ईरान से युद्ध के मसले पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पूरी तरह से भटक चुके हैं। ऐसा लगता है कि उन्हें कुछ सूझ ही नहीं रहा कि आखिर करना क्या है? ट्रम्प के अस्पष्ट उद्देश्यों और युद्ध की अवधि को लेकर दिये गए विरोधाभासी बयानों ने न केवल यूरोपीय नेताओं को चिंता में डाल दिया है बल्कि पूरी दुनिया में तनाव फैला है। वित्तीय बाजार हिल उठे हैं। महायुद्ध का विध्वंस 21वें दिन में प्रवेश कर गया है। आगे क्या होगा कुछ कहा नहीं जा सकता। डोनाल्ड ट्रम्प के करीबी सहयोगी एक-एक करके अलग रुख अपना रहे हैं। फ्रांस, ब्रिटेन, इटली, स्पेन कुल मिलाकर यूरोप के कई देशों ने ट्रम्प को अकेला छोड़ दिया है। ट्रम्प की पश्चिम एशिया नीति को लेकर अमेरिका के ही काउंटर टेररिज्म प्रमुख जो कैंट ने ईरान से युद्ध के विरोध में अपना इस्तीफा देते हुए कहा है कि ईरान ने अमेरिका के लिए कोई खतरा पैदा नहीं किया है और ट्रम्प ने इजराइल और उसकी अमेरिकी लाॅबी के दबाव में युद्ध शुरू किया है, जो कैंट के इस्तीफे की खबर अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि अमेरिका की इंटेलिजेंस चीफ तुलसी गबार्ड ने ट्रम्प प्रशासन के उस दावे की पोल खोलकर रख दी है जिसमें ईरान के परमाणु खतरे को जंग की बड़ी वजह बताया गया है।
तुलसी गबार्ड ने सीनेट की इंटेलिजेंस कमेटी के सामने अपने बयान में कहा है कि ईरान ने अपना परमाणु संवर्धन दोबारा शुरू करने की कोई कोिशश नहीं की है। क्योंिक ऑपरेशन मिडनाइट हैमर के बाद ईरान का परमाणु ढांचा पूरी तरह से तबाह हो चुका है। तुलसी गबार्ड ने पाकिस्तान को अमेरिका के लिए सबसे बड़ा खतरा बताते हुए ईरान, चीन, रूस, उत्तर कोिरया को उन देशों के रूप में दिखाया है जो अमेरिका को खतरे में डाल सकते हैं। उन्होंेने कहा कि पाकिस्तान, चीन, रूस, उत्तर कोरिया आैर ईरान कई नए आैर उन्नत मिसाइल सिस्टम पर काम कर रहे हैं। इन क्षमताओं के कारण अमेरिका अब इन देशों की मारक क्षमता की जद में आ चुका है। भारत कई वर्षों से वैश्विक मंचों पर पाकिस्तान को पूरी दुनिया के लिए खतरा बताता आ रहा है लेकिन अमेरिका की सरकारों ने भारत और पाकिस्तान को एक ही तराजू में तोलना नहीं छोड़ा। तुलसी गबार्ड का कबूलनामा भारत के स्टैंड का प्रत्यक्ष समर्थन करता है। अब सवाल यह है कि अगर ईरान के परमाणु कार्यक्रम से कोई खतरा नहीं था तो ट्रम्प ने जंग शुरू क्यों की। एक तरफ ट्रम्प नाटो देशों से मदद की गुहार लगा रहे हैं तो दूसरी तरफ उन्हें धमका भी रहे हैं। यूरोपीय देशों का कहना है कि ट्रम्प ने िबना उनसे परामर्श किए युद्ध शुरू किया है। इसलिए वे युद्ध से अलग रहेंगे और होर्मुज जलडमरूमध्य को सुरक्षित बनाने में कोई सैन्य सहायता नहीं करेंगे। यूरोपीय देश भले ही ईरान के प्रति अमेरिका की शत्रुता में भागीदार रहे हैं लेकिन वे ऊर्जा की बढ़ती कीमतों, यूक्रेन युद्ध से ध्यान हटने, रूसी तेल पर अमेरिकी प्रतिबंधों में ढील और शरणार्थियों के सम्भावित आगमन को लेकर चिंता में डूबे हुए हैं और किसी व्यापक युद्ध में उलझना नहीं चाहते।
