क्या हैं मोसाद, हिजबुल्लाह, हूती?

Summary :

अमेरिका-इजराइल-ईरान युद्ध में इन तीनों देशों व अन्य 13 खाड़ी देशों से उठते हुए बारूदी धुएं की पृष्ठभूमि में एक और इबारत भी दर्ज है। हमारा परिवेश सिर्फ ट्रम्प, नेतन्याहू व दो-चार ईरानी नेताओं के बयानों व मीडिया-वार्ता से अटा पड़ा है। मगर युद्ध की पूरी इबारत कुछ ऐसे संगठनों द्वारा रची गई है जिन्हें जानना वर्तमान पीढ़ी के लिए भी महत्वपूर्ण है। इनकी कार्यशैली से ही पता चल पाता है कि हम जो कुछ आज भोगने पर विवश हैं, उसकी पृष्ठभूमि में यही आधा दर्जन संगठन हैं जो किसी भी पीढ़ी, देश या कालखण्ड के प्रति जवाबदेह नहीं है।…

अमेरिका-इजराइल-ईरान युद्ध में इन तीनों देशों व अन्य 13 खाड़ी देशों से उठते हुए बारूदी धुएं की पृष्ठभूमि में एक और इबारत भी दर्ज है। हमारा परिवेश सिर्फ ट्रम्प, नेतन्याहू व दो-चार ईरानी नेताओं के बयानों व मीडिया-वार्ता से अटा पड़ा है। मगर युद्ध की पूरी इबारत कुछ ऐसे संगठनों द्वारा रची गई है जिन्हें जानना वर्तमान पीढ़ी के लिए भी महत्वपूर्ण है। इनकी कार्यशैली से ही पता चल पाता है कि हम जो कुछ आज भोगने पर विवश हैं, उसकी पृष्ठभूमि में यही आधा दर्जन संगठन हैं जो किसी भी पीढ़ी, देश या कालखण्ड के प्रति जवाबदेह नहीं है। इन आधा दर्जन संगठनों में प्रमुख हैं हिजबुल्लाह, मोसाद और हूती।  हिजबुल्लाह अपने आप में एक स्वतंत्र संगठन है। इसका समूचा तंत्र लेबनान के ही एक भाग से संचालित है और इसका पूरा लक्ष्य इजराइल की तबाही है। मगर पहले ‘मोसाद’ में झांक लें। मोसाद इजराइल की राष्ट्रीय खुफिया एजेंसी है। यह दुनिया की सबसे सक्षम, खूंखार और चतुर खुफिया एजेंसियों में से एक मानी जाती है। वर्षों पूर्व 13 दिसंबर, 1949 को स्थापित यह एजेंसी इजराइल के बाहर जासूसी, आतंकवाद-विरोधी और गुप्त अभियानों के लिए स्थापित की गई थी। इसका उद्देश्य इजराइल के अस्तित्व की रक्षा करना है, जिसके लिए यह किसी भी हद तक जाने में सक्षम है।
स्थापना और कार्य : ‘मोसाद’ का हिब्रू भाषा में अर्थ ‘संस्थान’ है। यह देश की सुरक्षा के लिए खुफिया जानकारी जुटाने और गुप्त गतिविधियां चलाने का काम करती है।
कुछ चर्चित हैरतअंगेज मिशन: मोसाद ने अपने इतिहास में कई ऐतिहासिक मिशन अंजाम दिए हैं, जैसे 1960 में अर्जेंटीना से नाजीयुद्ध अपराधी एडॉल्फ आइकमैन को पकड़ना।
म्यूनिख ओलंपिक का बदला : 1972 के म्यूनिख ओलंपिक में मारे गए इजराइली एथलीटों का बदला लेने के लिए मोसाद ने कई सालों तक आतंकवादी गुट ‘ब्लैक सितंबर’ के सदस्यों को दुनियाभर में खोज कर मार गिराया। इस अभियान को ‘ईश्वर का कहर’ (रैथ ऑफ गोड) कहा जाता है।
महिला जासूसों की भूमिका : मोसाद ने अपने अभियानों में महिलाओं का इस्तेमाल भी बहुत चतुराई से
 किया है।
किलिंग-मशीन : मोसाद पर विदेशी जमीन पर हत्याएं करने के आरोप लगते रहे हैं, जिसकी वजह से इसे ‘किलिंग मशीन’ भी कहा
जाता है।
ईरान के खिलाफ अभियान : मोसाद, ईरान के भीतर भी गहरी पैठ रखता है, जिसमें ईरान के परमाणु वैज्ञानिकों को निशाना बनाना शामिल है। इस संगठन का इतिहास ऐसे ही और विवादास्पद ऑपरेशनों से भरा है, जो इसे दुनिया की सबसे रहस्यमयी एजेंसियों में से एक बनाता है। इजराइल चारों ओर से 13 मुस्लिम देशों से घिरा है। ऐसे में छोटे से इस देश को जिंदा रहने के लिए ही काफी जतन करना होता है। मोसाद इतनी शक्तिशाली है कि इसे इजराइल की ‘किलिंग मशीन’ तक कहा जाता है। चारों ओर दुश्मनों से घिरे इस देश की ये एजेंसी अपनी तेजी और खतरनाक ऑपरेशनरों की वजह से दुनिया की सबसे तेज इंटेलिजेंस भी मानी जाती है। इसका मुख्यालय तेल अवीव शहर में है। यह अपने देश की नेशनल इंटेलिजेंस एजेंसी है, ठीक वैसे ही जैसे भारत की ‘रॉ’ है। इसका जन्म आतंकवाद से लड़ने के लिए किया गया था। इस संगठन के बारे में ज्यादा जानकारी सार्वजनिक नहीं है। अधिकतर जानकारियां गुप्त हैं। इसके लिए उन्हीं का चयन होता है जो इजराइल के लिए काम कर चुके हैं। इसके अलावा कुछ और भी आतंकवाद विरोधी इकाइयां जैसे कि ‘यामाम’ और ‘सीरियट मातकाल’ हैं जो इजराइल की विशेष ही आतंकवाद-निरोधक इकाईयां हैं।
