हाल ही में फ्रांस में दुनिया के जिन सात विकसित देशों (जी-7) का सम्मेलन समाप्त हुआ है उनकी सबसे खास बात यह है कि ये सभी लोकतान्त्रिक देश हैं और इनकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह से खुली या बाजार मूलक है। इन सभी देशों में एक सबसे बड़ी समानता यह है कि सभी की राजनैतिक व्यवस्था में केवल दो या अधिक से अधिक तीन राजनैतिक दल हैं जो अपने-अपने फलसफे के आधार पर अपने देश के लोगों को उनके विकास का सपना बेचते हैं। चाहे ब्रिटेन हो या फ्रांस अथवा जर्मनी हो या इटली या फिर जापान हो या अमेरिका सभी में परंपरावादी या रूढ़ीगत दल का मुकाबला प्रगतिशील या समाजवादी मूलक विचारधारा के आसपास की पार्टी से होता रहता है। बेशक अमेरिका में रिपब्लिकन व डेमोक्रेटिक पार्टी के नाम से इन्हें हम जानते हैं और ब्रिटेन में कंजर्वेटिव पार्टी व लेबर पार्टी के रूप में।
इसी प्रकार फ्रांस व कनाडा और इटली व जापान में भी इन पार्टियों को अलग-अलग नामों से जाना जाता है परन्तु सैद्धान्तिक स्तर पर इन पार्टियों की विचारधारा में बहुत थोड़ा ही अन्तर अपने नागरिकों को सामाजिक व आर्थिक सुरक्षा देने के मुद्दों पर होता है। इसकी मूल वजह यह है दोनों ही विचारधाराओं की पार्टियां बाजार मूलक अर्थव्यवस्था में विश्वास रखती हैं और इसी के जरिये अपने देश की सुख-समृद्धि का सपना जनता को बेचती हैं। एेसा नहीं है कि इन देशों में विविधता नहीं है मगर इसका स्वरूप अलग-अलग है। कुछ देशों में तो भाषाई विविधता भी पाई जाती है जिनमें कनाडा प्रमुख है। मगर विविधता के मामले में भारत के सबसे निकट अमेरिका को पाते हैं जिसमें 50 राज्य हैं और सभी राज्यों की सांस्कृतिक पहचान में फर्क है। जिस तरह भारत राज्यों का संघ है उसी प्रकार अमेरिका भी राज्यों का संयुक्त देश है। इसके बावजूद इस देश में केवल दो प्रमुख राजनैतिक दल रिपब्लिकन व डोमैक्रेटिक पार्टी है। इस देश को बाहर से आकर यहां बसने वाले लोगों ने ही बसाया है तब भी केवल दो राजनैतिक दल ही समूची राजनीति की धुरी बने हुए हैं।
पिछले वर्ष जब भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष श्री जगत प्रकाश नड्डा ने यह बयान दिया था कि भारत में क्षेत्रीय दल धीरे-धीरे समाप्त हो जायेंगे तो उनके वक्तव्य की गंभीरता को नहीं समझा गया था। उसका आशय यही था कि बाजार मूलक अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे नीतिगत स्तर पर विभिन्न प्रान्तीय दलों की प्रासंगिकता स्वयं समाप्त कर देगी। क्योंकि खुली बाजार व्यवस्था में जिस तरह आर्थिक- सामाजिक विकास की नीतियों को बाजार की शक्तियों के भरोसे बनाया जाता है उसका सीधा असर समाज के उत्थान की नीतियों पर पड़ना लाजिम होता है जिसका असर सांस्कृतिक विविधता पर भी पड़ता है और प्रत्येक नागरिक में अधिक उत्पादनशील होने की प्रतियोगिता को बढ़ावा मिलता है जिससे उसकी निर्भरता सरकारी अनुदानों पर घटती जाती है।
