देश की सबसे बड़ी अदालत सर्वोच्च न्यायालय ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की विगत 13 जनवरी की नियम तालिका पर तात्कालिक रोक कर सिद्ध कर दिया है कि यह नियमावली भारतीय संविधान के नागरिकों के एक समानता के सिद्धांत पर प्राथमिक दृष्टि में खरी नहीं उतरती थी। यह नियमावली विश्वविद्यालयों में छात्रों के बीच बराबरी स्थापित करने की गरज से जारी की गई थी जिसमें अनुसूचित जाति व जनजाति तथा पिछड़े वर्ग के विद्यार्थियों के साथ विश्वविद्यालयों समेत उच्च शिक्षण संस्थानों में किसी प्रकार का भेदभाव न हो सके। जाहिर है कि इस नियमावली में एेसा कोई नियम नहीं था जिससे झूठी या गलत शिकायत दर्ज कराने वालों के खिलाफ कोई कारगर कार्रवाई की जा सके । इससे कथित सवर्ण वर्ग या सामान्य वर्ग के छात्रों में व्यापक रोष था और उनका मानना था कि नियम तालिका में यह पहले से ही मान कर चला जा रहा है कि केवल सामान्य वर्ग के छात्र और छात्राएं ही उत्पीड़क होंगे।
सर्वोच्च न्यायालय के विद्वान न्यायाधीशों ने इस मामले में तत्परता दिखाते हुए बदलते वक्त की नब्ज पर हाथ धरा है उससे यही आभास होता है कि हम 21वीं सदी में विश्व के वैज्ञानिक सोच के संविधान के होते हुए भारत को वापस पुरानी सदियों में नहीं ले जा सकते । बेशक भारत के इतिहास में हिन्दू समाज के बीच जाति गत आधार पर भारी भेदभाव हुआ है और कुछ विशेष जातियों में पैदा होने वाले व्यक्तियों के साथ शेष समाज ने पशुओं से भी बदतर व्यवहार किया है मगर आजादी के 77 वर्षों बाद अपने संविधान के लागू रहते हुए इस मामले में बहुत सी सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ा भी है और हम प्रगतिशील समाज बनाने की दिशा में आगे बढे़ हैं। इस मामले में हिन्दू समाज में अन्तरजातीय विवाहों का होना प्रगति की निशानी है जिसका संज्ञान देश के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकान्त ने भी आयोग की नियमावली के विरुद्ध दायर याचिकाओं की सुनवाई करते हुए लिया। निश्चित रूप से अन्तरजातीय विवाहों की संख्या बहुत कम हो सकती है मगर इससे यह तो पता चलता ही है कि भारत की नई पीढि़यां जातिविहीन समाज की संरचना में विश्वास रखती हैं जो कि भारत के संविधान का भी अिभष्ट है। इसके साथ यह भी कटु सत्य है कि उच्च शिक्षण संस्थानों मंे अनुसूचित जाति व जनजाति के छात्रों के साथ भेदभाव बरते जाने के मामले भी सामने आते रहते हैं अतः समस्या का समाधान हमें इस प्रकार खोजना होगा कि हम प्रतिगामी समाज बने बिना ही आगे की दिशा मे बढ़ते जाएं और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देते हुए पुरानी कुरीतियों से निजात पायें। इस सन्दर्भ में हमें सबसे पहले अनुसूचित जाति व जनजाति के समाज के साथ पिछड़े वर्ग को भी जोड़ कर देखे जाने की प्रथा को परखना होगा। भारतीय हिन्दू समाज में पिछड़े वर्ग के लोगों के साथ उनकी जाति को लेकर कभी भी दुर्भावना का स्तर गैर संवेदनशील नहीं रहा है बल्कि इन जातियों के लोग सवर्ण समाज के लोगों के साथ सांस्कृतिक रूप से गुंथे हुए रहे हैं । 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू होने से पूर्व इस वर्ग की बहुत सी जातियों के लोग स्वयं को क्षत्रियों के खाने में रखते थे।
इसका मूल कारण यह था कि एेतिहासिक रूप से इन जातियों के लोग भारत के शासक वर्ग तक में शामिल रहे हैं। उदाहरण के लिए भारतीय इतिहास गुर्जर प्रतिहार वंश के शासन का अपना महत्व रहा है। इसी प्रकार जाट राजाओं का भी अपना इतिहास रहा है और यादव वंश के शासकों की भी विशेष भूमिका रही है। निश्चित रूप से इस वर्ग में एसी भी जातियां रही हैं जिनका कार्य समाज के अन्य छोटे-मोटे काम-धंधों को संभालने का रहा है इसमें कहार से लेकर कुम्हार तक शामिल हैं परन्तु ये कभी भी हिन्दू समाज के लिए अन्त्यज नहीं रहे और इनकी हिन्दू संस्कृति के सामाजिक कार्यों में विशिष्ट भूमिका रही। जिस प्रकार हिन्दू स्त्रियों के लिए कुम्हार का चाक पूजना आवश्यक होता था उसी प्रकार गर्भवती स्त्री के लिए कुआं पूजना भी जरूरी होता था। मगर मंडल आयोग ने सामाजिक व शैक्षणिक आधार पर इनके पिछड़े होने को आधार बनाया और एेसी जातियों में उन लोगों