आतंकवाद झेल चुके पंजाब के हिंदुओं की चर्चा होनी जरूरी

Summary :

पंजाब के आतंकवाद ने नए उभरते हुए भारत की सुरक्षा नीति को बहुत गहराई से प्रभावित किया है, लेकिन बावजूद इसके पंजाब में आतंकवाद के दौर का व्यापक अध्ययन नहीं किया गया जो कि बेहद जरूरी है। पंजाब में 1978 से 1995 के बीच 25,000 से अधिक लोग मारे गए, जिनमें आतंकवादियों समेत पुलिसकर्मी, अर्धसैनिक बलों के जवान, राजनेता और हजारों निर्दोष नागरिक शामिल थे। बहुत लोग इस आतंकवाद की भेंट चढ़ गए। बहुत से लोगों को जानबूझकर निशाना बनाया गया। इन मृतकों में बड़ी संख्या सिख उदारवादियों, निरंकारियों, गांव के नेताओं और सरकारी अधिकारियों की थी। वास्तव में, पीड़ितों…

पंजाब के आतंकवाद ने नए उभरते हुए भारत की सुरक्षा नीति को बहुत गहराई से प्रभावित किया है, लेकिन बावजूद इसके पंजाब में आतंकवाद के दौर का व्यापक अध्ययन नहीं किया गया जो कि बेहद जरूरी है। पंजाब में 1978 से 1995 के बीच 25,000 से अधिक लोग मारे गए, जिनमें आतंकवादियों समेत पुलिसकर्मी, अर्धसैनिक बलों के जवान, राजनेता और हजारों निर्दोष नागरिक शामिल थे। बहुत लोग इस आतंकवाद की भेंट चढ़ गए। बहुत से लोगों को जानबूझकर निशाना बनाया गया। इन मृतकों में बड़ी संख्या सिख उदारवादियों, निरंकारियों, गांव के नेताओं और सरकारी अधिकारियों की थी। वास्तव में, पीड़ितों का बहुमत इन्हीं वर्गों से था, लेकिन पंजाब में हुई इस व्यापक त्रासदी के भीतर एक और छोटी, लगभग भुला दी गई कहानी भी छिपी हुई है। वह कहानी है, पंजाब के हिंदुओं की। इस दौर में पंजाब में रह रहे हिंदू समाज के लोग भयग्रस्त और असुरक्षित अल्पसंख्यक के रूप में जीने को मजबूर थे। बड़ी संख्या में हिंदुओं को पंजाब से विस्थापित होना पड़ा। उस दौर में हिंदुओं ने जो डर झेला उनका जो नुकसान हुआ, उस पर सार्वजनिक विमर्श नहीं हुआ। वह हमारी स्मृति से गायब है। इस कहानी को स्वीकार करना किसी भी समुदाय के बीच विभाजन पैदा करना नहीं है। यह केवल उस इतिहास को पूरा करना है, जिसे अब तक टुकड़ों-टुकड़ों में ही बताया गया है। आज पंजाब की जनसंख्या में लगभग 38.5 प्रतिशत हिंदू हैं, जबकि सिखों की संख्या करीब 58 प्रतिशत है। पंजाब में आतंकवाद केवल राष्ट्रवाद या संघीय अधिकारों की लड़ाई नहीं था। वह पंजाब की उस पुरानी परंपरा पर भी हमला था, जिसमें धार्मिक विविधता सह-अस्तित्व का आधार रही है।
आतंकवाद के चरम काल में हिंदुओं पर किए जाने वाले हमले आकस्मिक नहीं थे। उन हमलों के पीछे एक स्पष्ट रणनीति और विचारधारा थी। क्षेत्र की जनसंख्या संरचना को बदलना, भय का वातावरण पैदा करना। उन दिनों बाजारों में बम धमाके, बसों में हिंदुओं को लक्षित कर नरसंहार करना, आए दिन की बात हो गई थी। दुकानदारों, पत्रकारों, शिक्षकों तथा मजदूरों पर लक्षित हमलों ने ऐसा माहौल बना दिया कि किसी व्यक्ति का