ट्रंप का ट्रंप कार्ड

Summary :

कोरोना महामारी से निपटने में पूरी तरह विफल रहे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीन कार्ड और विदेशियों को मिलने वाले वर्क वीजा एच-वन बी पर लगी पाबंदियों को वर्ष के अंत तक के लिए बढ़ा दिया है।

कोरोना महामारी से निपटने में पूरी तरह विफल रहे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीन कार्ड और विदेशियों को मिलने वाले वर्क वीजा एच-वन बी पर लगी पाबंदियों को वर्ष के अंत तक के लिए बढ़ा दिया है। व्हाइट हाउस ने कहा है कि इस कदम से अमेरिकी लोगों के लिए नौकरी के अवसर बढ़ेंगे। वीजा पर पाबंदी के चलते 5,25,000 नौकरियां अमेरिकियों को उपलब्ध होंगी। 
कोरोना वायरस के चलते अमेरिका में दो करोड़ से ज्यादा लोगों की नौकरियां चली गई हैं। इन लोगों ने बेरोजगारी भत्ते की मांग की है। ग्रीन कार्ड अमेरिका में कानूनी तौर पर रहने और काम करने का अधिकार देता है, साथ ही यह अमेरिका का नागरिक बनने का मौका भी देता है। अगर किसी के पास एच-वन वीजा है और उसकी नौकरी चली जाती है तो उसे नई नौकरी ढूंढने के लिए 60 दिन का समय मिलता है। 
अगर उसे नई नौकरी नहीं मिलती तो उसे अपने देश वापस जाना पड़ता है। जब से ट्रंप सत्ता में आए हैं वे संरक्षणवादी नीतियां अपना रहे हैं। अमेरिका बहुत शक्तिशाली मुल्क है। विश्व के मानचित्र पर एक ऐसा देश है जिसके एक इशारे पर दुनिया में शक्ति का संतुलन बिगड़ता भी और बनता भी है। अमेरिका के नागरिक स्वयं को विश्व का श्रेष्ठतम नागरिक मानते हैं और उसके लिए अपने हित सर्वोपरि हैं। ट्रंप शुरू से ही इमिग्रेशन से जुड़े कानूनों को सख्त बनाने की बात करते रहे हैं। 
वर्ष 2016 के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान अप्रवासन का मुद्दा काफी गर्म रहा था और उस वक्त पद के उम्मीदवार और बाद में राष्ट्रपति बने डोनाल्ड ट्रंप ने गैर कानूनी अप्रवासन को खत्म करने पर काफी जोर दिया था और बार-बार मैक्सिको से लगी सीमा पर दीवार बनाने की बात की थी। कोरोना काल ने उन्हें अप्रवासन के मुद्दे पर सख्ती करने का मौका दे दिया है। एच-वन बी वीजा पर प्रतिबंध की अवधि बढ़ाने फैसला कोरोना को ध्यान में रखकर किया गया है लेकिन ट्रंप द्वारा उठाया गया कदम राजनीति से प्रेरित है। राष्ट्रपति  चुनावों की कवायद शुरू हो चुकी है। 
यह फैसला उनके राजनीतिक पैकेजिंग का हिस्सा है जो ​पिछले चुनावों को इस चुनाव की कड़ी से जोड़ता है। ट्रंप सरकार के इस फैसले से सर्वाधिक भारतीय प्रभावित होंगे। पिछले वर्ष एच-वन वीजा की 85 हजार खाली जगहों के लिए लगभग 2 लाख 25 हजार आवेदन आए थे। टेक कम्पनियों में काम करने वाले हजारों भारतीय हर साल एच-वन वीजा के लिए आवेदन करते हैं। इससे भारतीय प्राेफैशनल पर गम्भीर असर होगा। 
इसका असर भारतीयों के निजी जीवन पर भी पड़ेगा। जिन महिलाओं के पति अमेरिका में काम करते हैं, वे वहां जाने को तैयार थीं, लेकिन अब उन्हें भारत में ही रहना होगा। अगर यह फैसला नए वर्ष में भी जारी रहता है तो भारतीय कम्पनियों पर इसका असर ज्यादा होगा। स्किल्ड वर्करों के लिए एच-वन वीजा, कम्पनी के भीतर कर्मचारियों के ट्रांसफर वाले एल-वन वीजा, एकेडमिक और रिसर्चरों के लिए जे वीजा और सीजनल वर्करों के लिए एच-2 बी वीजा पर इसका असर होगा। 
अमेरिकी सरकार का सबसे अधिक सैलरी के आधार पर एच-वन वीजा देने का तर्क भी सही नहीं है। वो छात्र जो यहां एमएस या पीजी कोर्स करते हैं, उनके लिए अधिक सैलरी वाली जॉब पाना मुश्किल है। आईटी कम्पनियों ने तो ट्रंप से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने को कहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले का असर अमेरिका पर भी पड़ेगा क्योंकि इस देश के पास जरूरी ​स्किल वाले लोग नहीं हैं। ट्रंप ने वोटरों को ध्यान में रखकर फैसला लिया है। 
अमेरिका के लोग बेरोजगार इसलिए हुए क्योंकि कोरोना महामारी के चलते वहां मैन्यूफैक्चरिंग बंद हो गई है, वे हाई एंड टैक्नोलॉजी के फील्ड में नहीं हैं। नौकरी आधारित ग्रीन कार्ड की इंतजार में दस लाख लोग लगे हुए थे और 2030 तक यह लाइन काफी लम्बी हो जाएगी। इन दस लाख लोगों में 75 फीसदी भारतीय हैं। इस आदेश से हजारों भारतीयों की उम्मीदों को झटका लगा है। राष्ट्रपति ट्रंप पर आरोप लग रहे हैं कि कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई में बहुत देर से जागे, जिस कारण बड़ी संख्या में लोगों की टैस्टिंग नहीं हो पाई। 
ट्रंप इन आरोपों से इंकार करते हैं और कह रहे हैं कि जितना अच्छा काम उन्होंने किया वह कोई और कर ही नहीं सकता। चुनावों को देखते हुए ट्रंप ने अपना ट्रंप कार्ड चल दिया है, देखना होगा वीजा मुद्दे पर उनके प्रतिद्वंद्वी क्या रवैया अपनाते हैं। फिलहाल भारतीय समुदाय में खलबली मची हुई है। चीन के साथ तनाव में अमेरिका भारत के साथ जरूर खड़ा है लेकिन ट्रंप की घरेलू नीतियां और संरक्षणवादी नीतियों से भारत को झटका लग रहा है। 
अमेरिका की प्रगति के पीछे अप्रवासियों का ही हाथ है। ट्रंप सरकार का फैसला ऐसे समय आया है जब अमेरिका में कोरोना वायरस के खिलाफ  लड़ाई में विदेशी डाक्टर, सर्जन, नर्सेज, हैल्थ वर्कर्स की महत्वपूर्ण भूमिका है। लोगों का स्वास्थ्य और उनका ध्यान रखने में, उन्हें भोजन खिलाने में करीब 60 फीसदी इमिग्रेंटस वर्कर्स, काम करने वाले सफाई कर्मचारी, ग्रोसरी की दुकानों में काम करने वाले और खेतों में काम करने वालों की एक बड़ी संख्या विदेश से यहां आती है। बड़ी कम्पनियों का कहना है​ कि अमेरिका ने दोबारा आर्थिक प्रगति की राह पर वापस आने को खतरे में डाल दिया है। देखना होगा कि ट्रंप का ट्रंप कार्ड कितना सफल रहता है।
आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com

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