साझा विरासत का गुलदस्ता है उर्दू भाषा!

Summary :

उर्दू साझा विरासत और समरसता की भाषा है। यह मज़हब की नहीं, वतन की ज़बान है। उर्दू को अक्सर किसी एक मज़हब से जोड़ दिया जाता है, जबकि हक़ीक़त यह है कि इसकी बुनियाद गंगा-जमुनी तहज़ीब पर है। यह भारत की भाषा है। उर्दू की कई बुनियादी शब्दावलियां जैसे इश्क़, वफ़ा, दर्द, इंसाफ़ ने मज़हब की दीवारें कभी नहीं मानीं। इसी वजह से उर्दू को “किसी एक कौम की नहीं, इंसानियत की ज़बान” कहा जाता है। ग़ालिब, फ़िराक़, फ़ैज़, फ़राज़, राजिंदर सिंह बेदी, मुंशी प्रेम चंद, ब्रज नारायण चकबस्त, पंडित दया शंकर ‘नसीम’, तिलोक चंद ‘महरूम’, आनंद नारायण ‘मुल्ला’, कृष्ण…

उर्दू साझा विरासत और समरसता की भाषा है। यह मज़हब की नहीं, वतन की ज़बान है। उर्दू को अक्सर किसी एक मज़हब से जोड़ दिया जाता है, जबकि हक़ीक़त यह है कि इसकी बुनियाद गंगा-जमुनी तहज़ीब पर है। यह भारत की भाषा है। उर्दू की कई बुनियादी शब्दावलियां जैसे इश्क़, वफ़ा, दर्द, इंसाफ़ ने मज़हब की दीवारें कभी नहीं मानीं।
इसी वजह से उर्दू को “किसी एक कौम की नहीं, इंसानियत की ज़बान” कहा जाता है। ग़ालिब, फ़िराक़, फ़ैज़, फ़राज़, राजिंदर सिंह बेदी, मुंशी प्रेम चंद, ब्रज नारायण चकबस्त, पंडित दया शंकर ‘नसीम’, तिलोक चंद ‘महरूम’, आनंद नारायण ‘मुल्ला’, कृष्ण चंदर, कृष्ण बिहारी नूर आदि हमारी साझा विरासत के ऐसे नाम हैं, जो मुस्लिम और ग़ैर मुस्लिम उर्दू जगत के बड़े नाम हैं। उर्दू के बारे में एक बार जब प्रधानमंत्री को पुस्तक, “अबुल कलाम आज़ाद: चंद शख्सी पहलू “प्रदान की गई तो उन्होंने कहा, “उर्दू तो हमारे दिल में बस्ती है!” उर्दू को अक्सर किसी एक मज़हब से जोड़ दिया जाता है, जबकि हक़ीक़त यह है कि इसकी बुनियाद गंगा-जमुनी तहज़ीब पर है। उर्दू के विकास और समृद्धि में हिंदू शायरों और लेखकों का योगदान बेहद अहम रहा है। उर्दू एक भाषा होने के साथ-साथ, एक तहजीब, परंपरा और प्यार की भाषा भी है, जो भारत की कोख से जन्मी है और हर भारतीय भाषा, क्षेत्र, समाज, धर्म और संस्कृति की सुगंध शामिल है इसमें। यह भारत की आत्मा से जुड़ी भाषा है। यह विकसित भारत की भाषा है। इसी संदर्भ में भारत की राष्ट्रीय उर्दू भाषा परिषद विकास (नेशनल काउंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ उर्दू लैंग्वेज) की अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी इस बात को लेकर हुई कि उर्दू तो अपने जन्म से ही भारत के विकास से जुड़ी हुई है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने उर्दू से जुड़ी सभी संस्थाओं और संस्थानों को अपने राष्ट्र विकास मंत्र, “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास” से जोड़ा है।
राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद के अध्यक्ष, डॉ. शम्स इक़बाल के अनुसार उर्दू में देशहित के अतिरिक्त होली, दीपावाली, दशहरा, मर्यादा पुरुषोत्तम राम, श्री कृष्ण आदि के इकबाल में भी बहुत कुछ लिखा गया है और लिखा जा रहा है। उर्दू के साथ सबसे बड़ी नाइंसाफी यह हुई कि इसे मुसलमानों की भाषा समझ लिया गया और इसके विरुद्ध द्वेष बढ़ता गया। इतनी नफ़रत बढ़ी कि इसे विभाजन और पाकिस्तान बनाने का ज़िम्मेदार तक समझ लिया गया, जो कि बिल्कुल ग़लत है, क्योंकि यदि मुस्लिमों की कोई भाषा है तो। नोट करने की बात यह है कि वह पाकिस्तान, जिसने उर्दू को अपनी राष्ट्रीय भाषा बनाया है, वहां नाम के ही हिंदी भाषी हैं। इसके पूर्व में पंजाबी तो पश्चिम में बलूची का वर्चस्व है तो मध्य-पूर्व में सिंधी बोली जाती है। उर्दू को अपनी भाषा घोषित कर उसके साथ नाइंसाफी की है। संगोष्ठी में उर्दू भाषा का भविष्य, विकसित भारत 2047 को लेकर था, जिसमें उर्दू से जुड़े लेखकों, शायरों, कथाकारों, नाटककारों आदि ने उर्दू के भूत, वर्तमान और भविष्य को विकसित भारत के विषय से बख़ूबी जोड़ा। उर्दू, भले ही बाज़ार में, विज्ञापनों में और रोजगार में आज जगह न बना पाई हो, हां देश वासियों और भारत के अंतर्मन में सटीक रूप से जगह बनाने में सक्षम है, क्योंकि जब-जब और जहां, जहां उर्दू मुशायरे हुए हैं, वहां मुस्लिमों से अधिक हिंदुओं की हाज़िरी होती है। ऐसे ही भारतीय संसद में किसी सांसद को अपनी बात दमदार तरीके से कहनी होती है तो उसे उर्दू शेरों द्वारा कहा जाता है। फिल्मों गीतों और डायलॉग्स में सदियों से उर्दू का बोलबाला रहा है। एक बार विपक्ष की ओर से सरकार पर निशाना साधते हुए सुषमा स्वराज ने उर्दू के लहजे में कहा, “हज़ारों जवाब चाहिए थे, सवाल एक था, सरकार की नीयत क्या है, सवाल एक था!” इस शेर के ज़रिये उन्होंने सरकार की नीतियों और मंशा पर तीखा, लेकिन सुसंस्कृत वार किया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी उसी तहज़ीब और शायरी के अंदाज़ में जवाब दिया। उन्होंने मिर्ज़ा ग़ालिब की पंक्तियों का सहारा लिया “क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हां, रंग लाएगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन!” इस शेर के माध्यम से उन्होंने यह संदेश दिया कि सरकार के फैसले तात्कालिक कठिनाइयों के बावजूद भविष्य में सकारात्मक परिणाम देंगे। यह बहस दिखाती है कि भारतीय संसद में उर्दू भाषा और शायरी की परंपरा कितनी जीवंत रही है। सुषमा स्वराज की वाक्पटुता और मनमोहन सिंह की विद्वत्ता दोनों ने संसद को बौद्धिक ऊंचाई दी। यह टकराव शोर-शराबे का नहीं, बल्कि संवाद और संस्कृति का उदाहरण था।
उर्दू की भारत पर छाप के संबंध में, बकौल, डॉ. ख्वाजा इफ्तिखार अहमद, यह भाषा विकसित भारत की पहचान है। उन्होंने बताया कि 5 विकसित भारत और उर्दू के मेल-जोल और सद्भावना का ही परिणाम है कि उर्दू के पत्र-पत्रिकाओं में श्री कृष्ण, मर्यादा पुरुषोत्तम राम, होली, दीपावली, दशहरा आदि पर खूब लिखा गया है। ईमानदारी की बात तो यह है कि जहां-जहां कोई उर्दू बोलता है, वहां-वहां हिंदुस्तान बोलता है। राजा राम मोहन रॉय, डा. राजेंद्र प्रसाद, पूर्व राष्ट्रपति, शंकर दयाल शर्मा, मुरली मनोहर जोशी आदि सभी मदरसों के छात्र रहे हैं। आज से ही नहीं शुरू से ही उर्दू ने विकसित और सुरक्षित भारत के संदर्भ में भारत के लिए, “चमन”, “गुलज़ार”, “गुलशन”, “बाग-ओ-बहार”, “गुल-ए-बहार” आदि शब्दों से सुसज्जित किया है। आज के दौर में भी उर्दू में भारत की प्रगति को लेकर खूब लिखा जा रहा है।

Team Desk