भारत ने हमेशा युद्ध संकट का समाधान संवाद और कूटनीति से करने का समर्थन किया है। भारत ने हमेशा समूचे विश्व को शांति का संदेश देते हुए बार-बार कहा है कि यह समय युद्ध का नहीं, भगवान बुद्ध के दिखाए मार्ग का अनुसरण करने का है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के साथ शांतिवार्ता की पहल करने और 5 दिन की युद्ध विराम की घोषणा करने के तुरन्त बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को फोन घुमाया और पश्चिम एशिया संघर्ष और होर्मुज को लेकर चर्चा की। ट्रम्प की इस पहल से स्पष्ट है कि वे पश्चिम एशिया के संकट को सुलझाने के लिए भारत को एक विश्वसनीय मित्र के रूप में देख रहे हैं। शायद ट्रम्प को इस बात का अहसास है कि ईरान के साथ युद्ध विराम को सफल बनाना है और तेल की सप्लाई निर्बाध रूप से जारी रखनी है तो भारत की भूमिका सबसे अहम है। ट्रम्प के शांति संकेत देते ही विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से बातचीत की थी। उसके बाद ट्रम्प की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से बातचीत हुई। इस कूटनीतिक टाइमिंग के पीछे भारत ने बहुत ही सतर्कता और सूझबूझ से काम लिया। जब अमेरिका ईरान के बिजली संयंत्रों और बुनियादी ढांचों को तबाह करने पर आमादा था तब भारत ने वाशिंगटन के सुर में सुर मिलाने से परहेज किया। इसका सीधा कारण यह है कि ईरान के साथ भारत के गहरे ऐतिहासिक, आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं। भारत ईरान के चाबहार पोर्ट का संचालन कर रहा है, जो मध्य एशिया तक पहुंचने के लिए भारत का ‘गेटवे’ है। इसके अलावा, खाड़ी देशों में लाखों भारतीय काम करते हैं। यदि भारत युद्ध के चरम पर अमेरिका का खुला समर्थन करता तो क्षेत्र में उसके अपने हित खतरे में पड़ जाते। नई दिल्ली शुरू से ही कूटनीति और संवाद के जरिए तनाव कम करने का पक्षधर रहा है, न कि बमबारी का। इसलिए जब तक युद्ध के बादल सबसे ज्यादा घने थे, भारत ने पेंटागन की युद्ध नीतियों से खुद को अलग रखा।
डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा किया है कि ईरान ने अमेरिका को एक बहुत बड़ा तोहफा दिया है। यद्यपि उन्होंने विस्तार से बताने से साफ इंकार किया लेकिन ऐसे संकेत हैं कि यह तोहफा तेल और गैस से जुड़ा हुआ है। उनके इस बयान के बाद अटकलें तेज हो गई हैं कि क्या अमेरिका और ईरान के बीच कोई सीक्रेट डील हुई है। आखिर यह तोहफा है क्या जिसने अमेरिका को जंग रोकने की दिशा में इतना बड़ा कदम उठाने को मजबूर कर दिया है। युद्ध के दौरान कई तरह की बयानबाजी की जाती है, जिन पर भरोसा करना मुश्किल होता है। अब सवाल यह है कि क्या पर्दे के पीछे ईरान और अमेरिका में कोई बातचीत चल रही है। यह भी वास्तविकता है कि ट्रम्प युद्ध के दलदल में बुरी तरह से फंस चुके हैं और वह निकलने के रास्ते तलाश रहे हैं। इस युद्ध में अमेरिका को रोजाना 1.38 अरब डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं और 25 दिन की जंग में अमेरिका लगभग 20 अरब डॉलर खर्च कर चुका है। पैंटागन ने 200 अरब डॉलर से अधिक की राशि और मांगी है। इसे अमेरिकी कांग्रेस यानि संसद से पारित कराना होगा, जिसके पारित होने की उम्मीद कम है। यद्यपि ट्रम्प ने नाटो और यूरोपीय देशों को कायर और कागजी शेर कहा। इसके बावजूद नाटो और सहयोगी देश उनके साथ नहीं आए। किसी ने युद्धपोत नहीं भेजे। कतर में एलएनजी सप्लाई बंद होने से यूरोप में गैस की कीमतें 35 प्रतिशत बढ़ गईं। जापान तक को अपना रणनीतिक भंडार निकालना पड़ा। 9 देशों में 40 ऊर्जा भंडार युद्ध से प्रभावित हुए हैं। वैश्विक तेल आपूर्ति रोजाना 11 मिलियन बैरल घटी है। 66 प्रतिशत अमेरिकी इस युद्ध के खिलाफ हैं और ट्रम्प की लोकप्रियता घटी है।
