ठाकरे बंधुओं का किला ध्वस्त

ठाकरे

महाराष्ट्र निकाय चुनाव में बीजेपी को ऐतिहासिक जीत मिली है। 25 साल का वनवास देवा भाऊ ने खत्म कर दिया है। महाराष्ट्र के 29 नगर निगमों में से भाजपा ने 25 निकायों में जीत हासिल की है। मुंबई महानगरपालिका के चुनाव में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। इस जीत के हीरो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस हैं जिन्होंने अपनी रणनीति से बीजेपी को जीत तो दिलाई ही साथ ही अपने प्रतिद्वंदी उद्धव ठाकरे को भी हाशिए पर धकेल दिया। महाराष्ट्र की राजनीति में बीजेपी के अंदर देवेंद्र फडणवीस सबसे बड़े चेहरे के रूप में उभरे हैं। विधानसभा और निकाय चुनाव में प्रचंड जीत के बाद तमाम क्षत्रप नेताओं को हाशिए पर धकेल दिया है। इसमें शरद पवार तक को हाशिए पर धकेल दिया है।

एशिया में सबसे धनी मानी गई बीएमसी के चुनावों में भाजपा और एकनाथ शिंदे की महायुति ने सबसे ज्यादा सीटें जीतकर इतिहास रच दिया। चुनाव नतीजे एक्जिट पोल के मुताबिक ही नजर आए हैं। बीएमसी के चुनावों को ठाकरे बंधुओं के सरवाइवल का सवाल माना जा रहा था, लेकिन उनका अंतिम किला भी ध्वस्त हो गया। उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के लिए यह चुनाव अग्नि परीक्षा थी लेकिन वे सफल नहीं हुए। जून 2022 में शिवसेना के विभाजन के बाद यह तीसरी चुनावी फाइट थी। करीब तीन दशक से लगातार शिवसेना मुम्बई पर राज करती आई है। बीएमसी का मतलब ही शिवसेना बन चुका था।

ऐसे में 2017 के बाद इस हाई प्रोफाइल चुनाव पर देश की नजरें लगी हुई थीं, क्योंकि शिवसेना दो हिस्सों में बंटी हुई है। बाल ठाकरे का वास्तविक उत्तरा​धिकारी कौन? उद्धव ठाकरे खुद को स्थापित करने के​ लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे थे लेकिन विधानसभा चुनावों से लेकर निकाय चुनावों तक एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली सेना ने बाजी मार ली है। उद्धव ठाकरे इस चुनाव की अहमियत समझते थे। शायद इस​लिए उन्होंने अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन हासिल करने के लिए सबसे पहले परिवार को एकजुट करने की सोची। महाराष्ट्र में दशकों से बाल ठाकरे का ही नाम बोलता है। शिंदे भी ठाकरे की तस्वीर लेकर अपनी सियासत चमका रहे हैं। आज भी सोशल मीडिया के प्रोफाइल में उन्होंने बैकग्राउंड में ठाकरे को लगा रखा है। ऐसे में उद्धव के सामने चुनौती बड़ी है।

उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) ने मराठी वोटों को एक साथ लाने के लिए चचेरे भाई राज ठाकरे के साथ गठबंधन किया है। राज ने नवम्बर 2005 में शिवसेना से अलग होकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) बना ली थी लेकिन इतने भर से ही जीत की गारंटी नहीं मिल जाती। कभी भाजपा शिवसेना की छोटा भाई थी लेकिन अब वह बिग ब्रदर बनकर उभरी है। मुंबई ही नहीं, पूरे देश में यह धारणा है कि बीएमसी का मतलब शिवसेना है लेकिन कम लोग जानते होंगे कि ठाकरे पार्टी ने अपने दम पर कभी बहुमत हासिल नहीं किया। शिवसेना ने हमेशा गठबंधन से ही नगर निगम की सरकार चलाई है।

