यूपी में योगी आदित्यनाथ का ‘य़ू एस पी’

Summary :

अगले वर्ष पंजाब, उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश आदि जिन राज्यों में भी विधानसभा चुनाव होने हैं उनमें उत्तर प्रदेश का महत्व सर्वाधिक है क्योंकि यह देश का सबसे बड़ा राज्य है और राष्ट्रीय राजनीति भी इसके चारों तरफ घूमती रही है। देश को सर्वाधिक प्रधानमन्त्री भी इसी राज्य ने दिये हैं। राजनैतिक क्षेत्रों में विधानसभा चुनावों को 2029 के लोकसभा चुनावों का सेमीफाइनल भी कहा जा रहा है जो कि किसी भी मायने में तार्किक नहीं है क्योंकि राष्ट्रीय चुनावी मुद्दों और राज्य के चुनावी मुद्दों में जमीन-आसमान का अन्तर होता है। राज्य में पिछले दस साल से भारतीय जनता…

अगले वर्ष पंजाब, उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश आदि जिन राज्यों में भी विधानसभा चुनाव होने हैं उनमें उत्तर प्रदेश का महत्व सर्वाधिक है क्योंकि यह देश का सबसे बड़ा राज्य है और राष्ट्रीय राजनीति भी इसके चारों तरफ घूमती रही है। देश को सर्वाधिक प्रधानमन्त्री भी इसी राज्य ने दिये हैं। राजनैतिक क्षेत्रों में विधानसभा चुनावों को 2029 के लोकसभा चुनावों का सेमीफाइनल भी कहा जा रहा है जो कि किसी भी मायने में तार्किक नहीं है क्योंकि राष्ट्रीय चुनावी मुद्दों और राज्य के चुनावी मुद्दों में जमीन-आसमान का अन्तर होता है।
राज्य में पिछले दस साल से भारतीय जनता पार्टी की सरकार है जिसके मुखिया योगी आदित्यनाथ हैं। 2017 में मुख्यमन्त्री पद संभालने के बाद योगी जी ने पिछले 27 सालों से चली आ रही उत्तर प्रदेश की राजनीति को जातिगत समीकरणों के दल- दल से बाहर खींच कर हिन्दुत्व वादी कलेवर में रंगने में सफलता प्राप्त की। 1989 में कांग्रेस पार्टी के नेता स्व. नारायण दत्त तिवारी के बाद उनकी पार्टी राज्य की राजनीति से हाशिये पर खिसकती चली गई और राज्य में बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी व भाजपा के बीच सत्ता की रसाकशी शुरू हुई। इन कुल 37 सालों में राज्य के लोगों ने केवल इन तीन पार्टियों के बीच की ही मिली- जुली या एकल सरकारें देखी मगर राजनीति की धुरी हिन्दुत्व बनाम जातिगत –अल्पसंख्यक समीकरण ही रहे।
इस राजनीति में सुशासन कहीं पंख लगाकर उड़ गया। मगर योगी आदित्यनाथ ने इसी सुशासन को अपनी सत्ता का मूलाधार बनाने में कामयाबी हासिल की जिसकी वजह से यही सुशासन उनके शासन का आधार भूत अंग या ‘यूएसपी’ बन गया। इसकी सबसे बड़ी वजह यह रही कि 2017 से पहले राज्य में समाजवादी पार्टी के नेता श्री अखिलेश यादव की बहुमत की सरकार थी।
सुशासन का गहरा सम्बन्ध कानून-व्यवस्था से होता है। अखिलेश बाबू के शासन में जिस प्रकार उनकी पार्टी के दबंग लोगों ने अल्पसंख्यक वर्ग के प्रभावी लोगों के साथ मिल कर प्रदेश के पुलिस थानों को पार्टी दफ्तरों में बदलने की कोशिश की उससे राज्य के आम लोगों में बहुत गलत संदेश गया जिसका परिणाम यह हुआ कि 2017 के चुनावों में भाजपा को 403 सदस्यीय विधानसभा में तीन-चौथाई बहुमत तब मिला जबकि कांग्रेस पार्टी के नेता श्री राहुल गांधी ने भी अखिलेश बाबू के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। परन्तु हमने 2024 के लोकसभा चुनाव में देखा कि किस प्रकार इन्हीं दोनों नेताओं की जोड़ी ने पूर्वी उत्तर प्रदेश व अवध के इलाकों में भारतीय जनता पार्टी