‘स्वाधीनता दिवस’ के आसपास…

Summary :

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 15 अगस्त 1973 को लाल किले के परिसर में जमीन से 32 फीट नीचे एक ‘कालपात्र’ (टाइम कैप्सूल) दबवाया था। ‘टाइम कैप्सूल’ के नाम से चर्चित यह कालपात्र एक धातु विशेष का ‘पात्र’ था। इसमें उस कालखण्ड के महत्वपूर्ण इतिहास, दस्तावेज और घटनाओं को सुरक्षित रखा जाना था ताकि भविष्य की पीढि़य़ों को उस दौर की जानकारी मिल सके। दबाने की तिथि : 15 अगस्त 1973 (आजादी की 26वीं वर्षगांठ)। स्थान : लाल किला परिसर, नई दिल्ली ः प्राप्त चर्चित जानकारी के अनुसार, इसमें आजादी के बाद के पहले 25 वर्षों के इतिहास, संघर्षों और…

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 15 अगस्त 1973 को लाल किले के परिसर में जमीन से 32 फीट नीचे एक ‘कालपात्र’ (टाइम कैप्सूल) दबवाया था। ‘टाइम कैप्सूल’ के नाम से चर्चित यह कालपात्र एक धातु विशेष का ‘पात्र’ था। इसमें उस कालखण्ड के महत्वपूर्ण इतिहास, दस्तावेज और घटनाओं को सुरक्षित रखा जाना था ताकि भविष्य की पीढि़य़ों को उस दौर की जानकारी मिल सके।
दबाने की तिथि : 15 अगस्त 1973 (आजादी की 26वीं वर्षगांठ)। स्थान : लाल किला परिसर, नई दिल्ली ः प्राप्त चर्चित जानकारी के अनुसार, इसमें आजादी के बाद के पहले 25 वर्षों के इतिहास, संघर्षों और उपलब्धियों के साक्ष्य दर्ज थे। इसका वजन करीब 280 पाउंड था। इसे कालपात्र नाम दिया गया था। विपक्ष ने आरोप लगाया था कि इस कालपात्र के जरिए इंदिरा गांधी सरकार ने अपने परिवार (नेहरू-गांधी परिवार) का महिमामंडन किया है। साल 1977 में जब देश में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार आई तो राजनीतिक विवाद के चलते इस ‘पात्र’ को 4 माह बाद ही जमीन से बाहर निकलवा लिया गया था। पिछले दिनों पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की एक ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो गई थी, जिसमें वह एक धातु का कैप्सूल पकड़े हुए थीं और दावा किया जा रहा है कि उन्होंने कैप्सूल के अंदर गुप्त दस्तावेज़ दफनाए थे।
उन दिनों एक चर्चा यह भी चली थी कि 15/16 अगस्त 1973 की मध्य रात्रि में तत्कालीन प्रधानमंत्री के निर्देश पर किला परिसर में 32 फीट गड्ढा खुदवाया गया और टाईम कैप्सूल उसमें डाला गया था। क्या यह कोई तांत्रिक क्रिया थी? सत्ता के गलियारों में उन दिनों स्वामी धीरेन्द्र ब्रह्मचारी जी का इतना प्रभाव था कि बंदूक की फैक्ट्री के साथ दिल्ली के अशोक रोड पर 5 एकड़ का सरकारी बंगला भी उनके आश्रम के लिए आवंटित कर दिया गया था।
प्राप्त जानकारी के अनुसार उन्होंने श्रीमती इंदिरा गांधी को ‘तीन टाइम कैप्सूल’ गाढ़ने की सलाह दी थी। तंत्र से अभिमंत्रित पहला कैप्सूल यमुना नदी के मुहाने पर नेहरु जी की समाधि के पास 27 मई 1973 को, दूसरा उसी क्षेत्र में राजघाट पर 30 जनवरी 1973 को और तीसरा लाल किला में 15/16 अगस्त 1973 को गाड़ा गया था। दावा यही किया गया था कि इस तंत्र क्रिया से नेहरू-गांधी परिवार जिंदगीभर दिल्ली के सत्ता-तंत्र पर बना रह सकता था। यदि तीन कालपात्रों की परिकल्पना को मान लें तो दो कैप्सूल अभी भी जमीन के अंदर मौजूद हैं जबकि तीसरा 1977 में निकाला गया था। कहा जाता है कि एक कालपात्र में मनुष्य की खोपड़ी, जानवरों की हड्डी, सोना, चांदी तथा भारत का इतिहास निकला। लोकतंत्र और संविधान की रक्षा का नारा उछाला। यह समय की काली परछाई से गुजरा हुआ पात्र था। गत दिवस फेसबुक पर एक पोस्ट साझा करने वालों का कहना है कि 15 अगस्त, 1973 को गांधी जी ने तांबे और इस्पात से बने एक धातु के कैप्सूल में महत्वपूर्ण सार्वजनिक दस्तावेज़ों को सील करके लाल किले के सामने एक कुएं में दबवा दिया गया था। जनता पार्टी की पहली और गैर-कांग्रेसी सरकार ने यह मांग उठाई थी कि इसे खोदकर निकाला जाए और सभी दस्तावेज़ों को सार्वजनिक किया जाए। वैसे इस ‘कैप्सूल’ को एक हजार साल बाद ही निकाला जाना था।
1977 में कांग्रेस सरकार का तख्ता पलट हुआ और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी सत्ता में आई। खबरों के मुताबिक जनता पार्टी ने सत्ता में आने पर गांधी जी के टाइम कैप्सूल में रखे दस्तावेज़ों को निकालने का वादा किया था और 8 दिसंबर 1977 को जनता पार्टी की सरकार ने उन्हें निकाल दिया था। हालांकि उन दिनों चर्चा हुई थी कि इस बात की व्यापक रूप से खबरें आई थीं कि श्रीमती इंदिरा गांधी के ‘टाइम कैप्सूल’ को जनता पार्टी की सरकार ने खोज निकाला था लेकिन इसकी सामग्री अभी भी एक रहस्य बनी हुई है।
2013 की एक समाचार रिपोर्ट के अनुसार शिक्षाविद् और लेखिका मधु पूर्णिमा किश्वर ने प्रधानमंत्री कार्यालय से ‘टाइम कैप्सूल’ के बारे में जानकारी मांगी थी। पीएमओ ने कथित रूप से स्पष्ट किया था कि प्रधानमंत्री कार्यालय में पूर्व प्रधानमंत्री की ‘टाइम कैप्सूल’ परियोजना का कोई रिकॉर्ड नहीं है। जनता पार्टी सरकार ने ‘टाइम कैप्सूल’ के अंदर रखी सामग्री के बारे में कभी कोई जानकारी नहीं दी। कुछ समाचार ‘रिपोर्ट’ के अनुसार उस दौर के कुछ दिग्गज पत्रकारों ने दावा किया कि इंदिरा गांधी और उनके पिता जवाहर लाल नेहरू की उपलब्धियां ‘टाइम कैप्सूल’ में थीं लेकिन कहीं कुछ भी स्पष्ट नहीं है। इसलिए यही निष्कर्ष निकाला गया कि वह वायरल पोस्ट जिसमें दावा किया गया है कि पीएम मोदी को इंदिरा गांधी के टाइम कैप्सूल की सामग्री खोदकर सार्वजनिक करनी चाहिए, भ्रामक है क्योंकि इसे जनता पार्टी सरकार द्वारा पहले ही खोदकर निकाला जा चुका है। स्थितियां अभी भी अस्पष्ट हैं।

Dr. Chander Trikha