राजनीति का रक्त चरित्र

Summary :

पश्चिम बंगाल में सत्ता बदल गई लेकिन चुनाव परिणामों के बाद हुई हिंसा ने राजनीति के रक्त चरित्र को एक बार फिर उजागर कर दिया है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद राज्यों में सत्ता में आने वालों के चेहरे तो बदलते रहे लेकिन खूनी सियासत का चरित्र नहीं बदला। पश्चिम बंगाल एक ऐसा राज्य रहा जिसमें सत्ता में बैठने वालों ने विपक्ष की आवाज दबाने के लिए हिंसा को हथियार बनाया। चुनाव आते हैं, जाते हैं। जय-पराजय भी चलती रहती है लेकिन मौत का खेल लोकतंत्र के लिए घातक ही रहा है। ऐसा नहीं है कि पश्चिम बंगाल के अलावा अन्य…

पश्चिम बंगाल में सत्ता बदल गई लेकिन चुनाव परिणामों के बाद हुई हिंसा ने राजनीति के रक्त चरित्र को एक बार फिर उजागर कर दिया है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद राज्यों में सत्ता में आने वालों के चेहरे तो बदलते रहे लेकिन खूनी सियासत का चरित्र नहीं बदला। पश्चिम बंगाल एक ऐसा राज्य रहा जिसमें सत्ता में बैठने वालों ने विपक्ष की आवाज दबाने के लिए हिंसा को हथियार बनाया। चुनाव आते हैं, जाते हैं। जय-पराजय भी चलती रहती है लेकिन मौत का खेल लोकतंत्र के लिए घातक ही रहा है। ऐसा नहीं है कि पश्चिम बंगाल के अलावा अन्य राज्यों में राजनीतिक हिंसा नहीं हुई लेकिन खूनी सियासत ने पश्चिम बंगाल में सभी हदें पार कर दीं। पश्चिम बंगाल की सियासी फिजा पूरी तरह से लहूलुहान रही है। चुनाव आयोग द्वारा इस बार कड़े सुरक्षा प्रबंधों के चलते चुनावों के दौरान छिटपुट हिंसा की घटनाओं को छोड़कर कोई जन​हानि नहीं हुई। इससे सभी ने राहत की सांस ली थी। चुनाव परिणामों में भारतीय जनता पार्टी ने प्रचंड विजय हासिल कर ममता बनर्जी की 15 वर्ष पुरानी तृणमूल सरकार को उखाड़ फैंका। भाजपा राज्य में पहली बार सरकार बनाने की प्रक्रिया में जुटी हुई थी लेकिन चुनाव परिणामों के बाद बंगाल में हिंसा का नया दौर शुरू हो गया। बुधवार की रात भवानीपुर से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को करारी शिकस्त देने वाले शुभेन्दु अधिकारी के​ निजी सचिव चन्द्रनाथ रथ की नृशंस हत्या की गई। उससे यह सवाल सबके सामने खड़ा हो गया है कि क्या राज्य की सियासत का चरित्र बदलेगा या पूर्व की तरह ही चलता रहेगा।
चुनाव नतीजों के बाद राज्य के अलग-अलग जिलों में 2 भाजपा और 2 तृणमूल कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है और तोड़फोड़ और आगजनी का दौर जारी है। जीत में उत्साहित भाजपा कार्यकर्ताओं ने भी तृणमूल कांग्रेस के कार्यालयों में तोड़फोड़ की और जिस ढंग से अपने आप बुलडोजर चलाकर तृणमूल समर्थकों की दुकानों को ध्वस्त किया वह भी उतना ही निं​दनीय है जितना की तृणमूल की गुंडागर्दी की निंदा की जाती है। शुभेन्दु अधिकारी के निजी सचिव की हत्या के लिए यद्यपि भाजपा ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी को आरोपी करार दे रही है लेकिन फिलहाल ​िनष्पक्ष जांच के बाद किसी तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचा जा सकता है कि क्या यह हत्या निजी रंजिश के चलते हुई है या इसके तार सियासत से जुड़े हुए हैं। इन हत्याओं ने भाजपा की जीत के जश्न को गुलाल की बजाय खून से रंग दिया है। अगर पश्चिम बंगाल का इतिहास देखें तो यह एक ऐसा राज्य बन चुका है ​जहां सियासी दुश्मनों को हराया नहीं जाता बल्कि खत्म कर दिया जाता है।