ईरान से युद्ध में अब नया मोड़ उस समय आया जब इजराइल ने ईरान के सबसे बड़े प्राकृतिक गैर फील्ड साउथ पार्स पर हमला कर िदया। ईरान ने इस हमले को करारा जवाब देते हुए कतर के गैस ऊर्जा ढांचे और अन्य खाड़ी देशों पर धुआंधार हमले कर दिये। इससे ट्रम्प पूरी तरह से घबरा गए आैर उन्होंने इस हमले के लिए इजराइल को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि यह काम इजराइल ने उन्हें बिना बताए किया है। इस बयान का अर्थ यही है कि इजराइल ट्रम्प को भी विश्वास में नहीं ले रहा। तेल के बाद अब गैस पर महारण शुरू हो चुका है। अगर गैस संकट शुरू हुआ तो यूरोपीय देशों के होश ठिकाने आ जाएंगे बल्कि पूरी दुनिया एक बहुत बड़े संकट में फंस जाएगी। यूरोप के सभी देश प्राकृतिक गैस का उपयोग बिजली उत्पादन, हीटिंग आैर खाना बनाने के िलए करते हैं। ठंडे देशों में बिना गैस के जनजीवन पंगु होकर रह जाएगा। ईरान के साथ युद्ध शुरू होने के बाद से गैस की कीमतों में 50 प्रतिशत आैर तेल की कीमतों में 27 प्रतिशत वृद्धि हुई है। जिसके परिणामस्वरूप यूरोपीय संघ को ईंधन आयात पर लगभग तीन अरब यूरो का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ रहा है। हंगरी के प्रधानमंत्री तथा कुछ देशों ने एक बार फिर यूरोपीय संघ से रूसी ऊर्जा पर लगे प्रतिबंधों को निलंबित करने का आग्रह किया है। उनका तर्क है कि ईरान संकट और तेल की बढ़ती कीमतें यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं पर भारी बोझ डाल रही हैं। बेल्जियम भी रूस के साथ सामान्य संबंध बहाल करने और उसकी सस्ती ऊर्जा आपूर्ति तक पहुंच पुनः प्राप्त करने की वकालत की है। पोलैंड, रोमानिया, बुल्गारिया और बाल्टिक राज्यों सहित मध्य और पूर्वी यूरोप के कई देशों ने खुले तौर पर संयुक्त राज्य अमेरिका पर सवाल उठाने से परहेज किया है, लेकिन उन्होंने यह भी संकेत दिया है कि उनके पास प्रत्यक्ष सैन्य सहायता प्रदान करने की कोई योजना नहीं है। अधिकांश यूरोपीय देश ईरान के व्यवहार और परमाणु महत्वाकांक्षाओं की आलोचना कर रहे हैं, लेकिन कई देश सैन्य हमलों की वैधता पर भी सवाल उठा रहे हैं। वे इस बात से भी अवगत हो रहे हैं कि इस संघर्ष का तात्कालिक लाभार्थी रूस हो सकता है, क्योंकि वैश्विक ऊर्जा कीमतों में वृद्धि और प्रतिबंधों में ढील से रूसी राजस्व में वृद्धि हो सकती है। यूरोपीय देश कतर, अल्जीरिया, ब्रिटेन और अजरबैजान से गैस का आयात करते हैं। पश्चिम एशिया एक घातक संघर्ष में फंसा हुआ है, जिसका कोई अंत नजर नहीं आता। हर देश के सामने सबसे बड़ी दुविधा यह है कि कौन इस समस्या का समाधान करेगा लेकिन दुर्भाग्य से यूरोप अमेरिका के साथ अपना गठबंधन तोड़ना नहीं चाहता। वहीं ब्रिक्स देश भी ट्रम्प को नाराज करने से परहेज कर रहे हैं। इसलिए रणनीतिक संयम बरत रहे हैं। मानवता चीख-चीख कर कह रही है कि युद्ध को रोको अन्यथा भयंकर परिणाम होंगे। अन्तर्राष्ट्रीय िनयमों का खुला उल्लंघन हो रहा है। अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय मिलकर तय करें कि युद्ध रोकने के लिए क्या किया जा सकता है। अगर तेल और गैस पर युद्ध जारी रहा तो फिर कुछ नहीं बचने वाला।

















