उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा की ज्यादातर सोसायटी में मिलने वाले फ्लैट्स की कीमत करोड़ों रुपये में है। मेगा सिटी की तर्ज पर बसाया गया यह शहर आज भी बदहाली की मार झेल रहा है। बारिश में इस शहर की सड़कों पर पानी भर जाता है तो अब बिना बारिश के ही एक युवा इंजीनियर ‘सिस्टम की गलती’ से भरे पानी में डूबकर अपनी जान गंवा बैठा। आलम ऐसा था कि पुलिस को पता था, प्रशासन को पता था, आपदा में मदद पहुंचाने के लिए बने एसडीआरएफ और एनडीआरएफ को भी पता था लेकिन सड़क से चंद फीट दूर भरे पानी में एक युवा डूब गया और सिस्टम अपनी ही चाल चलता रह गया। नोएडा की घटना से दिल्ली-एनसीआर में प्रशासनिक लापरवाही पर सवाल उठे हैं। खुले नाले, खराब ड्रेनेज और सड़क सुरक्षा की अनदेखी से हाल के वर्षों में जानलेवा हादसे हुए हैं। दिल्ली में जनवरी 2024 से दिसम्बर 2025 के बीच 80 मौतें केवल डूबने से हुई हैं लेकिन इस घटना ने सोये सिस्टम का खामियाजा इंजिनियर को भुगतना पड़ा।
सिस्टम की इस कछुआ चाल का नतीजा यह है कि एक पिता ने अपना बेटा खो दिया है और वह न्याय की गुहार लगा रहा है। न्याय के नाम पर कुछ अफसरों के तबादले हो गए, कुछ को हटा दिया गया और लीपापोती शुरू हो गई। पानी से भरे गड्ढे में डूब रहे युवक को बचाने के लिए डिलीवरी ब्वाॅय मोनिंदर ने तो जान की बाजी लगा दी लेकिन मौके पर मौजूद प्रशासन मूकदर्शक बना रहा। चौंकाने वाली बात यह है कि इसी जगह 15 दिन पहले भी हादसा हुआ था, मगर अथॉरिटी ने कोई सबक नहीं लिया। अब सरकार ने नोएडा प्राधिकरण के सीईओ को हटाने और घटना की जांच के लिए एक विशेष टीम गठित करने का आदेश दिया है। किसी मामले के तूल पकड़ने के बाद सरकारी तंत्र की नींद जरूर खुलती है लेकिन तब तक किसी निर्दोष की जान जा चुकी होती है। मोनिंदर का आरोप है कि जब वह मौके पर पहुंचे तब तक प्रशासन के लोग वहां मौजूद थे। युवराज कार की छत पर लेटा हुआ था और मोबाइल की टॉर्च जलाकर मदद की गुहार लगा रहा था। मोनिंदर बताते हैं, ‘फायर ब्रिगेड की टीम के पास सीढ़ी थी, सेफ्टी जैकेट थी लेकिन वे किनारे बैठकर इंतजार कर रहे थे। उन्होंने मुझसे पानी में उतरने को कहा और मैं कूद गया लेकिन वे पहले से वहां थे, उन्होंने कोशिश क्यों नहीं की?’हैरानी की बात यह है कि इसी गड्ढे में करीब दो हफ्ते पहले भी एक ट्रक गिर गया था। उस समय भी मोनिंदर ने ही ट्रक ड्राइवर गुरिंदर की जान बचाई थी। गुरिंदर बताते हैं, ‘इलाके में कोई रिफ्लेक्टर नहीं है। मेरा ट्रक गड्ढे में गिरा तो मुझे लगा नीचे जमीन है लेकिन मैं सीधे पानी में जा गिरा। मोनिंदर ने रस्सी के सहारे मुझे बाहर निकाला, जब हमने नोएडा अथॉरिटी से मदद मांगी तो उन्होंने उल्टा मुझ पर ही दीवार तोड़ने का आरोप लगा दिया।’इससे ज्यादा अफसोसनाक और क्या हो सकता है कि पानी से भरे गड्ढे में अपनी कार के साथ फंसा एक युवक करीब डेढ़ घंटे तक मोबाइल की रोशनी के साथ जान बचा लेने की गुहार लगाता रहा और मौके पर मौजूद राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल तथा दमकल विभाग का दल वहीं खड़ा अपनी लाचारगी का रोना रोता रहे। बचाव दल के पास तैराक और पर्याप्त वैकल्पिक संसाधन नहीं थे।
