अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की अस्थिर मानसिकता और ईरान के अडि़यल रवैये का खामियाजा पूरी दुनिया भुगत रही है। कल तक ईरान ने तेल भंडार खार्ग द्वीप पर कब्जा कर और भीषण हमले का ऐलान करने वाले ट्रम्प ने फिर कलाबाजी खाते हुए समझौता जल्द होने संबंधी बयान देकर दुनिया की उम्मीदें जगा दी हैं। यह स्पष्ट है कि अमेरिका अंतहीन युद्ध में उलझने का जोखिम नहीं उठा सकता लेकिन तनातनी के चलते पूरी दुनिया में हालात बदतर हो रहे हैं। तेल और ऊर्जा संकट गहरा रहा है। ट्रम्प अपना दांव लगातार बदलते जा रहे हैं।
पश्चिम एशिया युद्ध के दौरान भारत को लेकर अमेरिका के दोहरा चरित्र उजागर हो रहा है। हाेर्मुज स्ट्रेट में अमेरिका में तीन भारतीय जहाजों पर अटैक कर चुका है जिसमें तीन भारतीयों की मृत्यु हो चुकी है। भारत ने इसको लेकर अमेरिका के सामने कड़ा प्रतिरोध दर्ज कराया है। भारत ने इस मामले को यूएनओ में भी उठाया है। चिंता की बात यह है कि वैश्विक समुद्री कार्यबल में बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक कार्यरत हैं और ऐसे हमलों में भारतीय नागरिकों की जान गई है या वे लापता हुए हैं। उन्होंने कहा कि संघर्ष के बढ़ने और अन्य देशों तक फैलने से गंभीर चिंता पैदा हुई है। बढ़ती तबाही, मौतों तथा सामान्य जीवन और आर्थिक गतिविधियों के बाधित होने का भारत पर भी गहरा प्रभाव पड़ा है, क्योंकि भारत इस क्षेत्र का निकटवर्ती पड़ोसी है और क्षेत्र की सुरक्षा एवं स्थिरता में उसकी महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। अमेरिका एक तरफ हिन्द प्रशान्त क्षेत्र में शांति की बात करता है, इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर चिंता व्यक्त करता है। वहीं दूसरी ओर होर्मुज पर जलसंधि को लेकर अमेरिका की नीति अपने प्रभाव को बढ़ाने की है। इधर अब यह भी सवाल उठने लगे हैं कि भारत को क्या अमेरिका के साथ क्वाड में रहना चाहिए या नहीं। मार्च से लेकर जून तक इस युद्ध में अब तक 9 भारतीयों की मृत्यु हो चुकी है। युद्ध के कारण खाड़ी देश में रहने वाले भारत के लोग भी बहुत प्रभावित हुए हैं। खाड़ी देश में भारत की एक बहुत बड़ी आबादी रहती है। युद्ध के कारण उनके रोजगार पर खासा असर पड़ा है।
अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर संयुक्त हमलों की शुरूआत को 100 दिन से अधिक वक्त हो गया। इन हमलों को क्रमश: एपिक फ्यूरी और राइजिंग लॉयन का नाम दिया गया था। अब यह युद्ध पहले विश्व युद्ध की लड़ाई के उस हिस्से की तरह हो गया है जहां दोनों ही पक्ष बिना किसी उल्लेखनीय सफलता के लगातार लड़ रहे हैं। अयातुल्ला खामेनेई सहित कुछ शीर्ष नेताओं के मारे जाने, अहम बुनियादी ढांचे को व्यापक तौर पर नष्ट किए जाने और करीब 3,500 मौतों के बावजूद ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम समाप्त करने और हिजबुल्लाह जैसे राजनीतिक साझेदारों को त्यागने की अमेरिका और इजराइल की मांग के समक्ष नहीं झुका है। यह संघर्ष पूरे पश्चिम एशिया में फैल गया है जहां अमेरिका के क्षेत्रीय सहयोगी कतर, बहरीन और यूएई अपने तेल और गैस बुनियादी ढांचे के विनाशकारी नुकसान का सामना कर रहे हैं। पाकिस्तान द्वारा कराई गई युद्ध विराम वार्ता में कोई प्रगति नहीं हुई क्योंकि दोनों पक्ष अपनी अधिकतम मांगों से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। इस बीच शेष विश्व को इसकी कीमत चुकानी पड़ रही है क्योंकि ईरान और अमेरिका ने होर्मुज स्ट्रेट के दोनों सिरों को अवरुद्ध कर रखा है। यही वह मार्ग है जहां से दुनिया के कुल कच्चे तेल और गैस का करीब 40 फीसदी आता-जाता है। लड़ाई के पहले जहां इस मार्ग से रोज करीब 100 से अधिक पोत निकलते थे वहीं अब इनकी संख्या घटकर 7 रह गई है। इसके चलते असाधारण वैश्विक तेल संकट उत्पन्न हुआ है
