरों का स्कूली पढ़ाई और परीक्षाओं से ज्यादा संबंध न हो लेकिन उन्हें पढ़ने-सुनने से विद्यार्थियों के सोचने-समझने का नजरिया बदलता है।
चाहे उन्हें शुरुआत में कई खबरें समझ में न आएं। एक समय ऐसा आएगा, जब वे खबरों में रुचि लेने लगेंगे। उनकी समझ बढ़ेगी। आज स्कूलों में कई बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें फिल्मी सितारों के बारे में तो बहुत कुछ मालूम है। वे देश के प्रमुख पदों पर सेवारत लोगों के नाम नहीं जानते। ये बच्चे जब भविष्य में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं तो बहुत मुश्किलों का सामना करते हैं। इन्हें सामान्य ज्ञान और समसामयिक घटनाओं के बारे में कई किताबें पढ़नी पड़ती हैं। इसमें काफी समय लगता है। स्कूलों में अखबार पढ़ना अनिवार्य कर देने से इन बच्चों का भला हो जाएगा। कई लोग कहते हैं- ‘बच्चे स्कूलों में अखबार पढ़ेंगे तो बाकी पढ़ाई कब करेंगे? क्या इससे कक्षाओं के कालांश बाधित नहीं होंगे?’ ऐसी आशंकाएं निराधार हैं। प्रार्थना सभा में अखबार की बड़ी खबरें पढ़ने में 10 मिनट से ज्यादा समय नहीं लगेगा। अगर कोई ऐसी खबर है, जिससे सामान्य ज्ञान आदि का प्रश्न बनाया जा सकता है तो उसे स्कूल के नोटिस बोर्ड पर लिखा जा सकता है।
बाद में, बच्चे वहां से अपनी नोटबुक में लिख सकते हैं। अगर वे रोजाना अखबार पढ़ते तो उन्हें इस बात की जानकारी होती। पांच रुपए का अखबार और उसे पढ़ने के लिए दिया गया समय, ऐसा निवेश है जो भविष्य में आपके करोड़ों रुपए बचा सकता है। किशोर हों या बुजुर्ग, अखबार पढ़ने को अपनी दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा बनाए। संभव है कि देश के दूसरे प्रदेशों में भी राज्य सरकारों द्वारा यूपी सरकार के तर्ज पर तमाम स्कूलों में बच्चों को नवीनतम ज्ञान से अपडेट रखने के लिए अखबारों के पठन-पाठन के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएंगे। माता-पिता और अभिभावक घर पर बच्चों के साथ अखबार पढ़कर अपनी भागीदारी प्रदर्शित कर सकते हैं। जिन स्कूलों में माता-पिता और अभिभावक सक्रिय हैं, वे नियमित रूप से उनसे संवाद करते हैं और उन्हें सीखने की प्रक्रिया में शामिल करते हैं। यह सक्रिय भागीदारी बच्चों के साथ संबंध बनाती है और उन्हें मज़बूत करती है। इससे बच्चों की शिक्षा से जुड़े निर्णय लेते समय माता-पिता का आत्मविश्वास भी बढ़ता है। माता-पिता और स्कूल दोनों की भागीदारी से शिक्षकों, अभिभावकों और बच्चों के बीच बेहतर संवाद स्थापित होता है।


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