मनसे प्रमुख राज ठाकरे की पहचान महाराष्ट्र की राजनीति में नफरती पॉलिटिक्स को लेकर ही रही है। मराठी अस्मिता के नाम पर गैर मराठियों के साथ मारपीट और गालीगलौज उनके कार्यकर्ताओं की पहचान रही। राज ठाकरे अपनी सभाओं में खुद भी जुबान पर कंट्रोल नहीं कर पाते थे। निकाय चुनाव में प्रचार के दौरान कहा था कि यूपी-बिहार के लोगों को समझना चाहिए कि हिंदी आपकी भाषा नहीं है। मुझे भाषा से नफरत नहीं है। लेकिन अगर आप इसे थोपेंगे तो मैं लात मारूंगा। राज ठाकरे यही नहीं रुके थे। उन्होंने कहा था कि वो चारों तरफ से महाराष्ट्र आ रहे हैं और आपका हिस्सा छीन रहे हैं। अगर आपकी जमीन और भाषा चली गई तो आप खत्म हो जाएंगे। ठाकरे के इस बयान का बड़ा विरोध हुआ था। उद्धव ठाकरे ने राज ठाकरे की मनसे के साथ समझौता करके बड़ी भूल की है।

उन्होंने कहा कि विधानसभा और लोकसभा चुनाव उद्धव ठाकरे कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ते रहे हैं, लेकिन बीएमसी चुनाव में उन्होंने चचेरे भाई राज ठाकरे को साथी बनाया, जो उनके लिए बड़ी भूल साबित हुई। बीएमसी चुनाव में राज ठाकरे के पास खास कुछ नहीं था। मनसे की तुलना में मुंबई के अंदर कांग्रेस ज्यादा बड़ी ताकत है। ऐसे में उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस का हाथ छोड़कर बहुत बड़ी गलती की है। मनसे का साथ लेने की वजह से उद्धव के हाथ से उत्तर भारतीयों का बड़ा वोट छिटक गया है।

मुम्बई में भाजपा की ताकत काफी बढ़ चुकी है। यद्यपि एकनाथ शिंदे ज्यादा मजबूत नहीं हैं, ​फिर भी चुनावी फायदे के ​लिए दोनों एक साथ आए। भाजपा की उत्तर भारतीय, गुजराती और दक्षिण भारतीय वोटर पर पकड़ मजबूत है जबकि एकनाथ शिंदे की शिवसेना की मराठी मतदाताओं पर पकड़ है। महाराष्ट्र की राजनीति की तरह बीएमसी में भी कांग्रेस का ग्राफ लगातार कमजोर हुआ है। वहीं एनसीपी की, बीएमसी में कोई खास मौजूदगी नहीं रही है। उद्धव ठाकरे की शिवसेना मुम्बई में भी कमजोर साबित हुई। उसके पीछे भी कई कारण हैं। हिन्दुत्व के मुद्दे पर भाजपा और शिवसेना स्वाभाविक मित्र दल के रूप में दिखाई देते थे लेकिन मुख्यमंत्री पद की लालसा में गठबंधन टूट गया और शिवसेना ने वैचारिक मतभेदों के बावजूद कांग्रेस और शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी से गठबंधन कर सरकार चलाई।

हिन्दुत्व के कई मुद्दों पर उद्धव ठाकरे और गठबंधन सहयो​गियों में कई बार टकराव देखने को ​मिला। जैसे-तैसे सरकार तो चलती रही लेकिन उद्धव ठाकरे की कार्यशैली को लेकर एकनाथ शिंदे ने ​विद्रोही बनकर ऐसी सेंध लगाई कि उन्होंने न केवल भाजपा के साथ मिलकर मुख्यमंत्री पद हासिल किया, बल्कि शिवसेना का चुनाव चिह्न तक छीन लिया। मुम्बई की जनता ने वर्क फ्रोम होम करने वाले नेताओं को पूरी तरह से नकार दिया। मुम्बई को गड्ढा मुक्त बनाने और ​विकसित महाराष्ट्र के संकल्प के लिए जमीनी नेताओं को ही लोगों ने प्राथमिकता दी। हिन्दुत्व की विचाराधारा से भटकाव उद्धव को महंगा पड़ा और राज ठाकरे से गठबंधन को मतदाताओं ने अवसरवादी गठबंधन ही करार दिया। फडणवीस की लाडकी बहन योजना ने भी महिलाओं को आकर्षित किया।

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