यूक्रेन और ईरान में चल रहे संघर्षों से दो मूलभूत सबक मिलते हैं कि महाशक्तियों की भी अपनी सीमाएं होती हैं और लंबे समय तक चलने वाले संघर्षों में घातक हथियारों के विशाल भंडार से कहीं अधिक लचीलापन मायने रखता है। दोनों संघर्षों में कमजोर देशों ने मजबूत विरोधियों का सामना करने में असाधारण लचीलापन दिखाया है। इसके अलावा, रणनीतिक और सैन्य क्षमताओं में असमानता के बावजूद, न तो रूस और न ही अमेरिका अपने-अपने संघर्ष में अपने रणनीतिक उद्देश्यों को प्राप्त कर सके। उन्होंने परमाणु हथियारों को छोड़कर हर संभव हथियार का इस्तेमाल किया, फिर भी वे अपने प्रतिद्वंद्वियों के संकल्प को तोड़ नहीं सके। न ही कोई भी शासन को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर कर सका। इसके विपरीत, वर्तमान स्थिति में, यूक्रेन और ईरान युद्ध की शर्तें और शांति की स्थितियां तय कर रहे हैं। वे विजेता नहीं हैं, लेकिन वे हारे भी नहीं हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात है उनके राजनीतिक नेतृत्व की दृढ़ इच्छाशक्ति। जिन राज्यों ने पलटवार करने का राजनीतिक संकल्प दिखाया, वे अधिक शक्तिशाली राज्यों की योजनाओं को विफल करने में सफल रहे।
यूक्रेन और ईरान दोनों को भारी जानमाल का नुकसान हुआ है और इससे उबरने में वर्षों लगेंगे। फिर भी, उन्होंने आक्रमणकारी राज्यों की योजनाओं को विफल करने में उल्लेखनीय लचीलापन और दृढ़ संकल्प दिखाया है। आम धारणा के अनुसार, नेतन्याहू शांति स्वीकार करने से पहले अधिक से अधिक सुरक्षा गारंटी चाहते हैं लेकिन, उनका “लगातार युद्ध” वाला रवैया शांति का मार्ग नहीं हो सकता; बल्कि यह शांति को अनिश्चितकाल के लिए टालने का एक तरीका हो सकता है। एक वास्तविक समझौता अनिवार्य रूप से उन सवालों को फिर से उठाएगा जिन्हें युद्ध टाल देता है। इससे राजनीतिक जवाबदेही, गठबंधन की अस्थिरता और उन कानूनी चुनौतियों पर फिर से ध्यान जाएगा जिन्होंने वर्षों से नेतन्याहू के प्रधानमंत्रित्वकाल को प्रभावित किया है। िफलिस्तीनी, लेबनानी, ईरानी और खाड़ी अरब आबादी समान रूप से एक ऐसे संघर्ष में फंसी हुई है जिसका जारी रहना जीवन और आजीविका के लिए खतरा है। बेहतर यही होगा कि दोनों पक्ष समझौता करें। युद्ध खत्म हो ताकि दुनिया राहत की सांस ले सके।
युद्ध और ट्रम्प के बदलते दांव
Summary :
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की अस्थिर मानसिकता और ईरान के अडि़यल रवैये का खामियाजा पूरी दुनिया भुगत रही है। कल तक ईरान ने तेल भंडार खार्ग द्वीप पर कब्जा कर और भीषण हमले का ऐलान करने वाले ट्रम्प ने फिर कलाबाजी खाते हुए समझौता जल्द होने संबंधी बयान देकर दुनिया की उम्मीदें जगा दी हैं। यह स्पष्ट है कि अमेरिका अंतहीन युद्ध में उलझने का जोखिम नहीं उठा सकता लेकिन तनातनी के चलते पूरी दुनिया में हालात बदतर हो रहे हैं। तेल और ऊर्जा संकट गहरा रहा है। ट्रम्प अपना दांव लगातार बदलते जा रहे हैं। पश्चिम एशिया युद्ध के…


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