को जबरदस्त पटखनी दी और राज्य की 80 सीटों में से 43 सीटों पर कब्जा किया। मगर यह जीत कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय स्तर और उसके विमर्श की वजह से ज्यादा हुई थी। इस पार्टी के नेता श्री राहुल गांधी ने संविधान बचाओ का आख्यान खड़ा किया और जातिवादी जनगणना कराने का नारा बुलंद किया जबकि अखिलेश बाबू ने आरक्षण बचाओ के आख्यान पर बल दिया जिसकी वजह से राष्ट्रीय फलक पर यह विमर्श कारगर साबित हुआ और जातिगत सीमाएं टूटी व हिन्दुत्व के बोध का असर पिछड़ी व दलित जातियों में नगण्य रहा। मगर यह सब राष्ट्रीय राजनीति के सन्दर्भ में था।
जहां तक राज्य स्तर का प्रश्न है तो श्री योगी का सुशासन व कानून-व्यवस्था का यूएसपी आज भी कायम है और जनता में योगी जी के लोकप्रिय होने का मुख्य कारण भी यही है। बेशक यह माना जा सकता है कि राजनीतिक पटल पर श्री राहुल गांधी की लोकप्रियता समाज के सभी वर्गों के बीच लगातार बढ़ रही है मगर क्या अखिलेश बाबू के बारे में भी एेसा विश्वास के साथ कहा जा सकता है? उनके साथ उनके 2012 से लेकर 2017 तक के शासन की विसंगतियां जुड़ी हुई हैं जिसकी वजह से आगामी चुनावों में कांग्रेस व समाजवादी पार्टी का गठबन्धन लोगों के दिमाग में कहीं आशंका पैदा करता है। इसका एक कारण यह भी है कि इस गठबन्धन में कांग्रेस के छोटा हिस्सेदार होने की बात कही जा रही है। जबकि 1989 के बाद से 40 वर्ष तक के लोगों ने प्रदेश में कांग्रेस का शासन देखा ही नहीं है। इसलिए योगी जी के खिलाफ यदि अखिलेश बाबू को प्रत्यक्ष रूप से प्रत्याशी बनाया जाता है तो पुनः उत्तर प्रदेश का समाज जातिगत समीकरणों में विभक्त होने को मजबूर हो जायेगा। जबकि जमीनी हकीकत यह है कि राज्य का अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय एकमुश्त रूप से कांग्रेस पार्टी के पीछे खड़ा हुआ है क्योंकि श्री राहुल गांधी ने ही इस समुदाय के साथ की जा रही राजनैतिक बेरुखी का मुख मोड़ा है और दलित समाज भी कांग्रेस की तरफ मुड़ने को आतुर दिखाई देता है।
अतः एेसे माहौल में भाजपा की हिन्दुत्व की राजनीति का मुकाबला कांग्रेस की राजनीति से ज्यादा होगा जबकि चुनावों में ज्यादातर स्थानों पर उसका मुकाबला समाजवादी पार्टी से होगा। अतः चुनावों में पुनः श्री योगी की जीत से कैसे इनकार किया जा सकता है। जहां तक जातिगत गणित और समाजवादी पार्टी व हाशिये पर जाती बहुजन समाज पार्टी की राजनीति का सवाल है तो अखिलेश बाबू ने बेशक पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक (पीडीए ) का फार्मूला दिया हुआ है मगर दुनिया जानती है कि उनके शासनकाल में पिछड़ी जातियों के दबंगों द्वारा ही दलितों पर अत्याचार करने के आरोप सबसे ज्यादा लगते थे। एेसा नहीं है कि योगी शासन में दलितों पर अत्याचार होने की घटनाएं नहीं हुई हैं मगर अत्याचारों की अवधारणा अखिलेश शासन की ही है। इसके चलते दलितों के वोट समाजवादी पार्टी के लिए ‘गूलर के फूल’ की मानिन्द हो सकते हैं जबकि कांग्रेस पार्टी की स्थिति इसके पूरी तरह उलट है । दलित समुदाय मायावती से निराश होने के बाद कांग्रेस की तरफ उम्मीद से देखने लगा है। अतः गठबन्धन में जहां- जहां कांग्रेस प्रत्याशी मैदान में होंगे वहां- वहां उन्हें दलित-मुस्लिम वोट एक मुश्त ढंग से मिल सकते हैं। मगर सवाल यह है कि कांग्रेस के प्रत्याशी होंगे कितने ?