हिजबुल्लाह : हिज़बुल्लाह लेबनान में ईरान से समर्थन प्राप्त शिया इस्लामी अर्द्धसैनिक संगठन है। वर्ष 1992 से इसकी अगुवाई हसन नसरुल्लाह कर रहे हैं। हिज़बुल्लाह शब्द का अर्थ है- अल्लाह का दल है। वर्ष 1980 के दशक की शुरुआत में लेबनान पर इजराइली कब्जे के दौरान ईरान की वित्तीय और सैन्य सहायता से हिज़बुल्लाह का उदय हुआ। ये दक्षिणी लेबनान में पारंपरिक रूप से कमज़ोर शियाओं की रक्षा करने वाली ताकत के रूप में उभरा। इसकी वैचारिक जड़ें 1960 और 1970 के दशक में लेबनान में शिया पुनरुत्थान तक जाती हैं। वर्ष 2000 में इजराइल से पीछे हटने के बाद हिज़बुल्लाह ने अपनी सैन्य टुकड़ी इस्लामिक रेजि़स्टेंस को मज़बूत करना जारी रखा। यह संगठन ‘रेजि़स्टेंस ब्लॉक पार्टी’ के प्रति अपनी वफादारी के चलते धीर-धीरे लेबनान की राजनीतिक व्यवस्था में इतना अहम बन गया कि इसने देश की कैबिनेट में वीटो शक्ति तक हासिल कर ली। हिज़बुल्लाह पर वर्षों से इजराइली और अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाते हुए बमबारी और षड्यंत्र रचने का आरोप लगता रहा है। पश्चिमी देश, इजराइल, अरब खाड़ी देशों और अरब लीग हिज़बुल्लाह को ‘आतंकवादी’ संगठन मानते हैं। वर्ष 2011 में जब सीरिया में गृह युद्ध शुरू हुआ तो सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल-असद के कट्टर समर्थक माने जाने वाले हिज़बुल्लाह ने अपने हज़ारों एजेंटों को बशर अल-असद के लिए लड़ने के लिए भेजा। विद्रोहियों के कब्जे में जा चुके हिस्सों, खासतौर पर पहाड़ी लेबनानी सीमा के पास वाले इलाकों को वापस पाने में ये काफी निर्णायक साबित हुआ। इसी क्रम में तीसरे स्थान पर हूती है। हूती आंदोलन (अंसार अल्लाह) की स्थापना मुख्य रूप से 1990 के दशक (लगभग 1992-1994) में उत्तरी यमन के सादा प्रांत में हुई थी। इसके संस्थापक हुसैन अल-हूती थे जो ज़ायदी शिया संप्रदाय से थे।
स्थापना वर्ष : 1990 के दशक की शुरुआत (पूर्ववर्ती संगठन (युवा ब्रिगेड) के रूप में 1992, और पूरे संगठन के रूप में 1994 में हुई।
स्थापना की जगह : सादा प्रांत, उत्तरी यमन।
उद्देश्य : शुरुआत में ज़ायदी परंपराओं को पुनर्जीवित करना और सरकार के खिलाफ  विद्रोह करना जो बाद में यमन के गृहयुद्ध में बदल गया। मुख्य नेताहुसैन अल-हूती ने इस आंदोलन की नींव रखी जिसे बाद में सितंबर 2004 में यमनी सरकार ने ही मार दिया था मगर इस संगठन की पहचान इसी नाम से बन गई।
वैचारिक पृष्ठभूमि : यह एक शिया मिलिशिया समूह है जो खुद को ‘अंसार अल्लाह’ (ईश्वर के समर्थक) कहता है। वर्ष 2014 के बाद से, इन्होंने राजधानी साना सहित यमन के बड़े हिस्से पर नियंत्रण कर लिया है। इन तीनों संगठनों के अलावा विश्व में इस समय अमेरिका की एफबीआई, सीआईए और नेवी सील सरीखी एजेंसियां चर्चा में रहती हैं। इसी शृंखला में रूस की केजीबी, भारत की ‘रॉ’, ‘आईबी’, पाकिस्तान की ‘आईएसआई’, ब्रिटेन की ‘स्काटलैंड-यार्ड’ आदि भी चर्चा में बनी रहती हैं। पूरी दुनिया को यह इने-गिने संगठन ही अपनी उंगलियों पर नचाते हैं। विषय विस्तृत है।
– शेष फिर कभी।

Dr. Chander Trikha