बंगाल के गौरवशाली इ​ितहास और बौद्धिक संस्कृति को पहले 34 साल के कम्युनिस्ट शासन की सियासत ने धुंधला किया। गांव से लेकर कोलकाता के सत्ता के गलियारों तक पार्टी की सरकार थी और सरकार ही पार्टी। इसी कैडर कल्चर से राजनीतिक दुश्मनी ने जन्म लिया। कौन किसे वोट देगा यह लोग नहीं, पार्टी तय करती थी। एक पूरी पीढ़ी तक शासन करने वाली वामपंथी पार्टियों ने राजनीतिक हिंसा की नींव डाल दी। तीन दशक से भी ज्यादा के कम्युनिस्ट शासन में 20 हजार से ज्यादा राजनीतिक हत्याएं की गई थीं। कम्युनिस्टों ने ​िहंसा और गैर जिम्मेदार ट्रेड यूनियन वार की वकालत और नेतृत्व करके पूंजीवाद को बंगाल से बाहर निकाल दिया और राज्य को एक क​​ब्रिस्तान में बदल दिया। इसी खूनी राजनीति के बीच एक उम्मीद बनकर उभरीं ममता बनर्जी। लेफ्ट की हिंसक राजनीति को हराकर सत्ता में तो आईं, लेकिन अपनी कुर्सी बचाने के लिए उन्होंने भी वही रास्ता अपना लिया। बंगाल की टीएमसी में कार्यकर्ता कितने थे पता नहीं, पर गुंडों की कोई कमी नहीं थी। 2018 का पंचायत चुनाव हो, 2021 के चुनाव के बाद की हिंसा हो, या 2023 के पंचायत चुनाव के बाद का खून-खराबा, सब एक जैसा था। विरोधी पार्टियों के दफ्तरों में आग लगाना, लोगों के घरों में घुसकर टीएमसी को वोट देने की धमकी देना बंगाल में आम बात हो गई। गांवों में टीएमसी का विरोध करने वालों के पास दो ही रास्ते थे-या तो गांव छोड़ दो, या टीएमसी को वोट दो। टीएमसी का विरोध करने वालों को जहां-तहां पीटा गया, झूठे केसों में जेल में डाल दिया गया। जिन्होंने विरोध किया, उन्हें खत्म कर दिया गया और उनके घर की महिलाओं पर अत्याचार किए गए। ममता के खिलाफ लिखने वाले पत्रकारों को भी नहीं बख्शा गया। ममता बनर्जी मां, माटी और मानुष के नारे को भूल गई।
ममता के राज में 300 से ज़्यादा राजनीतिक हत्याएं हुईं, जबकि रेप के मामलों का तो कोई हिसाब ही नहीं। कई महिलाओं ने तो इज्जत के डर से पुलिस स्टेशन का मुंह तक नहीं देखा। उन्हें यह भी भरोसा नहीं था कि अगर वे शिकायत करने गईं तो सुरक्षित घर लौट पाएंगी। 2021 तक टीएमसी की खूनी राजनीति एक स्तर पर थी, लेकिन उसके बाद के हालात और भी भयानक हो गए। थोक में वोट पाने के लिए मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति, अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों के लिए रेड कार्पेट बिछाना और सिर्फ इसलिए हिंदुओं को निशाना बनाना क्योंकि उन्होंने बीजेपी का समर्थन किया था, यह सब टीएमसी के गुंडों के जरिए चल रहा था। बंगाल के लोगों के सब्र का बांध टूटने में 15 साल लग गए। इसका नतीजा ये हुआ कि 2011 में एक भी सीट न जीत पाने वाली बीजेपी, 2016 में 3 सीटों पर सिमटने वाली बीजेपी, आज 77 से 206 सीटें जीतने के स्तर पर आ गई है।
लोकतंत्र में इस तरह की ​हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है और न ही हिंसा को स्वीकार किया जा सकता है। भाजपा की नई सरकार के सामने राजनीतिक हिंसा को समाप्त करना, अापराधिक तत्वों आैर गुंडा कल्चर को नियंत्रित करना बहुत बड़ी चुनौती है। नई सरकार का यह दायित्व है कि वह राज्य में कानून व्यवस्था की स्थि​ित को सम्भाले और राज्य के नागरिकों को भय मुक्त शासन दे। भाजपा कैडर को भी जोश के साथ होश में रहकर काम करना होगा और स्वयं भी ​किसी भी तरह के उपद्रव और ​िहंसा से दूर रहना होगा। हिंसा की जहरीली राजनीतिक संस्कृति अब खत्म होनी ही चाहिए।

Aditya Chopra

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