को भी शामिल किया जो पेशे से कथित रूप से बहुत छोटे–मोटे काम करते थे। क्योंकि भारत की संस्कृति बहुत विविधता लिए हुए है अतः पिछड़े वर्ग में प्रत्येक राज्य में अलग–अलग जातियों के लोगों को शामिल किया गया। इसके मूल में इन जातियों के लोगों द्वारा पारंपरिक रूप से किया जाने वाला काम धन्धा ही प्रमुख था। लेकिन 1990 में सरकारी नौकरियों मंे पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था होने के बाद हिन्दू समाज में एक बदलाव आया और अधिक से अधिक ग्रामीण व खेतीहर जातियों में स्वयं को पिछड़ा घोषित करने के लिए द्वन्द छिड़ा। कालान्तर मंे केन्द्र में 2004 के बाद डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार आयी तो उनके मानव विकास मन्त्री स्व. अर्जुन सिंह ने उच्च शिक्षण संस्थानों में पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए भी आरक्षण लागू कर दिया । हमारे विश्वविद्यालयों व उच्च शिक्षण संस्थानों में अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों के लिए आरक्षण पहले से ही लागू था जिस पर समाज के किसी वर्ग को एतराज नहीं था क्योंकि इस वर्ग के लोगों से सदियों से शिक्षा का अधिकार छीना गया था और उन पर विभिन्न सांस्कृतिक व धार्मिक प्रतिबन्ध लगाये गये थे। यहां तक कि उन्हें अछूत तक कहा गया। परन्तु भारत के ग्रामीण समाज में इन जातियों के लोगों के साथ पिछड़े वर्ग की दबंग जातियों के लोगों ने ही सर्वाधिक उत्पीड़क तक की भूमिका भी निभाई । भारत के गांवों में आज भी दलित वर्ग और पिछड़े वर्ग के लोगों के बीच भारी मतभेद रहते हैं और दलितों पर अत्याचार भी होता है अतः पिछड़े वर्ग को दलित वर्ग के साथ समायोजित करना एतिहासिक व सांस्कृतिक रूप से तार्किक नहीं माना जा सकता। मगर 21 वीं सदी के भारत का युवा वर्ग अपना रास्ता क्या जातिवाद की जंजीरों में बंधते हुए ही सोचे? जाहिर है हमें इन जंजीरों को तोड़ना होगा और अपनी नई पीढि़यों को समता मूलक समाज की ओर मोड़ना होगा। यह समता मूलक समाज हम तभी बना पाएंगे जब हमारा युवा वर्ग विश्वविद्यालयों में बन्धुत्व और बराबरी के सिद्धान्त पर चलेगा। यह बराबरी सामाजिक वर्जनाओं को तोड़े बिना स्थापित नहीं की जा सकती। इसके लिए जरूरी है कि हम अपने उच्च शिक्षण संस्थानों को जाति गत भावनाओं से मुक्त रखें। मगर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की नई नियमावली ने तो युवा पीढ़ी को एेसे दरवाजे पर लाकर खड़ा कर दिया जहां से जातिगत भेदभाव को हथियार बना कर भाई चारे के माहौल को समाप्त करने का रास्ता खुलता है।
सवाल यह नहीं है कि कौन कथित सवर्ण है और कौन अनुसूचित जाति या जनजाति या पिछड़े वर्ग का बल्कि असली सवाल यह है कि किस वर्ग के साथ वास्तव में भेदभाव होता है क्योंकि कानून की निगाह मंे हर वर्ग व समूह का नागरिक एक समान है। सवाल यह भी है कि नई नियमावली क्या छात्रों में आपसी रंजिश पैदा करने का औजार तो नहीं बन जायेगी। समानता का अधिकार निजी हितों से ऊपर पूरे समाज में न्याय स्थापित करने के लिए संविधान ने दिया है अतः हमे अपने युवावर्ग को इसी राह पर आगे बढते देखना होगा जिससे जातिगत भावना समूल रूप से नष्ट होने की दिशा में आगे बढ़ सके। सर्वोच्च न्यायालय ने इन सभी मुद्दों पर प्राथमिक दृष्टि से विचार किया लगता है जिससे प्राकृतिक न्याय की भावना को हर सूरत में जीवन्त रखा जा सके।
विश्वविद्यालयों में सामाजिक न्याय
Summary :
देश की सबसे बड़ी अदालत सर्वोच्च न्यायालय ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की विगत 13 जनवरी की नियम तालिका पर तात्कालिक रोक कर सिद्ध कर दिया है कि यह नियमावली भारतीय संविधान के नागरिकों के एक समानता के सिद्धांत पर प्राथमिक दृष्टि में खरी नहीं उतरती थी। यह नियमावली विश्वविद्यालयों में छात्रों के बीच बराबरी स्थापित करने की गरज से जारी की गई थी जिसमें अनुसूचित जाति व जनजाति तथा पिछड़े वर्ग के विद्यार्थियों के साथ विश्वविद्यालयों समेत उच्च शिक्षण संस्थानों में किसी प्रकार का भेदभाव न हो सके। जाहिर है कि इस नियमावली में एेसा कोई नियम नहीं था जिससे…


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