देश में चीनी की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। चीनी की कीमत कुछ दिनों में ही 48 रुपए के दायरे से बाहर निकल कर 75 रुपए प्रतिकिलो तक पहुंच चुकी है। महज तीन हफ्तों के भीतर चीनी के दाम आम आदमी के स्वाद को कड़वा बना रहे हैं। देश में त्यौहारी सीजन शुुरू होने वाला है। ऐसे में आम आदमी की चिंता काफी बढ़ गई है। वैसे भी आम आदमी लगातार बढ़ती महंगाई से परेशान है। चीनी की बढ़ती कीमतों पर काबू पाने के लिए केन्द्र सरकार ने तुरन्त कदम उठाए हैं। सरकार ने लगभग 10 वर्ष बाद 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी की ड्यूटी फ्री आयात को हरी झंडी दिखा दी है। चीनी के निर्यात पर रोक के साथ-साथ 30 नवम्बर तक कारोबारियों के लिए 400 टन की स्टॉक सीमा तय की गई है और थोक खरीदारों को 15 दिन से अधिक का स्टॉक रखने पर भी रोक लगा दी गई है। अमेरिका-ईरान युद्ध के चलते जब कमर्शियल गैस सिलैंडरों के दाम बढ़ाए गए थे तब छोटे दुकानदारों से लेकर बड़े रेस्तरां वालों ने एकदम से खाने-पीने के समान की कीमतें बढ़ा दी थीं। तब से ही आम आदमी महंगाई की तपिश को महसूस कर रहा है। चीनी संकट के चलते हर कोई अपना ज्ञान बघारने में लगा है। कोई चीनी संकट के लिए इथेनॉल को वजह बता रहा है तो कोई जमाखोरी को इसका कारण बताता है। चीनी के खुदरा और थोक व्यापारी चीनी की मांग और आपूर्ति में अंतर को कारण बता रहे हैं।
दुनिया में चीनी उत्पादन के मामले में ब्राजील के बाद भारत दूसरे नम्बर पर है। देश में गन्ने के रस से चीनी बनाने वाली कुल 703 मिलें हैं। इनमें से 335 प्राइवेट, 325 सहकारी और 43 सरकारी मिलें हैं। इसके बावजूद चीनी का संकट होना आश्चर्यजनक माना जा रहा है। सरकार ने आनन-फानन में चीनी आयात का फैसला किया क्योंकि अगस्त से नवम्बर के बीच देश में रक्षाबंधन, गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली के कारण चीनी की मांग बढ़ती है। मिठाई और खाद्य उद्योग में मांग बढ़ने के साथ कीमतों पर दबाव बढ़ने की आशंका है। यद्यपि सरकार ने चीनी के बढ़ते दामों के लिए इथेनॉल नीति को जिम्मेदार नहीं माना है लेकिन यह भी वास्तविकता है कि चीनी की कमी के पीछे इथेनॉल एक कारण है। समस्या यह है कि एक ही गन्ने से चीनी और इथेनॉल दोनों का उत्पादन किया जा सकता है। यदि गन्ने या उससे निकलने वाले ऐसे उत्पादों को इथेनॉल बनाने में ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है जिनसे चीनी उत्पादन भी हो सकता है, तो बाजार में उपलब्ध चीनी की मात्रा कम हो सकती है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक चालू वर्ष में चीनी मिलों ने करीब 30 लाख मीट्रिक टन चीनी, यानी कुल उत्पादन का लगभग 10 प्रतिशत, इथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़ा। सरकार अब अगले सीजन में गन्ने के रस और बी-हैवी मोलासेस से इथेनॉल बनाने पर रोक या सीमा लगाने पर विचार कर रही है ताकि ज्यादा गन्ना चीनी उत्पादन के लिए इस्तेमाल हो सके। सरकार की संभावित रणनीति यह है कि इथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने से निकलने वाले सी-हैवी मोलासेस को प्राथमिकता दी जाए। यह वह उप-उत्पाद है जिसमें अधिकांश चीनी पहले ही निकाल ली जाती है। इससे चीनी उत्पादन को अपेक्षाकृत कम नुकसान होगा।