धर्म ही उसके लिए खतरा बन गया। कुख्यात बस हत्याकांड जिनमें यात्रियों को उनके धर्म के आधार पर अलग कर गोली मार दी जाती थी, किसी भी भाषण या पर्चे से कहीं अधिक दहशत फैलाने वाले थे। इस समय के आंकड़े इस हिंसा की भयावहता को स्पष्ट करते हैं। इस दौरान 11,690 नागरिक मारे गए, साथ ही 1,769 पंजाब पुलिसकर्मी और करीब 1,700 अर्धसैनिक बलों के जवान भी बलिदान हुए। ? शहीद हुए। नागरिक मृतकों में संख्या के लिहाज से सिखों की हिस्सेदारी अधिक थी। उन्हें अलगाववादी विचारधारा का विरोध करने या “गद्दार” समझे जाने के कारण मारा गया। लेकिन हिंदुओं के सामने खतरे की प्रकृति अलग थी। उन्हें खालिस्तानी आतंकी प्रस्तावित ‘खालिस्तान’ के मार्ग में बाधा के रूप में देखते थे। पंजाब में भय का माहौल था। इस भय ने स्वतंत्र भारत के सबसे कम चर्चित पलायनों में से एक को जन्म दिया। जैसे-जैसे धमकियां बढ़ीं, वैसे-वैसे गुरदासपुर, बटाला, फिरोजपुर और तरनतारन के गांवों से हिंदू परिवार चुपचाप निकलने लगे। अक्सर रात के अंधेरे में। पूरे के पूरे मोहल्ले वीरान हो गए। पीढ़ियों से वहां रह रहे परिवार पानीपत, अंबाला, दिल्ली, सूरत और तराई के क्षेत्र की ओर पलायन कर गए। अनुमान है कि इस दौर में 2 लाख से 3.5 लाख के बीच हिंदू पंजाब छोड़कर चले गए। कई ग्रामीण इलाकों में हिंदू आबादी स्थायी रूप से घट गई, और कुछ गांवों में आज भी एक भी हिंदू परिवार नहीं है। जो शुरूआत में धीरे-धीरे हुआ, वह बाद में एक सतत पलायन में बदल गया, जिसने ग्रामीण पंजाब के जनसांख्यिकीय मानचित्र को बदल कर रख दिया। विभाजन या कश्मीरी पंडितों के पलायन के विपरीत, इस विस्थापन का शायद ही कहीं औपचारिक रिकॉर्ड बना। न कोई आधिकारिक शरणार्थी सूची बनी, न कोई मुआवजा दिया गया, और न ही राजनीतिक स्तर पर इसे पहचान मिली। यह पलायन किसी सरकारी आदेश से नहीं, बल्कि केवल भय से प्रेरित था।
इस हिंसा और उससे उपजे पलायन की आर्थिक कीमत बहुत भारी थी। पंजाब की शहरी अर्थव्यवस्था में हिंदू व्यापारी और उद्योगपति एक प्रमुख भूमिका निभाते थे। जैसे-जैसे उग्रवाद बढ़ा, वैसे-वैसे जबरन वसूली आम होती गई। कई उद्योगपतियों का अपहरण किया गया या उनकी हत्या कर दी गई। छोटे कारखाने बंद हो गए। छापेखानों पर हमले हुए। घात लगाकर किए गए हमलों के कारण परिवहन मार्ग असुरक्षित हो गए। नतीजतन, कारोबार पंजाब से बाहर जाने लगे। उद्योग हरियाणा, दिल्ली और गुजरात की ओर स्थानांतरित हो गए, जो पंजाब 1970 के दशक में भारत के सबसे समृद्ध राज्यों में गिना जाता था, वह गिरावट के ऐसे दौर में प्रवेश कर गया, जिससे वह आज तक पूरी तरह उबर नहीं पाया है। इस दौर के राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव भी उतने ही गहरे थे। उग्रवाद ने हिंदू–सिख संबंधों को उस तरह क्षति पहुंचाई, जिस पर आज भी बहुत कम चर्चा होती है। सदियों तक दोनों समुदायों