मतदाता सूची पुनरीक्षण और चुनाव आयोग

Summary :

भारत के संविधान निर्माता बाबा साहेब अम्बेडकर ने चुनाव आयोग की महत्ता को विशेष प्रश्रय देते हुए 25 नवम्बर, 1949 के अपने ऐतिहासिक भाषण में साफ किया था कि स्वतन्त्र भारत की लोकतान्त्रिक व्यवस्था का यह ऐसा चौथा स्तम्भ होगा, जो समूची जनतान्त्रिक प्रणाली के लिए ठोस जमीन तैयार करेगा । चुनाव आयोग भारत की इसी जनतान्त्रिक प्रणाली का आधार है क्योंकि यही संस्था वह व्यवस्था देती है जिसे हम लोकतन्त्र कहते हैं। हर पांच साल बाद स्वतन्त्र व निष्पक्ष चुनाव करा कर वह संविधान द्वारा भारत के प्रत्येक वयस्क नागरिक को मिले एक वोट की ताकत के आधार पर…

भारत के संविधान निर्माता बाबा साहेब अम्बेडकर ने चुनाव आयोग की महत्ता को विशेष प्रश्रय देते हुए 25 नवम्बर, 1949 के अपने ऐतिहासिक भाषण में साफ किया था कि स्वतन्त्र भारत की लोकतान्त्रिक व्यवस्था का यह ऐसा चौथा स्तम्भ होगा, जो समूची जनतान्त्रिक प्रणाली के लिए ठोस जमीन तैयार करेगा । चुनाव आयोग भारत की इसी जनतान्त्रिक प्रणाली का आधार है क्योंकि यही संस्था वह व्यवस्था देती है जिसे हम लोकतन्त्र कहते हैं। हर पांच साल बाद स्वतन्त्र व निष्पक्ष चुनाव करा कर वह संविधान द्वारा भारत के प्रत्येक वयस्क नागरिक को मिले एक वोट की ताकत के आधार पर लोकसभा से लेकर विधानसभाओं तक का गठन कराता है।

इन्हीं चुने हुए सदनों में राजनीतिक बहुमत के आधार पर लोकप्रिय सरकारों का गठन होता है जो केवल संविधान के अनुसार शासन चलाती हैं। हमारे संविधान निर्माताओं के दिमाग में यह पूरी तरह साफ था कि स्वच्छ चुनाव प्रणाली ही भारत में केन्द्र से लेकर राज्यों तक लोगों की मनपसन्द की सरकारों का गठन कर सकती है। इसीलिए चुनाव आयोग को सरकार का अंग न बनाकर इसे ऐसी स्वतन्त्र संवैधानिक संस्था बनाया गया जो सीधे संविधान से शक्ति लेकर अपना कार्य करे और इसकी जिम्मेदारी सीधे तौर पर मतदाताओं के प्रति हो।

चुनाव आयोग को किसी भी सरकार से निरपेक्ष रखते हुए इसे राजनीतिक दलों की निगरानी करने का भी अधिकार दिया गया और इस मुतल्लिक कुछ न्यायिक अधिकार भी दिये गये, मगर सबसे अहम अधिकार चुनाव आयोजित करने का ही दिया गया जिससे भारत में गणतन्त्र स्थापित हो सके। भारत के नागरिकों की मतदाता सूची बनाने का काम इस सिलसिले में प्राथमिक शर्त मानी जाती है, क्योंकि इसी के आधार पर मतदाता अपनी इच्छानुसार सरकारों का गठन करते हैं। इस सन्दर्भ में मतदाता सूचियों का पूरी तरह शुद्ध या त्रुटिहीन होना आवश्यक था जिससे केवल वैध मतदाता ही चुनावों में वोट डाल सकें, मगर यह भी जरूरी था कि कोई भी वैध मतदाता सूची से बाहर न रह सके।

अतः चुनाव आयोग का प्राथमिक कार्य मतदाता सूचियां तैयार करना ही है, क्योंकि इसमें यदि कोई गलती छूट जाती है तो भारत की लोकतान्त्रिक प्रणाली के अशुद्ध हो जाने का खतरा पैदा हो जाता है, परन्तु इसके साथ यह भी लाजिम है कि एक भी वैध मतदाता का नाम सूची से न छूटे। मुख्य चुनाव आयुक्त श्री ज्ञानेश कुमार की अगुवाई में चुनाव आयोग आजकल पूरे देश में मतदाता सूचियों का सघन पुनरीक्षण कर रहा है।

इसमें ऐसे मतदाताओं की तसदीक की जा रही है जिनके नाम गलती से या अवैध तरीके से मतदाता सूची में शामिल हैं, मगर इसके साथ यह भी सवाल है कि किसके नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं हैं? चुनाव आयोग इस बारे में मतदाताओं पर ही यह जिम्मेदारी डाल रहा है कि वे अपने वैध भारतीय होने का प्रमाण दें। इस सिलसिले में उसने विगत वर्ष बिहार के विधानसभा चुनावों से पहले 11 सबूत पत्रों की एक सूची जारी की थी जो नागरिकों के वैध होने से सम्बन्धित थे मगर इनमें आधार कार्ड का नाम ही नहीं था जबकि बहुतायत में भारतीय नागरिकों के पास उनके निवास या भारतीय होने का यही प्रमाण होता है।

