धोखेबाज पाकिस्तान की कुंडली

पश्चिम एशिया में संकट पर केन्द्र द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में सरकार ने देश में पर्याप्त तेल और गैस भंडार होने और स्थिति नियंत्रण में होने का भरोसा दिया। विपक्षी दलों ने संकट के इस दौर में सरकार के साथ एकजुटता व्यक्त की लेकिन साथ ही उसने अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता में पाकिस्तान की मध्यस्थता की भूमिका पर चिंता जताई। विपक्ष की चिंताओं का जवाब देते हुए विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पाकिस्तान पर तीखा व्यंग्य कसते हुए कहा कि भारत वैश्विक भूराजनीति में ‘दलाल राष्ट्र’ के रूप में कार्य नहीं कर सकता। उन्होेंने कहा कि मध्यस्थता के लिए पाकिस्तान की नौटंकी नई नहीं है और यह 1981 से जारी है। अमेरिका वर्षों से तेहरान के साथ सम्पर्क बनाए रखने के लिए इस्लामाबाद का इस्तेमाल एक चैनल के रूप में करता आया है। विदेश मंत्री की यह ​टिप्पणियां ऐसी खबरों के बाद आई हैं जब पाकिस्तान वाशिंगटन और तेहरान के बीच संदेशों को सक्रिय रूप से पहुंचाने की भूमिका निभा रहा है। अमेरिका ने ईरान को 15 सूत्री प्रस्ताव भी पाकिस्तान के माध्यम से ही भेजा है। यद्यपि ईरान ने अमेरिका के 15 सूत्री प्रस्ताव को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। पाकिस्तान के इतिहास के पन्ने पलटें तो उसका पूरा इतिहास धोखे आैर दलाली से भरा हुआ है। पाकिस्तान अलग राष्ट्र बनने के बाद से ही दलाली करता आया है। जब-जब पाकिस्तान ने शांति दूत का चोला पहना तब-तब दुनिया ने खून-खराबा आैर ​िवश्वासघात देखा है।
कई रक्षा विशेषज्ञों ने समय-समय पर पाकिस्तान के दोगलेपन की ऐसी कहानियां सुनाई हैं जिससे पूरी दुनिया हैरान रह जाती है। यही कारण है कि आज पाकिस्तान पर कोई भी देश भरोसा नहीं करता। पाकिस्तान ने हमेशा ही अपने आवाम को धोखे में रखा और उसके हुक्मरानों ने अपने ही देश को जमकर लूटा। उसके धोखे का शिकार पड़ोसी देश भी हुए। 9/11 के हमले के बाद जब अमेरिकी राष्ट्रपति बुश पर युद्ध उन्माद छाया हुआ था और अमेरिका ने पाकिस्तान को तालिबान से अलग न होने पर उसे पत्थर युग में वापिस भेजने की धमकी दी थी, तब तत्कालीन पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने यू-टर्न लेकर अमेरिका की गोद में बैठना बेहतर समझा था। अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में आतंकवाद की खेती करने वाले पाकिस्तान को अपना साथी बना लिया। यह ​कितना हास्यास्पद था कि एक जेहादी देश को आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में आगे कर ​दिया गया। जबकि अमेरिका जानता था कि ट्विन टॉवर पर हमला करने वाले आतंकवादियों में कुछ को ट्रेनिंग भी पाकिस्तान ने ही दी थी। अमेरिका ने अफगानिस्तान पर धावा बोल दिया और आतंकवाद से लड़ने के लिए पाकिस्तान पर डॉलरों की बरसात कर दी। पाकिस्तान ने एक तरफ अमेरिकी डॉलरों का इस्तेमाल आतंकवाद को सींचने के ​िलए किया तो दूसरी तरफ अमेरिका को धोखे में रखकर तालिबान को संरक्षण दिया। अमेरिका चाहता तो पाकिस्तान को मरघट में बदल सकता था, पर अमेरिका को लगता था कि अफगानिस्तान में ओसामा बिन लादेन और अन्य से प्रतिशोध के लिए उसे पाकिस्तान की जरूरत है। 