भारत में क्षेत्रीय दलों का जोर अपने इलाके की विशिष्टता बनाये रखने पर होता है और उनका अस्तित्व इस बात पर निर्भर करता है कि सत्ता में आने पर वे अपने प्रदेश की जनता को अधिकाधिक आर्थिक सुविधाएं सुलभ करायेंगे मगर बाजार मूलक अर्थव्यवस्था उन्हें एक एेसे राष्ट्रीय आर्थिक सूत्र में बांध देती है जिससे उनकी अपने प्रदेश की जनता पर अतिरिक्त शुल्क लगा कर आय बढ़ाने की क्षमता सीमित हो जाती है। खुली बाजार व्यवस्था गांवों से लेकर शहरी क्षेत्रों तक में विभिन्न उत्पादों की विविधता को भी सीमित कर देती है जिससे समाज आर्थिक रूप से समरस होने लगता है और कालान्तर में इसके तार राजनीति से जुड़ने लगते हैं।
क्षेत्रीय दलों को भी बाजार मूलक अर्थव्यवस्था के तहत काम करते हुए अपने-अपने राज्यों में विकास हेतु अधिकाधिक निवेश की गुहार लगानी पड़ती है जिसकी वजह से सामाजिक सम्बन्धों में बदलाव आने लगता है और राजनैतिक स्तर पर विचार वैविध्य धीरे-धीरे सीमित होता जाता है क्योंकि देश की अर्थ नीति का संचालन केन्द्र में बैठे हुए प्रमुख दलों के हाथों में होता है और इनमें आधारभूत नीतिगत तौर पर विशेष अन्तर नहीं होता जिससे क्षेत्रीय दल अपनी प्रासंगिकता खोते जाते हैं। परन्तु भारत में पिछले तीन दशकों के दौरान जिस तरह जातिवादी दलों का अभ्युदय अर्थव्यस्था के बाजार मूलक बनने के समानान्तर हुआ उसनें भारतीय समाज की आन्तिरक विषमता को उजागर किया और जातिगत आधार पर होने वाले भेदभाव व पिछड़ेपन को सतह पर लाने का काम किया। अतः राजनीति में क्षेत्रीय दलों ने इस विसंगति को अपनी ताकत बनाया और चुनावों में जातिगत गणित बैठा कर अपनी जीत सुनिश्चित की परन्तु आर्थिक मोर्चे पर इनके पास केवल बाजार की शक्तियों के पास जाने के अलावा और कोई चारा नहीं था। इसीलिए हमने देखा कि क्षेत्रीय दल एक ही परिवार की गुलामी करने व राजनैतिक दुकानें बनते चले गये और इन परिवारों की सम्पत्तियां भी लगातार बढ़ती चली गईं।
लोकतन्त्र में इस नवोदित परिवार तन्त्र की शक्ति इस बात पर निर्भर करती थी कि उनके अपने राज्यों में निजी निवेश की मिकदार निरन्तर बढ़ती जाये जिसकी वजह से राजनीति में पूंजीपतियों का प्रभाव बढ़ने लगा और बड़े-बड़े पूंजीपति व धन्ना सेठ इन दलों के टिकट पर राज्यसभा में प्रवेश पाने लगे। आर्थिक रूप से ज्यादा नीतिगत विभेद न होने की वजह से राजनीति में सर्वाधिक जोर सामाजिक विषमता पर आ पड़ा और यह विषमता धीरे- धीरे वोट बैंक में तब्दील होती गई। परन्तु सामाजिक विषमता को निपटाने के लिए आर्थिक विषमता को कम करना जरूरी था जिसके लिए राज्य सरकारें अधिकाधिक पूंजी निवेश पर निर्भर थीं। क्योंकि पूंजी निवेश ही रोजगार पैदा करने का साधन होता है और यह निवेश निजी क्षेत्र से ही संभव था। अतः राजनीति में क्षेत्रीय अस्मिता का प्रश्न गौण होता चला गया।
हमने हाल ही में देखा कि किस तरह प. बंगाल में क्षेत्रीय पार्टी तृणमूल कांग्रेस और तमिलनाडु में द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम परास्त हुई। जबकि तृणमूल की प्रमुख सुश्री ममता बनर्जी मां, माटी के नारे पर ही 2011 में पहली बार जीत कर वामपंथियों को सत्ता से बाहर करने में सफल हुई थीं। इसके बाद वह 15 साल तक हुकूमत में रही परन्तु इस बार उन्हें भारतीय जनता पार्टी ने अपने राष्ट्रीय सैद्धान्तिक बूते पर हरा दिया। इसकी असली वजह यह मानी जा रही है कि ममता दी ने अपने 15 साल के शासन में राज्य में कोई विकास का काम नहीं किया और लोगों को आर्थिक रूप से आगे बढ़ने में किसी प्रकार की मदद नहीं की।