इस मामले में बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप करके आधार कार्ड को भी सबूतों की फेहरिस्त में जुड़वाया चुनाव आयोग का काम यह भी है कि कोई भी नागरिक ऐसा न हो जो मतदान के अधिकार से वंचित रह जाये। क्योंकि संविधान ही कहता है कि प्रत्येक वयस्क नागरिक को बिना किसी भेदभाव के एक वोट का अधिकार दिया जाता है, परन्तु अभी तक चुनाव आयोग ने जो पुनरीक्षण कार्य किया है उसमें 13 करोड़ 37 लाख मतदाताओं को सूची से बाहर कर दिया गया है। यह कार्य कितनी शुद्धता और पवित्रता के साथ किया गया इसका प्रमाण प. बंगाल है जिसमें चुनाव आयोग द्वारा काटे गये मतदाताओं के 91 प्रतिशत नामों को पूरी तरह सही पाया गया।

इससे यह तो सिद्ध होता ही है कि चुनाव आयोग मतदाता सूची से नाम काटने में कुछ न कुछ गफलत जरूर कर रहा है क्योंकि कई राज्यों में जजों या सैनिक या पूर्व सैनिककर्मियों से लेकर सामाजिक जीवन में विशिष्ट स्थान रखने वाले व्यक्तियों के नाम भी मतदाता सूचियों से हटा दिये गये थे। ऐसे लोगों के नाम भी काटे गये जिनके पास भारतीय पासपोर्ट था। चुनाव आयोग हर राज्य में लाखों की संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटा रहा है।

भारत में कुल 99 करोड़ के लगभग मतदाता हैं जिनमें से 13 करोड़ के लगभग नाम काट दिये गये हैं अथवा कटने की प्रक्रिया में हैं, जबकि नियम कहता है कि प्रत्येक वंचित किये जाने वाले मतदाता को अपना पक्ष रखने का समुचित अवसर दिया जाना चाहिए। चुनाव आयोग इसका पालन तो करता है, मगर इसमें कई खामियां मतदाता गिनवां रहे हैं सबसे बड़ी खामी यह है कि मतदाता सूची से नाम काटे जाने की अपील कोई तीसरा व्यक्ति भी कर सकता है।

यह अपील चुनाव प्रणाली का फार्म-7 भरकर की जाती है। इसके माध्यम से लोग राजनीतिक व निजी रंजिशें निकालने का काम भी कर रहे हैं। सबसे ताजा उदाहरण राज्यसभा सदस्य श्री राघव चड्ढा का है जिनका नाम पंजाब राज्य की मतदाता सूची के प्रारूप से यह कहकर कटवा दिया गया कि उन्होंने अपना निवास बदल लिया है। राघव चड्ढा हाल में ही आम आदमी पार्टी से भारतीय जनता पार्टी में आये हैं और पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार है।

श्री चड्ढा इसे राजनीतिक बदला बता रहे हैं जबकि राज्य सरकार कह रही है कि उसका इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है, परन्तु झारखंड का क्या किया जाये जहां कोई तीसरा व्यक्ति फार्म-7 भरकर थोक के हिसाब से किसी विशिष्ट दल को वोट देने वाले लोगों के नाम कटवा रहा है। उत्तराखंड में भी ऐसे मामलों की शिकायत चुनाव आयोग से की गई थी।

इस राज्य के कांग्रेसी नेताओं को कुमारी शैलजा ने बाकायदा दिल्ली आकर चुनाव आयोग को एक शिकायती ज्ञापन सौंपा था और कहा था कि फर्जी नामों से फार्म-7 भरकर मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से कटवाये जा रहे हैं क्योंकि जब फार्म भरने वाले व्यक्ति से पूछा जाता है तो वह फार्म भरने से ही इनकार करता है। ऐसी घटनाओं से चुनाव आयोग की स्थिति ही सन्देहास्पद बनती है।

ऐसा कार्य किसी दूसरे राज्य में भी इसके उलट हो सकता है, इसलिए चुनाव आयोग को पहले फार्म-7 भरने वाले व्यक्ति की ही विश्वसनीयता की जांच करने की पुख्ता प्रक्रिया अपनानी होगी जिससे जायज मतदाता बिना वजह परेशान न हों और उनके वोट के अधिकार को कोई चुनौती न दे सके, क्योंकि भारत की 70 प्रतिशत से अधिक आबादी अभी भी गांवों में ही रहती है और हम जानते हैं कि गांवों की सामाजिक- आर्थिक स्थिति क्या है।

गरीब ग्रामीण जनता अपना वोट बचाये रखने के लिए सरकारी दफ्तरों और सबूतों के चक्कर में नहीं पड़ना चाहती है इसी वजह से चुनाव आयोग के कर्त्तव्यों में से एक यह भी है कि वह मतदाताओं को जागरूक बनाये जिससे वे अधिक से अधिक संख्या में मतदान करें। वैसे भी लोकतन्त्र तभी मजबूत होगा जब अधिकाधिक मतदान होगा और इस मामले में ग्रामीण मतदाता शहरी मतदाताओं से आगे रहते हैं इसलिए उनके वोट की रक्षा करना चुनाव आयोग का प्राथमिक कर्त्तव्य है।

Team Desk