आज से तमिलनाडु की राजनीति में एक नये दौर की शुरूआत हो रही है जिसे ‘विजय काल’ कहा जा रहा है। लोकतन्त्र में ऐसे दौर आते रहते हैं, जब राजनीति पुराने समय के चंगुल से पीछा छुड़ा कर नये समय की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार होती है। ऐसा ही हमने प. बंगाल में देखा जहां आजादी के बाद पहली बार भाजपा के नेतृत्व में शुभेन्दु सरकार कल गठित हुई। यह जीवन्त लोकतन्त्र की निशानी भी होती है क्योंकि लोकतन्त्र निरन्तर बदलाव मांगता रहता है अतः इसमें कभी भी विकल्पों की कमी नहीं होनी चाहिए। भारत की बहुदलीय प्रशासनिक प्रणाली का राज भी यही है कि इसमें जनता जरूरत पड़ने पर अपने विकल्प स्वयं तैयार कर लेती है क्योंकि अन्ततः जनता ही लोकतन्त्र की मालिक होती है। तमिलनाडु में ‘थल्लापति’ के नाम से विख्यात लोकप्रिय फिल्म अभिनेता ‘चन्द्रशेखरन जोसेफ विजय’ की 2024 में ही गठित ‘तमिलगा वेत्री कषगम’ पार्टी ने जो जीत हासिल की है वह राज्य के स्थापित राजनीतिक दलों द्रमुक व अन्ना द्रमुक की नींद उड़ाने वाली है।
234 सदस्यीय विधानसभा में उनकी पार्टी को 108 स्थान मिले हैं, जो कि सर्वाधिक हैं। अतः श्री विजय का ही संवैधानिक अधिकार बनता था कि वह चुनावों के बाद राज्य में लोकप्रिय सरकार बनायें। मगर राज्यपाल श्री राजेन्द्र विश्वनाथ आर्लेकर ने उनसे कहा कि वह पहले बहुमत के लिए आवश्यक 118 सदस्यों की सूची उन्हें दें तभी वह स्थायी सरकार बना सकते हैं। श्री विजय को इस काम में पूरे पांच दिन लग गये और इस दौरान उन्होंने चार बार राज्यपाल से मिलकर सरकार बनाने का दावा ठोका लेकिन राज्यपाल ने उन्हें तभी सरकार बनाने का न्यौता दिया जब वह आश्वस्त हो गये कि श्री विजय को कम से कम 118 विधायकों का समर्थन प्राप्त है। इस काम में हाल तक सत्तारूढ़ द्रमुक गठबन्धन के नेता श्री एम.के. स्टालिन ने उनकी परोक्ष मदद भी की और अपने गठबन्धन की वी.सी.के. व मुस्लिम लीग पार्टियों को छूट दी कि वे विजय सरकार का समर्थन कर सकती है और साथ ही द्रमुक गठबन्धन में भी रह सकती हैं। श्री स्टालिन ने कहा कि विधानसभा में दूसरा सबसे बड़ा दल होने के नाते उनकी पार्टी रचनात्मक विपक्ष की भूमिका अदा करेगी। इससे पहले ही श्री राहुल गांधी की कांग्रेस के पांच विधायकों ने विजय की पार्टी ‘टीवीके’ को अपना समर्थन द्रमुक गठबन्धन में रहते हुए ही दे दिया था। साथ ही दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों के चार विधायकों ने भी विजय का समर्थन किया था। वी.सी.के. व मुस्लिम लीग के चार विधायकों को मिलाकर श्री विजय के समर्थकों की संख्या 121 हो गई ( हालांकि वस्तुगत तौर पर संख्या 120 रही क्योंकि श्री विजय दो सीटों से चुनाव जीते हैं )। यह सब जुगाड़ करने में श्री विजय को पांच दिन का समय लग गया तब जाकर 9 मई को राज्यपाल ने उन्हें पद व गोपनीयता की शपथ चेन्नई के नेहरू सभागार स्थल पर दिलाई। शपथ ग्रहण समारोह में विपक्ष के नेता श्री राहुल गांधी की उपस्थिति उल्लेखनीय कही जायेगी क्योंकि नये मुख्यमन्त्री व राहुल गांधी में पुरानी दोस्ती बताई जाती है।