20 वर्ष तक अमेरिका तोरा-बोरा की पहाड़ियों में खाक छानता रहा, उसे कुछ हासिल नहीं हुआ। पाकिस्तान दोहरापन अपनाता रहा। अफगानिस्तान में अमेरिकी विफलता का कारण पाकिस्तान ही रहा। अंततः अमेरिका ने पाकिस्तान के एबटाबाद में छिपे ओसामा बिन लादेन को मार डाला। तब अमेरिका को अहसास हुआ कि लादेन को अपने यहां छिपाने वाले पाकिस्तान का सच क्या है। रक्षा विशेषज्ञ मेजर गौरव आर्या ने 2020 के यूएस-तालिबान दोहा शांति समझौते का जिक्र करते हुए पाकिस्तान की गद्दारी की कुंडली खोली। उन्होंने बताया कि आज तालिबान पाकिस्तान से इतनी नफरत क्यों करता है। “पाकिस्तान ने तालिबान के शीर्ष नेता मुल्ला बरादर को शांति वार्ता के नाम पर पाकिस्तान बुलाया। कहा गया कि पाकिस्तानी सबसे मेहमाननवाज कौम हैं लेकिन जब मुल्ला बरादर वहां पहुंचा, तो पाकिस्तानियों ने उसे 9 साल तक जेल में बंद रखा और बेरहमी से टॉर्चर किया।” मेजर ने बताया कि तालिबान नेतृत्व इस धोखे को कभी नहीं भूला। तालिबान के एक पूर्व राजदूत ने अपनी किताब में पाकिस्तानियों को ‘दो-मुंहे’ लोग कहा है, जिनकी जुबान पर कुछ और होता है और दिल में कुछ और।
पाकिस्तान ने सोचा था कि अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार बनवाकर वह वहां अपना पांचवां सूबा (राज्य) स्थापित कर लेगा और वहां की सत्ता को रिमोट कंट्रोल से चलाएगा लेकिन हुआ इसका ठीक उल्टा। आज वही तालिबान, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) का खुलकर समर्थन कर रहा है और टीटीपी के आतंकी पाकिस्तान की सेना को उन्हीं की जमीन पर गाजर-मूली की तरह काट रहे हैं। जो पाकिस्तान दूसरों के लिए गड्ढा खोद रहा था, आज वह खुद उसमें गिरकर लहूलुहान है। अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता के पीछे पाकिस्तान का अपना एक डर भी है। पाकिस्तान फौज के अन्दर एक बड़ी संख्या शिया मुसलमानों की है। ईरान के लिए ये शिया सैनिक बहुत मायने रखते हैं और पाकिस्तान इस बात को लेकर खौफ में है। पाकिस्तानी हुक्मरानों को डर है कि अगर उन्होंने अमेरिका के दबाव में आकर ईरान के खिलाफ कोई भी कदम उठाया, तो पाकिस्तानी फौज के अंदर मौजूद शिया सैनिक अपनी ही स्टेट (सरकार) के खिलाफ हथियार उठा सकते हैं। यह पाकिस्तान के लिए एक गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा कर देगा। अब पाकिस्तान की हालत एक ऐसे ‘चुंगी नाके’ जैसी है जो दूसरों के झगड़े में अपनी कमीशन (10-5 प्रतिशत) ढूंढ रहा है। न उसकी कोई क्रेडिबिलिटी है, न कोई हैसियत। जो देश अपने पाले हुए आतंकियों से नहीं निपट पा रहा और जहां फौज के अंदर ही विद्रोह का डर सता रहा हो, उसका विश्व शांति की बात करना 21वीं सदी का सबसे बड़ा मजाक है।
हैरानी की बात तो यह है कि पाकिस्तान के साथ तुर्की और मिस्र भी मध्यस्थता के दावे कर रहे हैं, जबकि मिस्र ईरान से नफरत करता है और तुर्की भी ईरान का विरोधी है। तुर्की वही देश है जिसने भारत के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान को ड्रोन दिए थे। पाकिस्तान ने 1971 में बांग्लादेश में जो नरसंहार किया था उसे आज तक बांग्लादेश की जनता भूल नहीं पाई। पाकिस्तान की आर्थिक हालत किसी से छिपी नहीं है। पाकिस्तान सेना के प्रमुख असिम मुनीर ​िपछले एक साल से ट्रम्प की चमचागिरी कर रहे हैं और उनसे ‘डील’ ही कर रहे हैं। वह अमेरिका का पिछलग्गू बनकर फिर से मदद चाहता है ताकि उसके एल्युमिनियम भीख के कटोरे में डॉलर डाल दिये जाएं। पाकिस्तान खुद लहूलुहान है, वह क्या​ किसी की मदद कर सकता है।

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