आर्थिक बाजारवाद की राजनीति हमें बताती है कि क्षेत्रीय दलों का अस्तित्व बाजार की शक्तियों के सही मूल्यांकन पर ही टिका रहता है। यही हाल तमिलनाडु में द्रवड़ मुन्नेत्र कषगम के नेता एम.के. स्टालिन का हुआ जो हिन्दी विरोध का पट्टा थामे हुए थे। उन्हें एक नवोदित नेता जोसेफ विजय ने ही हरा दिया जो बाजार मूलक अर्थव्यवस्था के बीच ही आर्थिक विषमता को पाटने की बात कर रहे थे।
यदि हम और गहराई में जायें तो पायेंगे कि बाजार मूलक अर्थव्यवस्था को भारत में 1991 में लाने वाली कांग्रेस पार्टी के भी इस मोर्चे पर भारतीय जनता पार्टी से विशेष मतभेद नहीं हैं वह केवल इसी नीति के तहत सामाजिक न्याय की राजनीति का पल्ला पकड़ कर खड़ी हो गई है। वह भी चुनावों के मौके पर लोगों को अधिकाधिक मुफ्त सौगात देने की वकालत करती है। उसके पास भी कोई नई आर्थिक नीति नहीं है। मगर भारत का संविधान कहता है कि यह एक लोक कल्याणकारी राज है जिसकी सरकार को लोगों के कल्याण के लिए एेसे काम करने चाहिए जिससे सामाजिक गैर बराबरी व आर्थिक विषमता कम हो सके। इस सन्दर्भ में भारत के लगभग 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन सुलभ कराया जाना महत्वपूर्ण है। मगर बाजार मूलक अर्थव्यवस्थाएं होने के बावजूद अमेरिका से लेकर कनाडा व ब्रिटेन व इटली तक अपनी नई पीढि़यों को दसवीं तक की शिक्षा मुफ्त उपलब्ध कराते हैं।
भारत में हालांकि शिक्षा का अधिकार कानून है मगर सरकारी स्कूलों की हालत खस्ता है। इसी प्रकार स्वास्थ्य क्षेत्र में मोदी सरकार ने समाज के गरीब वर्गों के लिए पांच लाख रु. सालाना की मुफ्त चिकित्सा की गारंटी दी हुई है। दूसरी तरफ अमेरिका से लेकर इटली तक जैसे आधुनिक देशों में इन्ही मुदों पर चुनाव लड़े जाते हैं। इससे पता चलता है कि बाजार मूलक अर्थव्यवस्था की भी जरूरी शर्त नागरिकों को एक समान रूप से शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की होती है। अतः इस माहौल की राजनीति में क्षेत्रीय दल अपना अस्तित्व किस प्रकार बचाये रख सकते हैं देर-सबेर भारत में भी दो या तीन पार्टियों की प्रणाली ही अपना घर बनाती जायेगी।
क्षेत्रीय दलों का अवसान स्वाभाविक
Summary :
हाल ही में फ्रांस में दुनिया के जिन सात विकसित देशों (जी-7) का सम्मेलन समाप्त हुआ है उनकी सबसे खास बात यह है कि ये सभी लोकतान्त्रिक देश हैं और इनकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह से खुली या बाजार मूलक है। इन सभी देशों में एक सबसे बड़ी समानता यह है कि सभी की राजनैतिक व्यवस्था में केवल दो या अधिक से अधिक तीन राजनैतिक दल हैं जो अपने-अपने फलसफे के आधार पर अपने देश के लोगों को उनके विकास का सपना बेचते हैं। चाहे ब्रिटेन हो या फ्रांस अथवा जर्मनी हो या इटली या फिर जापान हो या अमेरिका सभी…


Download Android App
Download iOS App