श्री विजय ने मुख्यमन्त्री पद की शपथ लेने के बाद मुख्यमन्त्री सचिवालय पहुंच कर जो सबसे पहले तीन आदेश पारित किये हैं उनसे लगता है कि वह अपने चुनावी वादों को जल्द से जल्द पूरा करना चाहते हैं। ये तीन आदेश हैं 200 यूनिट तक मुफ्त बिजली, प्रत्येक जिले में नशा विरोधी दस्ता और महिलाओं की सुरक्षा के लिए विशेष पुलिस। इसके साथ ही उन्होंने चुनावों में और भी आर्थिक मदद देने के वादे किये हैं जिनके बारे में कहा जा रहा है कि वह राज्य की अर्थव्यवस्था के बारे में पहले एक श्वेत पत्र’ जारी करके उनके बारे में विचार करेंगे। राज्य पर फिलहाल नौ लाख करोड़ रुपए से ऊपर का ऋण है।
दरअसल श्री विजय को उनकी फिल्मी छवि के अनुसार राज्य की जनता ‘जन नायगम् और थल्लापति’ कहती है जिसका मतलब होता है लोकनायक और कमांडर। इस प्रकार उनकी छवि एक महानायक की बनी हुई है, अतः राज्य का प्रशासन चलाते हुए उन्हें अपनी जन छवि का भी विशेष ध्यान रखना होगा जो कि वर्तमान राजनीतिक दौर में आसान काम नहीं है। वैसे अगर राज्य की राजनीति के इतिहास को देखें तो उनसे पहले भी फिल्मी हस्तियां राज्य की मुख्यमन्त्री रही हैं जिनमें फिल्मी गीतकार व पटकथा लेखक स्व. एम. करुणानिधि से लेकर अभिनेता एम.जी. रामचन्द्रन व अभिनेत्री जयललिता के नाम आते हैं। ये 1969 से लेकर जीवन पर्यन्त मुख्यमन्त्री बनते और उतरते रहे मगर राज्य की राजनीति इन्हीं तीन व्यक्तित्वों के उत्तराधिकार पर ही चलती रही। इस दौरान फिल्म अभिनेता विजयकान्त व कमल हासन ने भी अपनी-अपनी पार्टियां गठित करके राजनीति में भाग्य आजमाया मगर इन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी। इनमें से विजयकान्त तो तमिलनाडु विधानसभा में एक बार विपक्ष के नेता जरूर बनने में सक्षम हो सके मगर वह सत्ता की धुरी नहीं बन सके। कमल हसन को तो अन्ततः राज्यसभा सदस्य बनने के लिए द्रमुक की शरण में ही जाना पड़ा। इनके बाद श्री विजय एक मात्र ऐसे अभिनेता से नेता बने व्यक्ति हैं जिन्होंने अपनी लोकप्रियता के बूते पर राजनीति को अपनी चेरी बनाने में सफलता हासिल की है और तमिलनाडु की राजनीति से जाति व वर्गवाद को समाप्त करके सही मायनों में सामाजिक न्याय व धर्मनिरपेक्षता को स्थापित करने का संकल्प किया है। उनके साथ टी.वी.के. के जिन अन्य नौ विधायकों ने शपथ ली है वे भी तमिल समाज की इसी विविधता को दर्शाते हैं।
विजय की ‘शपथ यात्रा’ प्रारम्भ
Summary :
आज से तमिलनाडु की राजनीति में एक नये दौर की शुरूआत हो रही है जिसे ‘विजय काल’ कहा जा रहा है। लोकतन्त्र में ऐसे दौर आते रहते हैं, जब राजनीति पुराने समय के चंगुल से पीछा छुड़ा कर नये समय की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार होती है। ऐसा ही हमने प. बंगाल में देखा जहां आजादी के बाद पहली बार भाजपा के नेतृत्व में शुभेन्दु सरकार कल गठित हुई। यह जीवन्त लोकतन्त्र की निशानी भी होती है क्योंकि लोकतन्त्र निरन्तर बदलाव मांगता रहता है अतः इसमें कभी भी विकल्पों की कमी नहीं होनी चाहिए। भारत की बहुदलीय…


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