एसआईआर-एक लोक कर्त्तव्य

एसआईआर

मेरे जैसे व्यक्ति, जो अपने छात्र जीवन से एक दशक से अधिक समय तक के कामराज की अगुवाई में कांग्रेस पार्टी का सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ता रहा, की नजर में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर वर्तमान बहस अज्ञानतापूर्ण ही नहीं, बल्कि हास्यास्पद भी है।
निर्वाचन आयोग का एसआईआर मेरे राजनीतिक कार्यकर्ता वाले काल में पार्टी कार्यकर्ताओं की एक सामान्य चुनावी गतिविधि हुआ करती थी। मयलापुर विधानसभा क्षेत्र में जहां मैं 1960 के दशक से रहता हूं मेरे विधि शिक्षक जो मयलापुर के कांग्रेस नेता भी थे, के नेतृत्व में मैं एवं मेरे सहकर्मी चुनाव से छह महीने पहले हर घर व झोपड़ी में जाते थे और अपने पास मौजूद मतदाता सूची में मृत, दूसरी जगह चले जाने या दूसरी जगह से आने वाले और नए लोगों के नामों की जांच करते थे और पार्टी नेतृत्व के माध्यम से इस बारे में निर्वाचन आयोग को लिखित रूप से सूचित करते थे।

हम नए मतदाताओं के नाम जुड़वाने, मृत या विस्थापित मतदाताओं के नाम हटाने और मतदाता सूची को अद्यतन करने में मदद करते थे। हम कांग्रेस की एसआईआर टीम हुआ करते थे, जो भारत निर्वाचन आयोग की सहायता करती थी। डीएमके कार्यकर्ता एसआईआर के काम में कहीं अधिक कुशल थे क्योंकि वे अपेक्षाकृत अधिक प्रतिबद्ध और मेहनती थे। तब पार्टी के कैडर वहीं काम करते थे जो आज बूथ स्तर के अधिकारी करते हैं। राजनीतिक दल और निर्वाचन आयोग मिलकर मतदाता सूची तैयार करते थे। इस सूची की प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दलों की एसआईआर टीम द्वारा क्रॉस-चैकिंग की जाती थी। अब मैं मयलापुर की उन गलियों में जब घूमता हूं तो मुझे उन घरों की याद आती है जहां मैं उस समय जाया करता था। इन दिनों एसआईआर पर चल रही जोरदार बहस इस तथ्य को उजागर करती है कि उन दिनों की तुलना में मतदाताओं से कटे हुए आज के राजनीतिक दल इस बात से अनजान हैं कि कभी वे खुद एसआईआर को एक लोक कर्त्तव्य के रूप में अंजाम दिया करते थे।

ये चीजें आखिर बदल कैसे गईं? उन दिनों राजनीतिक दलों की एकमात्र पूंजी उनके कार्यकर्ता ही हुआ करते थे लेकिन 1969 में इंदिरा गांधी द्वारा कांग्रेस को तोड़ दिए जाने के बाद राजनीति में गलत पैसा आने लगा और बेशक उनकी पार्टी के लिए बेहिसाब तरीके से आने लगा। इसने राजनीतिक संस्कृति को पूरी तरह से बदल दिया। इंदिरा गांधी ने अमेरिकी राजदूत डैनियल पैट्रिक मोयनिहान से कहा था कि वह “चुनावों को इतना महंगा बना देंगी कि विपक्ष के लिए चुनाव लड़ना ही मुश्किल हो जाएगा” और उन्होंने ऐसा ही किया। जल्द ही, पैसा पहले कांग्रेस पार्टी मेंऔर बाद में अधिकांश पार्टियों में कैडर की जगह लेने लगा। तमिलनाडु में 1971 में इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने डीएमके के साथ गठबंधन किया और कामराज के नेतृत्व वाली कांग्रेस को हरा दिया। तब से सबसे मजबूत कैडर आधार वाली डीएमके में भी पैसा डर की जगह लेने लगा। आज बहुत ही कम पार्टियों के पास कैडर नाम की निधि बची है। पार्टियों ने यह सुनिश्चित किया था कि मतदाता सूची सिर्फ नामों की नहीं, बल्कि जीवित, वास्तविक एवं वैध मतदाताओं की सूची हो।