ने पर्व-त्योहार, भाषा और पारिवारिक संबंध साझा किए थे। लेकिन हिंसा और प्रचार के दबाव ने इस आपसी विश्वास को कमजोर कर दिया। हिंदू परिवार सिख पड़ोसियों को संदेह की दृष्टि से देखने लगे, जबकि सिख परिवार उग्रवादियों के कृत्यों के लिए स्वयं को अनुचित रूप से दोषी ठहराए जाने से आहत महसूस करने लगे। जो समुदाय कभी सहजता से साथ रहते थे, वे धीरे-धीरे एक-दूसरे से दूर होने लगे।
हिंसा के कारणों को लेकर कई भ्रमित करने वाले और परस्पर विरोधी दावे भी सामने आए, पुलिस की ज्यादतियों के आरोप, राजनीतिक असफलताओं की बातें और विदेशी हस्तक्षेप के दावे। हिंदू अल्पसंख्यक के लिए संदेह और अनिश्चितता की ये परतें स्थिति को और भी भयावह बना देती थीं। राज्य कभी रक्षक प्रतीत होता था, तो कभी भय का स्रोत। उग्रवादी कभी वैचारिक योद्धा लगते थे, तो कभी साधारण अपराधी। अक्सर यह समझ पाना असंभव होता था कि किस घटना के पीछे कौन है। पंजाब में आतंकवाद के इस काल का दीर्घकालिक परिणाम आज हमारे सामने है। वह है ‘नार्को-आतंकवाद’। पंजाब आज भी इससे जूझ रहा है। 1990 के दशक के मध्य में जब उग्रवाद कमजोर पड़ा, लेकिन तस्करी के रास्ते और आतंकवादी नेटवर्क समाप्त नहीं हुआ, बल्कि उन्होंने बस अपना स्वरूप बदल लिया। राज्य में एक शक्तिशाली नशीली दवाओं की अर्थव्यवस्था उभर आई। इसके सामाजिक दुष्परिणाम, नशे की लत, गैंगवार और ग्रामीण जीवन का पतन-समूचे समाज को प्रभावित करते हैं। लेकिन इसकी जड़ें स्पष्ट रूप से उसी ढांचे में हैं, जो आतंकवाद के दौर में खड़ा हुआ था। इतना सब होने के बाद भी पंजाब के हिंदुओं के अनुभवों पर इतनी कम चर्चा क्यों होती है ? ऐसा इसलिए क्योंकि यह मौजूदा राजनीतिक कथानकों में आसानी से फिट नहीं बैठता। यह इतना संवेदनशील है कि खुले तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, इतना बिखरा हुआ है कि इसे कानूनी दावों में संगठित नहीं किया जा सका, और सिखों की व्यापक पीड़ा के सामने इतना दब गया है कि केंद्र में स्थान नहीं पा सका। लेकिन इतिहास कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है कि किसने अधिक कष्ट सहे। इतिहास तथ्यों का अभिलेख होता है और यदि हमें पंजाब के आतंकवाद को सही से समझना है, तो यह स्वीकार करना होगा कि हिंदू केवल मूक दर्शक नहीं थे वे भी एक ऐसा समुदाय थे, जिसने गहरे, गंभीर और सुनियोजित आतंक का सामना किया।
आज जब पंजाब आर्थिक मंदी, नशीले पदार्थों की समस्या और नए प्रकार के कट्टरपंथ से जूझ रहा है, ऐसे में उसके पूरे अतीत को याद रखना अनिवार्य है न कि सिर्फ उसके चुनिंदा हिस्सों को। 1980 के दशक का सबक बिल्कुल स्पष्ट है, जब किसी भी समुदाय के दुख को नजरअंदाज किया जाता है, तो पूरा समाज कमजोर हो जाता है।
पंजाब का भविष्य पूरी सच्चाई कहने पर निर्भर है न कि सिर्फ अपनी सुविधा अनुसार सच्चाई बताने पर।

Team Desk