इन सामाजिक हालात में य़ोगी जी के सुशासन व कानून–व्यवस्था की यूएसपी को किस तरह विपक्षी गठबन्धन ढेर कर सकता है? बिना संकोच के यह माना जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में अयोध्या के श्री राम मन्दिर मे ‘चढ़ावा चोरी’ की घटना के बाद भाजपा के हिन्दुत्व के विमर्श में कमजोरी आयी है और योगी जी की मुश्किलें बढ़ी भी हैं मगर इससे उनके कानून–व्यवस्था के यू एस पी को हल्का नहीं किया जा सकता। योगी जी ने राज्य के बहुसंख्यक हिन्दू समाज के दिलो- दिमाग में यह बैठा दिया है कि उनके रहते राज्य में गुंडागर्दी को किसी कीमत पर बढ़ावा नहीं मिल सकता और राज्य की पुलिस महिलाओं की सुरक्षा के लिए कटिबद्ध है । जरा सोचिये एेसी जन अवधारणा बनाने में योगी जी ने किस प्रकार प्रशासन को चुस्त किया होगा? इसका अर्थ यह भी निकलता है कि उनसे पहले की सरकारों में इस मोर्चे पर किस प्रकार ढिलाई बरती जाती थी।
2007 से लेकर 2012 तक राज्य में बहिन मायावती की बहुजन समाजपार्टी की एकल सरकार थी। उस सरकार में यह प्रसिद्ध हो गया था कि पुलिस थाने ‘उगाही’ के अड्डे बना दिये गये हैं। एक मायने में जब 2012 में समाजवादी पार्टी अपने दम पर बहुमत लेकर सरकार बनाने में कामयाब हुई थी तो यह मायावती शासन की तीव्र प्रतिक्रिया ही थी जिसके पीछे नितान्त जातिगत वैमनस्य का गणित था। राज्य में विपक्षी गठबन्धन योगी जी का तभी मुकाबला कर सकता है जब इसकी ओर से सिपहसालारी करते श्री राहुल गांधी नजर आयें क्योंकि उनके साथ कोई जातिगत बोझ नहीं है । मेरा मन्तव्य अखिलेश बाबू का विरोध नहीं है। व्यक्तिगत रूप से वह एक शानदार इंसान हैं और डा. लोहिया के समाजवाद में उनका पक्का यकीन भी है मगर उनकी पार्टी के शासन का अतीत उनके कंधों पर बैठा हुआ है। इसलिए जातिगत पूर्वाग्रहों के दुष्चक्र को तोड़ना उनके लिए आसान नहीं है।
जहां तक योगी जी का सवाल है तो उनसे मेरी पहली भेंट तब हुई थी जब में 2002 के आसपास तत्कालीन गृहमन्त्री श्री लाल कृष्ण अडावनी के साथ गोरखपुर मठ गया था। उस समय योगी जी बहुत कम बोलते थे मगर जो भी बोलते थे बहुत वजनदार तरीके से बोलते थे। उस समय उन्होंने श्री अडवानी को हिन्दू हृदय सम्राट की संज्ञा दी थी। इसके बाद लोकसभा में मैंने उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश में मस्तिष्क ज्वर (जापानी बुखार) की महामारी से निजात पाने के मुद्दे पर बहुत व्याकुल देखा मगर मुख्यमन्त्री के रूप में कानून व्यवस्था को सुधारने को लेकर उनके सख्त प्रशासक के रूप में उभरना एक अनोखा अनुभव था। योगी का यही पक्ष उन्हें उत्तर प्रदेश में जातिगत समीकरणों की राजनीति से ऊपर उनके हिन्दुत्व के आलोक में लोकप्रिय मुख्यमन्त्री बनाता है और विपक्ष पर भारी करता है। यह विमर्श उत्तर प्रदेश की राजनीति को राष्ट्रीय विमर्श के मुद्दों से अलग करके देखता है जिसमें भाजपा की नैया के खेवनहार के रूप में योगी आदित्यनाथ ही प्रकट होते हैं।

Team Desk