सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकान्त व न्यायामूर्ति जायमाल्या ने यह कहकर कि मदताता सूचियों का गहन पुनरीक्षण कराने का चुनाव आयोग का अधिकार अनूठा तो है मगर असीमित नहीं है, स्पष्ट कर दिया है कि संविधान में गहन पुनरीक्षण की व्यवस्था है मगर यह पूरी तरह पारदर्शी तरीके से होनी चाहिए और इस प्रकार होनी चाहिए कि किसी भी वैध भारतीय नागरिक मतदाता के साथ पूर्ण न्याय हो सके। यह न्याय न केवल किया जाये बल्कि होता हुआ भी दिखे जिससे भारत का एक भी नागरिक स्वयं को पूरी तरह सन्तुष्ट महसूस करे। देश की सबसे बड़ी अदालत में उस याचिका पर सुनवाई हो रही है जिसमें गहन पुनरीक्षण की संवैधानिकता को चुनौती दी गई है। इस सन्दर्भ में स्वाभाविक प्रश्न यह है कि जब मतदाता सूची बनाने का विशिष्ट अधिकार चुनाव आयोग के पास है तो उसके शुद्धिकरण की जिम्मेदारी भी उसकी है। इस जिम्मेदारी को निभाने के लिए चुनाव आयोग को वह पूरी कसरत करनी होगी जिससे मतदाता सूचियों से अवैध मतदाताओं के नाम निकल सके। इस कवायद को करने के लिए चुनाव आयोग को मतदाताओं की पहचान करनी पड़ेगी और यह सुनिश्चित करना पड़ेगा कि सूची में कोई भी एेसा मतदाता न हो जिसका देहान्त हो गया हो और कोई भी व्यक्ति एक स्थान से अधिक स्थानों पर पंजीकृत न हो। इसके साथ-साथ ही प्रत्येक मतदाता का भारतीय नागरिक होना भी जरूरी है।
जहां तक गहन पुनरीक्षण की संवैधानिकता का सवाल है तो सामान्य मोटी बुद्धि कहती है कि कोई भी वह कार्य किस प्रकार असंवैधानिक हो सकता है जिसका अधिकार संविधान ही चुनाव आयोग को देता है। हालांकि इस बारे में संसद के पिछले सत्र में खुलकर बहस हो चुकी है मगर इस बहस के बावजूद यह सत्य निकल कर बाहर नहीं आ सका कि गहन पुनरीक्षण कानून के किस नजरिये से अंसवैधानिक कहलाया जा सकता है। इसी बारे में सर्वोच्च न्यायालय में अब तर्क-वितर्क देश के माने हुए कानूनविद कर रहे हैं जिसके बाद ही न्यायालय अपना अन्तिम फैसला देगा। बेशक यह कानून की पेचीदगियों का मामला है मगर इतना साफ है कि कानून सभी के साथ प्राकृतिक न्याय के पक्ष में होता है अतःपुनरीक्षण में हर उस नागरिक के साथ न्याय होना चाहिए जो पहले से मतदाता था मगर पुनरीक्षण के दौरान उसने अपना निवास बदल लिया है अथवा वह पलायन करके किसी अन्य स्थान पर जा बसा है। इस मामले में अभी तक देश के जिन 13 राज्यों (बिहार समेत) में पुनरीक्षण की प्रक्रिया चल रही है या पूरी हुई है उसमें चुनाव आयोग ने छह करोड़ के लगभग मतदाताओं के नाम सूचियों से काटे हैं जिससे साफ होता है कि मतदाता सूचियों में भारी अशुद्धियां थीं। मगर इसके साथ-साथ यह भी सच है कि बहुत से एेसे जायज लोगों के नाम भी सूचियों से कट गये हैं जो चुनाव आयोग द्वारा मांगे गये प्रामाणिक प्रपत्रों की शर्तों को किसी वजह से पूरा नहीं कर सके। अतः एेसे लोगों को भारत का संविधान मताधिकार से वंचित नहीं करता है क्योंकि संविधान में प्रत्येक नागरिक को मिला मत देने का एेसा सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक अधिकार है जिस पर भारत का पूरा लोकतंत्र टिका हुआ है। यह अधिकार ही भारत के प्रत्येक नागरिक को बराबरी का हक देकर तय करता है कि उसके मत से ही इस देश की सरकारों का गठन होगा और वे ही देश का शासन चलायेगी। मतदाता की इस लोकतान्त्रिक भागीदारी को सहभागिता का लोकतन्त्र कहा गया क्योंकि इसमें मतदाता की सत्ता में सीधे भागीदारी होती है और वह ही इस देश का भाग्यविधाता कहा जाता है। यदि एेसा न होता तो हर पांच साल बाद इस देश के प्रधानमन्त्री से लेकर साधारण विधायक तक को जनता की अदालत में वोट मांगने न जाना पड़ता और अपने किये गये कार्यों का हिसाब-किताब न देना पड़ता।