विपक्षी दल इथेनॉल के मुद्दे पर आक्रामक रवैया अपनाए हुए हैं। उनका आरोप है कि गन्ने से इथेनॉल बनाने की नीति के कारण चीनी की उपलब्धता प्रभावित हुई है और अब सरकार को विदेशी मुद्रा खर्च करके चीनी आयात करनी पड़ रही है तो फायदा क्या हुआ? हालांकि इस आरोप को सीधे तौर पर स्थापित तथ्य मानना उचित नहीं होगा। चीनी की मौजूदा महंगाई के पीछे कम उत्पादन, खराब बारिश, घटता शुरूआती स्टॉक और त्यौहारी मांग जैसे कई कारण हैं।
अलनीनो और मौसम की अनिश्चितता के कारण गन्ने की पैदावार और चीनी के कुल उत्पादन पर असर पड़ा है। अधिक उत्पादन देने वाली सीओ-0238 नाम की गन्ने की किस्म में उत्तर प्रदेश में गेरूआ रोग फैल गया। इन कारणों से गन्ने का उत्पादन और शुगर रिकवरी रेट यानि 100 किलोग्राम गन्ने से मिलने वाली चीनी का प्रतिशत 12 किलोग्राम से नीचे आ गया। भारत में चीनी की खपत 2.6 करोड़ टन से 2.8 करोड़ टन के बीच रहती है और आमतौर पर साल के अंत में 60 से 70 लाख टन चीनी का स्टॉक बच जाता है। 2025-26 में चीनी सीजन में शुरूआती अनुमान ज्यादा थे लेकिन महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों में गन्ने की उपज कमजोर हुई। कई जगह ज्यादा बारिश से फसल खराब हुई तो दूसरी तरफ बारिश की कमी से फसल प्रभावित हुई। मौजूदा सीजन के अंत में यानि 30 सितम्बर तक चीनी का स्टॉक घटकर 35 लाख टन रहने की आशंका है जो अक्तूबर-नवम्बर तक की मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। बाजार में चीनी की कमी की आशंका और सुपर अलनीनो के चलते गन्ने की पैदावार पर सम्भावित असर के साथ तय कोटे से ज्यादा बिक्री होने के कारण भी कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। आम लोगों, मिलों, किसानों, कारोबारियों समेत सभी पक्षों में चीनी की कमी को लेकर धारणा बन गई है और वे तय कोटे से ज्यादा चीनी खरीद रहे हैं, जिससे बाजार में असंतुलन पैदा हो गया है।
अब सवाल यह है कि क्या सरकार के कदमों से उपभोक्ताओं को राहत मिलेगी या नहीं। चीनी का बाजार आम लोगों से चलता है, जिसकी रसोई में हर महीने चीनी की जरूरत पड़ती है। जब कीमतें बढ़ती हैं तो उसका असर केवल चाय की प्याली तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि मिठाई, बिस्कुट, पेय पदार्थ और अन्य खाद्य वस्तुएं भी महंगी हो जाती हैं। सरकार ने कच्ची चीनी के शुल्क मुक्त आयात की अनुमति दी है। इस चीनी को रिफाइन करना पड़ता है। इस प्रक्रिया में 3 लाख टन चीनी तत्काल घरेलू बाजार में उपलब्ध हो सकेगी। हालांकि ब्राजील से आने वाली खेप को भारत पहुंचने में दो महीने लग सकते हैं। इस आयात का असर अक्तूबर के आसपास ही नजर आएगा। सरकार को चीनी की उपलब्धता बनाए रखने के लिए स्टॉक सीमा और घरेलू बाजार की निगरानी करनी होगी, ताकि चीनी का कृत्रिम संकट पैदा न हो।
चीनी की मिठास कम
Summary :
देश में चीनी की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। चीनी की कीमत कुछ दिनों में ही 48 रुपए के दायरे से बाहर निकल कर 75 रुपए प्रतिकिलो तक पहुंच चुकी है। महज तीन हफ्तों के भीतर चीनी के दाम आम आदमी के स्वाद को कड़वा बना रहे हैं। देश में त्यौहारी सीजन शुुरू होने वाला है। ऐसे में आम आदमी की चिंता काफी बढ़ गई है। वैसे भी आम आदमी लगातार बढ़ती महंगाई से परेशान है। चीनी की बढ़ती कीमतों पर काबू पाने के लिए केन्द्र सरकार ने तुरन्त कदम उठाए हैं। सरकार ने लगभग 10 वर्ष बाद 10 लाख मीट्रिक…



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