जाहिर है, युवक की मौत की मुख्य वजह हादसे के बजाय संबंधित महकमों की घोर लापरवाही, बचाव दल की अक्षमता और अपर्याप्त संसाधन थी। यह कल्पना भी तकलीफदेह है कि किसी आपदा या आपात स्थिति में त्वरित प्रतिक्रिया के साथ ज्यादा से ज्यादा इंसानी जान को बचाने के लिए गठित दलों की मौजूदगी के बावजूद एक युवक की जान नहीं बचाई जा सकी। इस घटना में यह साफ देखने को मिला है कि हर संस्था ने अपने-अपने तर्क या यूं कहें कि बहाने गिना दिए। पुलिस ने कह दिया कि उसके लोगों को तैरना नहीं आता, फायर ब्रिगेड ने कह दिया कि उसके पास नाव नहीं थी और एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीम को तो आने में ही देरी लग गई। ऐसे में सवाल उठते हैं कि अगर करोड़ों खर्च करके कोई शख्स इन शहरों में रहने आया है तो क्या वह इन बहानों के सहारे ही जिएगा? क्या ऐसे हादसे होने पर नोएडा के लोगों को न्याय के नाम पर सिर्फ बहाने मिलेंगे? गौतमबुद्ध नगर को प्रदेश के साथ-साथ देश का हाईटेक जिला माना जाता है। जिला प्रशासन की ओर से हर साल डीडीएमए की योजना तैयार की जाती है। हर आपदा से निपटने की कार्ययोजना तैयार की जाती है लेकिन इंजीनियर बचाने में संसाधनों की कमी देखने को मिली है। एसआईटी की टीम को मौके पर काफी खामियां मिली लेकिन अफसर बचाव करते नजर आए। टीम ने पूछा कि भूखंड में पानी कहां से आया तो प्राधिकरण के अफसरों ने बारिश का पानी बता दिया लेकिन टीम को जवाब रास नहीं आया और कहा कि बारिश का पानी तो कब का सूख गया होगा। यह घटना नोएडा अथॉरिटी की बड़ी लापरवाही को उजागर करती है। यह सड़क 10-12 साल से ऐसी ही है। सेक्टर-150 की सारी सोसाइटियों का वेस्ट वॉटर यहीं इकट्ठा होता है लेकिन अथॉरिटी ने कभी ध्यान नहीं दिया। अब घटना के बाद बैरिकेट और पत्थर लगाए जा रहे हैं लेकिन पहले क्यों नहीं? स्थानीय निवासियों में भारी रोष है कि आखिर विकास के नाम पर खोदे गए इन ‘मौत के कुओं’ का जिम्मेदार कौन है?लोगों का कहना है कि घटना के अगले दिन भी किसी उच्च अधिकारी ने मौके पर पहुंचना जरुरी नहीं समझा लेकिन जब मामला अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर छा गया तो अफसर तीसरे दिन मौके पर पहुंचे।
युवराज मरा नहीं सिस्टम ने मारा
Summary :
उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा की ज्यादातर सोसायटी में मिलने वाले फ्लैट्स की कीमत करोड़ों रुपये में है। मेगा सिटी की तर्ज पर बसाया गया यह शहर आज भी बदहाली की मार झेल रहा है। बारिश में इस शहर की सड़कों पर पानी भर जाता है तो अब बिना बारिश के ही एक युवा इंजीनियर ‘सिस्टम की गलती’ से भरे पानी में डूबकर अपनी जान गंवा बैठा। आलम ऐसा था कि पुलिस को पता था, प्रशासन को पता था, आपदा में मदद पहुंचाने के लिए बने एसडीआरएफ और एनडीआरएफ को भी पता था लेकिन सड़क से चंद फीट दूर भरे…


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