वास्तव में वोट का हक ही भारतीय नागरिक को इस मुल्क का राजा बनाता है और उसे ही लोकतन्त्र का असली मालिक बनाता है। मतदाता का यह अधिकार सार्वभौमिक होता है जिसकी व्यवस्था संविधान में ही की गई है। इसके साथ ही मतदाता को भारतीय लोकतन्त्र स्वयंभू भी बनाता है क्योंकि चुनावों के समय उस पर कोई भी राजनीतिक दल या प्रत्याशी किसी प्रकार का दबाव नहीं बना सकता है। उसका मत गुप्त रहता है जिससे उसकी राजनीतिक इच्छा शक्ति का प्रदर्शन होता है और फिर उसी के अनुसार देश में राजनीतिक सरकारों का गठन होता है मगर ये सरकारें केवल संविधान के अनुसार ही काम करती हैं, चाहे वे किसी भी राजनीतिक दल की हों। इसीलिए कहा जाता है कि भारत में संविधान का शासन चलता है। इस सन्दर्भ में हम मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण के कार्य की संवैधानिकता को परख सकते हैं और समझ सकते हैं कि यह प्रश्न भारत के लोकतन्त्र के लिए कितना महत्वपूर्ण है। इस वजह से सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों का यह कहना कि पुनरीक्षण का कार्य पारदर्शी तरीके से और प्राकृतिक न्याय को सर्वोपरि रखते हुए होना चाहिए, बहुत महत्वपूर्ण है। हमें यह विचार करना होगा कि आजादी के 78 वर्षों के बाद हमने चहुं दिशा में जितनी भी तरक्की की है वह इसी व्यवस्था के तहत की है जिसमें भारत के मतदाताओं का विशिष्ट योगदान है क्योंकि समय की मांग के अनुसार इन्होंने अपनी राजनीतिक इच्छा शक्ति का प्रदर्शन करके विभिन्न दलों की सरकारों का गठन किया जिन्होंने भारत को आगे बढ़ाने का काम किया है। जहां तक गहन मतदाता सूची पुनरीक्षण का सवाल है तो स्वतन्त्र भारत के दौरान यह प्रक्रिया बार-बार हो चुकी है जिसकी मान्यता वह कानून जनप्रतिधित्व अधिनियम ही देता है जिसके तहत चुनाव आयोग का गठन हुआ है। अब सवाल इतना सा है कि जो भी पुनरीक्षण हो उसमें से किसी भी जायज भारतीय मतदाता का नाम न काटा जाये। इसे ही हम प्राकृतिक न्याय भी कहेंगे अतः चुनाव आयोग को एेसी प्रक्रिया अपनानी पड़ेगी जो पूरी तरह पारदर्शी हो और भारत के हर मतदाता को सन्तोष प्रदान करने वाली हो।
पारदर्शी मतदाता सूची
Summary :
सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकान्त व न्यायामूर्ति जायमाल्या ने यह कहकर कि मदताता सूचियों का गहन पुनरीक्षण कराने का चुनाव आयोग का अधिकार अनूठा तो है मगर असीमित नहीं है, स्पष्ट कर दिया है कि संविधान में गहन पुनरीक्षण की व्यवस्था है मगर यह पूरी तरह पारदर्शी तरीके से होनी चाहिए और इस प्रकार होनी चाहिए कि किसी भी वैध भारतीय नागरिक मतदाता के साथ पूर्ण न्याय हो सके। यह न्याय न केवल किया जाये बल्कि होता हुआ भी दिखे जिससे भारत का एक भी नागरिक स्वयं को पूरी तरह सन्तुष्ट महसूस करे। देश की सबसे बड़ी अदालत…


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