आज उनका मतदाताओं से उस दौर जैसा कोई जुड़ाव नहीं है। मैं यह बात इस तथ्य पर जोर देने के लिए कह रहा हूं कि एसआईआर एक बार की जांच वाली नहीं बल्कि एक निरंतर चलने वाली और सिर्फ भारत निर्वाचन आयोग द्वारा ही नहीं बल्कि सभी दलों द्वारा की जाने वाली गतिविधि है। यह सिर्फ निर्वाचन आयोग का कानूनी कर्त्तव्य नहीं बल्कि सभी राजनीतिक दलों का एक मान्यता प्राप्त लोक कर्त्तव्य है। निर्वाचन आयोग से मतदाताओं से वर्तमान एसआईआर मॉडल के तहत अपना सत्यापन और नामांकन कराने के लिए कहने के बारे में पूछने से पहले राजनीतिक दलों को अपने लोक कर्त्तव्य को नहीं निभाने पर आत्मचिंतन करना चाहिए। भारत निर्वाचन आयोग और देश के मतदाताओं के बीच एक मध्यस्थ संस्था के तौर पर कम करने वाले राजनीतिक दल अब लुप्त हो चुके हैं। एसआईआर जो तब एक सामूहिक परियोजना हुआ करती थी अब निर्वाचन आयोग के नेतृत्व में अंजाम दी रही है। अगर राजनीतिक दल निर्वाचन आयोग के साथ मिलकर काम करें तो एसआईआर कोई समस्या नहीं, बल्कि समाधान है।

दरअसल बिहार की एसआईआर परियोजना जो सुप्रीम कोर्ट में जबरदस्त विवादों और बिहार की सड़कों पर ताबड़तोड़ बहस का विषय बनी, मैं आखिरकार 1.60 लाख राजनीतिक एजेंटों ने वैध मतदाताओं की पुष्टि के लिए निर्वाचन आयोग के साथ मिलकर सक्रिय रूप से काम किया। इन एजेंटों में राजद के 48,000, कांग्रेस के 18,000, भाजपा के 47,000 और जदयू के 37,000 बीएलए शामिल थे। परिणामस्वरूप सुप्रीम कोर्ट जिसे राजनीतिक दलों, मीडिया और स्वतंत्र होने का दिखावा करने वाले लॉबिस्टों द्वारा निर्दयतापूर्वक हलकान किया जा रहा था, ने अंततः यह बताया कि ऐसी एक भी शिकायत नहीं आई कि किसी मतदाता को अंतिम सूची से बाहर रखा गया हो और यहां तक कि यह भी कह दिया कि बिहार एसआईआर मॉडल अखिल भारतीय एसआईआर में सहायक साबित होगा। तो फिर एसआईआर के खिलाफ मौजूदा राजनीतिक हंगामा क्यों? दोनों पक्षों की ओर से इस बात के साक्ष्य दिए गए हैं कि लाखों अवैध बंगलादेशी घुसपैठिए भारत में रहते हैं। यूपीए सरकार ने 14 जुलाई 2004 को संसद को बताया था कि 2001 के अंत तक भारत में लगभग 1.2 करोड़ अवैध घुसपैठिए रह रहे थे।

यूपीए के गृह मंत्री ने अलग-अलग राज्यों के स्पष्ट आंकड़े दिए थे। असम में 50 लाख, पश्चिम बंगाल में 57 लाख, बिहार में 4.79 लाख, दिल्ली में 3.75 लाख, त्रिपुरा में 3.25 लाख, नगालैंड में 59,500, मेघालय में 3,0000 और महाराष्ट्र में 20,000। वर्ष 2016 में एनडीए सरकार ने राज्यसभा को बताया था कि अवैध घुसपैठियों की संख्या 2 करोड़ थी। एसआईआर का विरोध करने वाले दलों और राजनेताओं की मंशा साफ है जिसे वे बेशक खुलकर नहीं कह सकते। इन लाखों बंगलादेशियों को वोट देने की अनुमति दी जाए। यह गैरकानूनी और असंवैधानिक होगा। एसआईआर में यही पेच है। पुन: निर्वाचन आयोग पर फैंके गए मतदाता सूची में खामियों के “एटम बम” और “हाइड्रोजन बम” भी दरअसल निर्वाचन आयोग के उस एसआईआर को सही ठहराते हैं जिसमें दो दशकों की देरी हो चुकी है। ये ‘बम’ तो बस दो दशकों में इकट्ठा हुईं खामियां हैं। पिछले एसआईआर जिसे वाजपेयी सरकार ने 2003 में शुरू की थी, को मनमोहन सिंह सरकार ने 2004 में पूरा किया था।

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