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कमजोर ओबीसी को मिले लाभ

भारत में आरक्षण की शुरूआत समाज के पिछड़े वर्गों को सामाजिक और आर्थिक रूप से ऊपर उठाने के लिए की गई थी लेकिन आरक्षण का यह उद्देश्य विकृत होता चला गया और वर्तमान में आरक्षण पिछड़े वर्गों या आभाव ग्रस्त जनता का उत्थान न होकर राजनीतिक मकड़जाल में उलझा हुआ दिखाई दे रहा है। हाल ही के दशकों में आरक्षण के विस्तार में जाति की राजनीति साफतौर पर दिखाई देती है। राज्य सरकारों ने आरक्षण की कुल 50 प्रतिशत सीमा का उल्लंघन करना शुरू कर दिया है और राजनीतिक दल वोट बैंक की राजनीति के चलते इस तरह के उल्लंघन का विरोध नहीं कर पा रहे। राज्यों में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के साथ ही ओबीसी वर्ग में सब कैटेगरी आरक्षण के मुद्दे पर लम्बे समय से बहस छिड़ी हुई है। राज्य सरकारों की तरफ से आरक्षण की सीमा तय कैटेगरी से बढ़ाकर अलग-अलग समुदाय को आरक्षण देने के मामले पहले भी आए हैं। सुप्रीम कोर्ट की सात सदस्यीय संवैधानिक पीठ इस सवाल का जवाब तलाश रही है कि क्या राज्य अनुसूिचत जातियों की श्रेणी में उप​जातियों की पहचान कर सकता है जो अधिक आरक्षण के लायक हैं। पंजाब सरकार अपने कानून पंजाब अनुसूचित जाति और पिछड़ा वर्ग (सेवाओं में आरक्षण) कानून 2006 के वैध होने का बचाव कर रहा है। पंजाब सरकार का तर्क है कि राज्य एससी सूची में उपजातियों की पहचान कर उन्हें सशक्त बनाने के लिए अधिक आरक्षण दे सकते हैं क्योंकि यह हाशिये पर मौजूद पहली जातियों से भी बहुत पिछड़ी हैं। पंजाब सरकार का यह भी तर्क है कि अगर समुदाय सामान्य और पिछड़े वर्ग में बांटे जा सकते हैं तो ऐसा पिछड़े समुदायों में भी किया जा सकता है।
पंजाब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी है कि पिछड़े वर्गों में सबसे पिछड़े समुदायों की पहचान की जानी चाहिए और उन्हें रोजगार के अवसरों का लाभ उठाने के लिए साधन उपलब्ध कराए जाने चाहिए। उनका तर्क है कि जो लोग सरकारी सेवा में उच्च प्रतिनिधित्व के माध्यम से आगे बढ़ चुके हैं उन्हें अनुसूचित जाति (एससी) के दायरे में वंचित समुदायों के लिए रास्ता बनाना चाहिए। सरकार का कहना है कि ‘पिछड़ी जातियों में से सबसे पिछड़े तबके जैसे बाल्मीकि और मजहबी (सिख) को अलग पहचाना जाना चाहिए और उन्हें आरक्षण का लाभ दिया जाना चाहिए।’ उनके अनुसार, अनुसूचित जाति समुदायों के 43 प्रतिशत लोग राज्य सरकार में 81 प्रतिशत अनुसूचित जाति पदों पर काबिज हैं।
पंजाब सरकार की दलीलों पर मुख्य न्यायाधीश डीवाई चन्द्रचूड़ की अध्यक्षता वाली 7 जजों की पीठ में शामिल जस्टिस बीआर गवई ने पूछा ‘‘अनुसूचित जा​ित एवं जनजाति समुदाय का एक शख्स आईएएस या आईपीएस बन जाता है आैर वह सर्वोत्तम सुविधाओं तक पहुंच जाता है तो फिर भी उनके बच्चों और आगे उनके बच्चों को आरक्षण का लाभ मिलता रहता है। क्या यह जारी रहना चाहिए? क्या उनके परिवारों को पीढ़ी दर पीढ़ी आरक्षण का लाभ मिलता रहेगा? साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ताकतवर और प्रभावी समूह को आरक्षण की सूची से बाहर करना चाहिए या नहीं। पीठ में शामिल जस्टिस विक्रम नाथ ने भी पूछा कि प्रभावशाली और सम्पन्न उपजातियों को आरक्षण सूची से निकाला क्यों नहीं जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि कुछ उपजातियों ने बेहतर किया है और सम्पन्नता बढ़ी है उन्हें आरक्षण से बाहर आना चाहिए और सामान्य वर्ग में प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए। यह सम्पन्न उपजातियां आरक्षण के दायरे से बाहर निकल कर उन उपजातियों के लिए अधिक जगह बना सकती हैं जो अधिक हाशिये पर या बेहद पिछड़ी हुई हैं। मुख्य न्यायाधीश चन्द्रचूड़ ने यह संकेत दिया कि आरक्षण की अवधारणा में इसमें से कुछ निकालना भी निहित हो सकता है। उन्होंने कहा कि पिछड़ी जातियों के​ लिए सीट आरक्षित करने के लिए अगड़ी जातियों को बाहर किया गया था लेकिन यह संविधान की अनुमति से हुआ था। क्योंकि राष्ट्र औपचारिक समानता नहीं बल्कि वास्तविक समानता में विश्वास रखता है। पंजाब में 2006 के कानून के तहत बाल्मीकि और मजहबी सिख समुदायों को आरक्षण में प्राथमिकता दी गई थी। एससी वर्ग का आधा आरक्षण पहले इन दो समूहों को दिया गया था।
साल 2010 में राज्य के हाईकोर्ट ने इन प्रावधानों को ख़त्म कर दिया था और उसने ईवी चिन्नईया केस में पांच जजों की संवैधानिक पीठ के फैसले को इसका आधार बताया था। उस फैसले में कहा गया था कि संविधान के अनुच्छेद 341 के मुताबिक एससी सूची में किसी समूह को केवल राष्ट्रपति ही शामिल कर सकते हैं। संवैधानिक पीठ ने घोषित किया था कि एससी सजा​तीय समूह’ है और उपजातियां बांटना समानता के अधिकार का उल्लंघन है। पंजाब सरकार ने तर्क दिया कि 2006 के कानून में उपजातियां बांटना ‘समानता का उल्लंघन नहीं बल्कि समानता के सहायता के रूप में है। पिछड़ों में भी अति पिछड़ों या कमजोर में भी बेहद कमज़ोर को प्राथमिकता देना किसी को बाहर करने की प्रक्रिया नहीं है।
दलीलें जटिल हैं। एससी-एसटी आक्षण को सब-कैटेगराइज करने के मामले में जो भी फैसला आएगा वह पंजाब में बाल्मीकि और मजहबी सिखों, आंध्र प्रदेश में मडिगा, बिहार में पासवान, यूपी में जाटव और तमिलनाडु में अरुंधतियार जैसे समुदायों को मिलने वाले आरक्षण को प्रभावित करेगा। आरक्षण उन्हें ही मिलना चाहिए जो इसके वास्तविक हकदार हैं लेकिन राज्य सरकारें समय-समय पर कोटे के भीतर कोटे की वकालत कर रही हैं। देखना होगा कि सुप्रीम कोर्ट क्या फैसला करता है।

आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com

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