ट्रम्प का यूटर्न इस बात का संकेत है कि वह युद्ध रोकने के पक्षधर हैं लेकिन इजराइल बेलगाम गुंडे की तरह व्यवहार कर रहा है। ईरान और लेबनान पर लगातार हमले कर रहा है और ईरान भी अपनी मिसाइलों से तेल अवीव से लेकर यरुशलम तक तबाही मचा रहा है। ईरान ने खाड़ी देशों में अमेरिकी ठिकानों पर लगातार हमले कर पूरी दुनिया को चौंका दिया है। ईरान ट्रम्प के बातचीत के दावों को पूरी तरह से नकार रहा है लेकिन ईरान के राष्ट्रपति द्वारा रखी गई शर्तों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कूटनीतिक गलियारों से छन-छन कर जो खबरें आ रही हैं उनके अनुसार ईरान ने भविष्य में आक्रामकता के खिलाफ गारंटी, बुनियादी ढांचे को हुए नुक्सान की भरपाई और ईरान के वैध अधिकारों की मान्यता शामिल है। ट्रम्प प्रशासन ने ईरान के तेल पर लगे प्रतिबंधों में एक महीने की ढील दी है। जबकि ईरान का कहना है कि उसके पास अतिरिक्त तेल है ही नहीं तो ढील का कोई मतलब ही नहीं है। यद्यपि तुर्की और मिस्र ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता कर रहे हैं लेकिन मध्यस्थता के खेल में पाकिस्तान का शामिल होना काफी अखरता है।
पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष आसिम मुनीर उछल-उछलकर बातें कर रहे हैं। आठ-आठ युद्धों को रुकवाने का दावा करने वाले डोनाल्ड ट्रम्प खुद मध्यस्थ की तलाश में जुटे हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ईरान युद्ध में मध्यस्थ की भूमिका निभाने की बात कही है। ईरान के खिलाफ एक लम्बे और महंगे युद्ध का खतरा, तेल की कीमतों में तेज उछाल, गैस संकट और अन्तर्राष्ट्रीय सहयोगियों के दबाव के कारण ट्रम्प अब स्वयं कायर दादा के तौर पर छवि बना चुके हैं। किसी भी राजनयिक प्रयास को आगे बढ़ाने के लिए ट्रम्प को पहले अपने सहयोगी इजराइल पर लगाम लगानी होगी। इजराइल द्वारा अपनाया गया सैन्य मार्ग स्पष्ट रूप से अपनी सीमाएं दिखा रहा है। ट्रम्प के लिए सबसे कम नुक्सानदेह रास्ता ईरान के साथ संवाद कायम कर युद्ध से बाहर निकलना ही दिखाई देता है। उम्मीद कायम है कि कूटनीति के द्वार खुुलेंगे और पश्चिम एशिया में शांति का माहौल कायम होगा। आने वाले दिनों में भारत भी शांति प्रयासों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। देखना होगा बातचीत किस दिशा में जाती है।
दलदल में ट्रम्प
Summary :
भारत ने हमेशा युद्ध संकट का समाधान संवाद और कूटनीति से करने का समर्थन किया है। भारत ने हमेशा समूचे विश्व को शांति का संदेश देते हुए बार-बार कहा है कि यह समय युद्ध का नहीं, भगवान बुद्ध के दिखाए मार्ग का अनुसरण करने का है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के साथ शांतिवार्ता की पहल करने और 5 दिन की युद्ध विराम की घोषणा करने के तुरन्त बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को फोन घुमाया और पश्चिम एशिया संघर्ष और होर्मुज को लेकर चर्चा की। ट्रम्प की इस पहल से स्पष्ट है कि वे पश्चिम एशिया के संकट को सुलझाने…


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